Short Motivational Story In Hindi With Moral

Short Motivational Story In Hindi With Moral | शार्ट मोटिवेशनल स्टोरी इन हिंदी विथ मोरल

नमस्कार दोस्तों, अगर आप भी उन लोगो में से है, जो अपनी जिंदगी के प्राब्लम से परेशान और तंग आ गए है और आपको कुछ समझ नहीं आ रहा की खुद को आगे बढ़ाने के लिए कैसे मोटिवेट करे। तो आज की कहानी आप सभी केलिए बहुत ही खास होने वाली है, क्योंकि दोस्तो आज मैं आप सभी के साथ एक ऐसी कहानी शेयर करने वाला हूं, जो आपका माइंडसेट चेंज कर देगी।

Short Motivational Story In Hindi With Moral
Short Motivational Story In Hindi With Moral | शार्ट मोटिवेशनल स्टोरी इन हिंदी विथ मोरल

शार्ट मोटिवेशनल स्टोरी इन हिंदी विथ मोरल | Short Motivational Story In Hindi With Moral

दोस्तो महाभारत के बारे में कौन नही जानता है। आपने तो सुना ही होगा, लेकिन महाभारत में अर्जुन और कर्ण की कहानी तो सभी जानते है लेकिन एक नाम ऐसा भी है जो महाभारत का हिस्सा बहुत कम रहा है, पर इनसे हमे जो मोटिवेशन और सिख मिलती है वो वाकई में अतुल्य है। दोस्तो मैं बात कर रहा हूं एकलव्य की।

दोस्तो पिता पांडू के देहांत के बाद अर्जुन और उनके सारे भाई अपनी माता कुंती के साथ जब जंगल से हस्तिनापुर आए थे, तब उन सबकी की उम्र सीखने वाली थी मतलब की पढ़ाई करने की उम्र थी। इसीलिए सारे कौरवों और पाचो पांडव भाईयों को शिक्षा प्राप्त करने के लिए गुरु द्रोणाचार्य के गुरुकुल में शिक्षा प्राप्त करने के लिए भेज दिया गया था।

दोस्तो हर दिन की तरह जब एक दिन गुरु द्रोणाचार्य अपने शिष्यों को धनुर विद्या जब सीखा रहे थे तब अर्जुन ने देखा की कोई पेड़ की डालियों से छिप कर देख रहा है और अपनी धनुर विद्या का प्रदर्शन कर रहा है। अर्जुन की जिज्ञासा हुई और वो जानना चाहता था आखिर कौन है। अर्जुन जब उसके पीछे जाते है तब एकलव्य घबरा कर जाने लगते है। अर्जुन उनका पीछा करते करते एकलव्य के कुटिया में जा पहुंचते है।

अर्जुन को गुरु द्रोणाचार्य बहुत देर से देख रहे थे की उसका मन शिक्षा ग्रहण करने पर नही बल्कि कही और है इसिलीय गुरु द्रोणाचार्य भी उसके पीछे चले गए। वहां जा कर देखा तो एकलव्य ने सिर झुका कर प्रणाम किया और उन्हें गुरु कह कर बुलाया। इतने में अर्जुन एकलव्य से पूछते हैं की इन्होंने तो तुम्हे शिक्षा नहीं दी फिर भी ये तुम्हारे गुरु कैसे हों सकते हैं?

इस बात की जिज्ञासा सभी को थी और उसके साथ साथ गुरु द्रोणाचार्य को भी। तब एकलव्य ने जो कहां वो सुन कर सभी चकित रह गए खुद गुरु द्रोणाचार्य भी और आप भी सुन कर मोटीवेट हों जाएंगे। एकलव्य ने कहां की गुरु आपने मुझे शिक्षा तो नहीं दी पर मैंने सीखा आपसे ही है। जब आप सभी पांडव और सारे शिष्यों को शिक्षा दे रहे थे तो मैं छिप कर आपकी बात सुनता था और उसे आपकी मूर्ति के सामने प्रैक्टिस करता था। जिससे आज मुझे यह धनुर विद्या प्राप्त हुई है।

दोस्तो उसके बाद गुरु द्रोण ने आचर्य से पूछा की मेरी मूर्ति और ये सब सुन कर वो सभी दंग रह गए। तब एकलव्य ने उस मूर्ति को सबके सामने दिखाया जिसे देख कर एकलव्य प्रैक्टिस किया करते थे। ये सब देखकर गुरु द्रोणाचार्य को गर्व हुआ और उन्होंने अपनी शिक्षा का परिचय देने केलिये एकलव्य से कहा तभी वहां पर एक कुत्ता आ जाता है जो लगातार भौंक रहा था।

दोस्तो तभी एकलव्य ने अपनी विद्या को प्रदर्शित करते हुए उस कुत्ते के मुंह में धनुष को भेद दिया। ये देख कर गुरु द्रोणाचार्य की आंखे खुली की खुली रह गई और तब गुरु द्रोणाचार्य ने एकलव्य से उनका पुरा परिचय लिया।

एकलव्य वर्थराज हिरण्य धनु के पुत्र थे। उनके पिता मगध के राजा जराशंध के लिए सेना नायक थे। लेकिन उस वक्त हस्तिनापुर और मगध के बीच कुछ भी ठीक नही था। दोनों के बीच काफी तनाव था और आने वाले कल में मगध और हस्तिनापुर के बीच जंग हो सकता था। ये सारी बाते गुरु द्रोणाचार्य को चिंतित करने लगे की अगर ऐसी कोई जंग हुई तो हस्तिनापुर नही बचेगा।

क्योंकि दोस्तो जिस उम्र में बच्चे धनुर विद्या का ज्ञान लेने लायक नहीं होते थे, उस उम्र में एकलव्य का इतना अच्छा धनुर्धन होना चिंता का विषय बन गया था। इसलिए गुरु द्रोणाचार्य ने एकलव्य से गुरु दक्षिणा की बात की और एकलव्य इसे सौभाग्य समझ कर देने को तैयार भी हो गए।

गुरु द्रोणाचार्य ने गुरु दक्षिणा के रूप में एकलव्य से उनके दाहिने हाथ का अंगूठा मांग लिया और एक वादा लिया की वो अपने नगर चले जाएंगे और फिर दुबारा हस्तिनापुर में कदम नही रखेंगे। गुरु द्रोणाचार्य को दक्षिणा देने के बाद एकलव्य ने वैसा ही किया जैसा उन्होंने वादा किया था।

उसके बाद वो फिर कभी हस्तिनापुर नहीं आए। महाभारत युद्ध में हर नगर के राजा आए सभी ने भाग लिया लेकिन उस युद्ध में एकलव्य का कभी जिक्र नहीं होता है।

Conclusion of Short Motivational Story In Hindi With Moral

दोस्तो यह कहानी जितनी Motivational है उसके साथ साथ उतनी ही inspirational भी है। इस कहानी से हमे बहुत कुछ सीखने को मिलता है मैं उन सबको हाईलाइट करना चाहूंगा।

गुरु के प्रति समर्पण का भाव रखे

दोस्तो अगर भाव समर्पण का है तो दुनिया की कठिन से कठिन कार्य को भी सीखा जा सकता है। गुरु पर भरोसा करना, किसी भी ज्ञान को सीखने की पहली सीढ़ी हैं। अगर आप अपने गुरू पर भरोसा ही नहीं करोगे तो कैसे सिख पाओगे। इसलिए दोस्तो पहला और काफी महत्वपूर्ण सीढ़ी यह है की अपने गुरु के प्रति समर्पित होना।

Problems पर नही solution पर focus करे

दोस्तो जितना आपके पास resource हैं उसको अच्छे से यूटिलाइज करे। आपको जो भी मिलता है उसका कैसे इस्तेमाल कर सकते हैं वो देखे। एकलव्य ये बहाना बना सकते थे की उनके पास तो गुरु ही भी है तो वो सीखेंगे कैसे। लेकिन, उन्होंने ऐसा नहीं किया और उन्होंने पूरी श्रद्धा से देख कर सीखा और सुन कर सीखा।

अपनी कही हुई बात पर अटल रहना

दोस्तो एकलव्य चाहते तो अपनी बात से मुकर सकते थे की गुरु द्रोणाचार्य ने गुरु दक्षिणा के रूप में उनका अंगूठा ही मांग लिया था। जिस विद्या को प्राप्त करने के लिए इतनी मशकत की हो अगर वही मांग ली जाए तो कैसा लगेगा यह हर कोई जानता है। पर उन्होंने ऐसा नहीं किया।

दोस्तो अपने आप को ऐसे ही मोटिवेट करते रहिए और motivational Stories को पढ़ते रहिए और अपने माइंडसेट को बदलते रहिए। दोस्तो यह शार्ट मोटिवेशनल स्टोरी इन हिंदी विथ मोरल आपको कैसी लगी आप हमे नीचे कमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके में जरूर बताइए।

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