गौतम बुद्ध का जीवन परिचय और उनकी शिक्षाएं | Gautam Buddha Biography

गौतम बुद्ध का जीवन परिचय और उनकी शिक्षाएं | Gautam Buddha Biography in Hindi

नमस्ते मेरे प्यारे भाईयो और बहनों आप सभी का नॉलेज ग्रो हिंदी ब्लॉग पर स्वागत है। दोस्तो आज के इस आर्टिकल जरिए हम आपके साथ गौतम बुद्ध का जीवन परिचय और उनकी शिक्षाएं हिंदी में शेयर करने वाले हैं। तो बिना समय गंवाए चलिए आपके साथ गौतम बुद्ध की जीवनी और उनकी शिक्षाएं हिंदी में शेयर करते हैं।

gautam buddha biography in hindi | गौतम बुद्ध की जीवनी
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गौतम बुद्ध का जीवन परिचय और उनकी शिक्षाएं | Gautam Buddha Biography in Hindi

दोस्तो गौतम बुद्ध का जीवन परिचय हिंदी आर्टिकल को पढ़ना शुरू करने से पहले आपको कुछ बातें जान लेनी चाहिए , जैसे कि आपकी जो भी मान्यताएं हैं , गौतम बुद्ध के बारे में उनकी शिक्षाओं के बारे में, हो सकता है। यह आर्टिकल उन धारणाओं को तोड़ दे, यहां हो सकता है कहना गलत होगा क्योंकि यह होना निश्चित है क्योंकि यह आर्टिकल एक प्रहार है ।

दोस्तो जिन लोगों में इस प्रहार को झेलने की शक्ति है, और जिन लोगों में सत्य को देखने की शक्ति है वही इस आर्टिकल को पढ़ें। किसी की भावनाओं को ठेस पहुँचाना हमारा उदेश्य नही है , मगर सच कहने से हम पीछे भी नही हटेंगे। इस आर्टिकल में दी गई जानकारी का स्रोत गौतम बुद्ध के जीवन पर आधारित 10 से भी ज्यादा किताबें , इंटरनेट और मेरे और मेरे गुरुजनों का अनुभव है।

गौतम बुद्ध का जीवन परिचय आर्टिकल को लिखने का कारण

गौतम बुद्ध की जीवनी को लिखने के पीछे मेरा बस यही उद्देश्य है कि मैं आपको उस सत्य से अवगत करा सकूं , जो ज्यादातर लोगों से छिपा हुआ है। गौतम बुद्ध की जीवनी के द्वारा मैं आपको बुद्ध से मिलवाना चाहता हूं, जिनकी संगत में अगर कोई आ जाए तो वह आदमी किसी को भला बुरा कह भी नही सकता और किसी का भला बुरा कर भी नहीं सकता।

अगर आप बुद्ध से मिलना चाहते हैं, तो मेरे साथ चलिए। मेरा विश्वास कीजिए अगर आप अच्छे और बुरे को छोड़ पाए, तो आप सच से मिल पाएंगे। गौतम बुद्ध की जीवनी को पढ़ते वक्त ध्यान रखने योग्य बात सिर्फ यह है कि जब तक आप इस आर्टिकल को पढ़ रहे हैं, तब तक आप भूल जाईए की आप किस जाति या धर्म से हैं। बस आप मान लीजिए की आप एक खाली पन्ना हैं जिसपर बुद्ध उतरने वाले हैं।

गौतम बुद्ध की जीवनी सरल शब्दों में | Gautam Buddha Biography in Hindi

दोस्तो इस कहानी की शुरुआत होती है, राजा शुद्धोधन और रानी महामाया से, कहने को तो ये दोनों राजा रानी थे, परंतु इनके जीवन में एक गहन पीड़ा थी। शादी के कई वर्ष बीत जाने के बाद भी इनकी कोई संतान नहीं थी जिसके कारण रानी महामाया अपने आप को बाँझ समझने लगी थीं।

रानी महामाया की संतान प्राप्ति की इच्छा इतनी प्रबल थी कि उन्होंने अपने ही पति का विवाह अपनी सगी बहन प्रजापति से करा दिया था, परंतु दुर्भाग्य के कारण रानी प्रजापति को भी कोई संतान नहीं होती, जिसके कारण रानी महामाया का दुख और बढ़ जाता है। राजा शुद्धोधन के भाई द्रोणोधन का एक पुत्र था, जिसका नाम देवदत्त था।

रानी महामाया देवदत्त को अपने पुत्र की तरह प्रेम देती थीं। परंतु देवदत्त की मां जिसका नाम मंगला था, वह महामाया और प्रजापति से बहुत ईर्ष्या करती थी क्योंकि वह नहीं चाहती थी कि महामाया या प्रजापति को कोई संतान हो क्योंकि वह अपने पुत्र को युवराज बनाना चाहती थी । युवराज का अर्थ होता है जो भविष्य में राजा बने।

जब हर प्रयास के बाद भी रानी महामाया और रानी प्रजापति को संतान की प्राप्ति नहीं होती, तब रानी महामाया तय करती हैं कि वे संतान प्राप्ति के लिए पुत्रकामेष्टि यज्ञ कराएंगे। पुत्रकामेष्टि यज्ञ के लिए कुल गुरु वाचस्पति को महल बुलाया जाता है और यज्ञ कराने के लिए सही समय पूछा जाता है।

कुलगुरू वाचस्पति बताते हैं कि अब से कुछ समय बाद एक ऐसा मुहूर्त आने वाला है जिसमें पुत्र कामेस्टि यज्ञ कराने से संतान की प्राप्ति निश्चित है। कुलगुरु की बात सुन, राजा और दोनों रानियां बहुत प्रसन्न होते हैं और यज्ञ की तैयारियों में लग जाते हैं। कुछ समय बाद सही मुहूर्त पर यज्ञ संपन्न किया जाता है।

यज्ञ समाप्त होने के बाद कुलगुरु वाचस्पति राजा शुद्धोधन से कहते हैं कि, महाराज आप जिस भी रानी से संतान चाहते हैं, आज रात उन्हीं से मिलन करें। रात होती है और राजा शुद्धोधन रानी महामाया के पास पहुंचते हैं, परंतु रानी महामाया राजा शुद्धोधन को रानी प्रजापति के पास भेज देती हैं।

Gautam Buddha Biography in Hindi | गौतम बुद्ध की जीवनी

रानी महामाया की बात मान राजा शुद्धोधन रानी प्रजापति के कक्ष में पहुंचते हैं , परंतु रानी प्रजापति उन्हें यह कहकर वापस भेज देती हैं कि वे मिलन के लिए तैयार नहीं हैं।

रानी प्रजापति मिलन के लिए तैयार तो थीं परंतु वे चाहती थीं कि संतान की प्राप्ति पहले उनकी बड़ी बहन महामाया को ही हो इसलिए वे राजा शुद्धोधन को रानी महामाया के पास भेज देती हैं ।

उस रात महामाया को एक अजीब सा स्वप्न दिखता है। उस स्वप्न में रानी महामाया देखती हैं कि आकाश से एक सफेद हाथी अपने सूंढ में एक लाल कमल का पुष्प लेकर उनकी तरफ बढ़ रहा है। अगले दिन सुबह होते ही रानी महामाया अपने स्वप्न के बारे में राजा शुद्धोधन को बताती हैं।

राजा शुद्धोधन अपने राज्य के समस्त ज्ञानियों को महल बुलवाते हैं और उनसे इस स्वप्न का अर्थ पूछते हैं। सभी ज्ञानी इस स्वप्न को शुभ बताते हैं। कुछ दिनों बाद अचानक रानी महामाया की तबीयत खराब हो जाती है, राजा शुद्धोधन तुरंत वैद्यराज को बुलवाते हैं। वैद्यराज आते हैं और रानी महामाया की हाथ की नाड़ी देख कहते हैं, बधाई हो राजन! रानी महामाया गर्भ से हैं।

गौतम बुद्ध का जन्म (Gautam Buddha Birth)

वैद्यराज के द्वारा इन शब्दों को सुनते ही राजा शुद्धोधन खुशी के मारे फुले नहीं समाते। राजा शुद्धोधन के साथ – साथ पूरे कपिलवस्तु में खुशी की लहर दौड़ पड़ती है। सभी लोग बहुत प्रसन्न होते हैं। केवल दो लोगों को छोड़कर राजा शुद्धोधन का छोटा भाई द्रोणोधन और उसकी पत्नी मंगला।

ये दोनों नहीं चाहते थे कि राजा शुद्धोधन पिता बने क्योंकि ये अपने पुत्र देवदत्त को राजा शुद्धोधन की जगह दिलाना चाहते थे। उसे राजा बनाना चाहते थे। अपने पुत्र को राजा बनाने के लालच में द्रोणोधन और मंगला महामाया की संतान को कोख में ही मारने तक का षड्यंत्र रचते हैं । परंतु लाख षड्यंत्र रचने के बाद भी मंगला और द्रोणोधन असफल रहते हैं।

जब कोई षड्यंत्र काम नही आता, तब मंगला अपनी आखिरी चाल चलती है। वह रानी महामाया के पास जाती है और उनसे कहती है की महारानी, महाराज का जीवन संकट में है। रानी महामाया मंगला से पूछती हैं , परंतु क्यों ? क्या कारण है ? मंगला कहती है ज्योतिषियों ने कहा है कि यदि महारानी महामाया अपनी संतान को कपिलवस्तु में जन्म देती हैं तो यह राजा शुद्धोधन के लिए खतरनाक हो सकता है।

और उनकी जान भी जा सकती है। मंगला ने रानी महामाया से ऐसा इसलिए कहा था क्योंकि प्रसव का समय करीब था, और मंगला चाहती थी कि महामाया और उनकी होने वाली संतान देवदाह के लिए प्रस्थान कर दें , जिससे की मार्ग में ही कोई अनहोनी होने की संभावना ज्यादा से ज्यादा बढ़ जाए।

रानी महामाया मंगला की बात को सच मान लेती हैं और महाराज को उन्हें देवदाह भेजने के लिए मना लेती हैं। देवदाह रानी महामाया और रानी प्रजापति का पीहर था। राजा शुद्धोधन महामाया के साथ रानी प्रजापति तथा उन सभी लोगों को भेजते हैं जो उनकी सुरक्षा कर सकें , जिसमें सैकड़ों की संख्या में सैनिक भी शामिल होते हैं।

महामाया और उनके साथ के सभी लोग देवदाह के लिए प्रस्थान कर देते हैं। लंबा सफर तय करने के बाद महामाया और सभी लोग लुंबिनी वन पहुंचते हैं। तब तक रात भी हो चुकी थी। रानी महामाया और प्रजापति दोनों बहने तय करती हैं कि रात लुंबिनी वन में ही बताई जाएगी। लुंबिनी वन रात बिताने के लिए एक सुरक्षित और सुंदर जगह थी।

भगवान बुद्ध का जन्म कब और कहां हुआ (Gautam Buddha Birth Place)

पूर्णिमा का दिन था और पूरा लुंबिनी वन चंद्रमा की रोशनी से जगमगा रहा था। वन की सुंदरता देख रानी महामाया प्रजापति के साथ वन में टहलने के लिए चली जाती हैं। टहलते टहलते अचानक महामाया को पीड़ा होने लगती है। पीड़ा इतनी बढ़ जाती है कि वे एक कदम भी आगे नहीं चल पाती और एक पेड़ की डाल पकड़ कर खड़ी हो जाती हैं।

रानी प्रजापति, दाई और महामाया की दासियों को बुलाती हैं। सभी लोग दौड़कर महामाया के पास पहुंचते हैं। दाई महामाया को देखते ही समझ जाती हैं कि प्रसव का समय नज़दीक आ चुका है, अब से कुछ ही क्षणों में रानी महामाया अपनी संतान को जन्म दे देंगी।

महामाया को चारों ओर से कपड़ों की दीवार बनाकर ढक लिया जाता है और फिर कुछ ही क्षणों बाद उस युग पुरुष का जन्म होता है जिसे हम गौतम बुद्ध के नाम से जानते हैं। अगले दिन राजा शुद्धोधन का सार्थी सूर्या उनके पास सुबह सुबह ही पहुंच जाता है ।

राजा शुद्धोधन अपने सार्थी को देख चौंकते हैं और उससे पूछते हैं, तुम यहां क्या कर रहे हो सूर्या ? मैंने तो तुम्हें रानी महामाया के साथ भेजा था। सार्थी कहता है बधाई हो महाराज रानी महामाया ने लुंबिनी वन में पुत्र को जन्म दिया है।

गौतम बुद्ध का जीवन परिचय

सार्थी का संदेश सुन राजा बहुत प्रसन्न होते हैं और उससे कहते हैं मांगो सूर्या मांगो आज जो मांगना है मांगो तुमने यह संदेश देकर मुझ पर बहुत बड़ा उपकार किया है। सार्थी कहता है , नहीं महाराज मुझे ज्यादा कुछ नहीं चाहिए बस जिस प्रकार मैं आपका सार्थी रहा हूं , उसी प्रकार मेरे पुत्र चन्ना को भी युवराज का सार्थी बना देना।

रथ चलाने वाले को सार्थी कहते हैं। राजा शुद्धोधन कहते हैं, ऐसा ही होगा। फिर राजा अपने सार्थी और कुछ सैनिकों के साथ लुंबिनी वन के लिए प्रस्थान कर देते हैं। कुछ समय बाद राजा लुंबिनी वन पहुंच जाते हैं , परंतु अपने पुत्र से मिल नहीं पाते क्योंकि

रानी प्रजापति राजा शुद्धोधन से कहती हैं महाराज अगले कुछ दिनों तक ना तो आप रानी महामाया से मिल सकते हैं और ना ही अपने पुत्र से, क्योंकि यही नियम है। राजा शुद्धोधन कहते हैं , ठीक है , हम नियमों का पालन करेंगे परंतु क्या मैं अपने पूत्र को छू भी नही सकता? रानी ? प्रजापति कहती हैं नही महाराज अभी कुछ दिन आपको प्रतीक्षा करनी ही होगी।

फिर सभी लोग महल वापस लौट आते हैं। जब राजा शुद्धोधन अपनी दोनों पत्नी और पुत्र के साथ महल पहुंचते हैं तो सभी लोग उनका हंसते हुए चेहरों से स्वागत करते हैं, परंतु द्रोणोधन और मंगला अपने चेहरे पर झूठी खुशी दिखाते हैं। राजा शुद्धोधन अपने पुत्र के नामकरण के लिए अपनी बहन अमिता को देवदाह से बुलवाते हैं।

उस समय यह प्रथा था कि बच्चे का नाम उसकी बुआ ही रखती थी। अमिता का ससुराल देवदाह इसलिए था क्योंकि अमिता का विवाह रानी महामाया के भाई से हुआ था। जन्म के पाँच दिन बाद बच्चे का नामकरण किया जाता है। शुद्धोधन की बहन अमिता बच्चे का नाम सिद्धार्थ रखती है।

सिद्धार्थ नाम सुन सभी लोग बहुत प्रसन्न होते हैं। राजा शुद्धोधन नामकरण के अगले ही दिन अपने राज्य के बड़े बड़े ज्ञानियों को बुलवाते हैं और उनसे कहते हैं कि मैं अपने पूत्र का भविष्य जानना चाहता हूँ। सभी ज्ञानी भविष्य देखना शुरु करते हैं और राजा शुद्धोधन से कहते हैं, महाराज युवराज बुद्धिमान होंगे, रूपवान होंगे, शक्तिशाली होंगे।

उनके भीतर हर वो गुण होगा जिससे इस संसार को जीता जा सके। महाराज युवराज का नाम सिद्धार्थ है और इस तरह से वे सिद्धार्थ गौतम के नाम से जाने जाएंगे। राजा शुद्धोधन कहते हैं सिर्फ सिद्धार्थ गौतम के नाम से नहीं बल्कि सम्राट सिद्धार्थ गौतम के नाम से जाने जायेंगे।

वे सभी ज्ञानी कहते हैं जी महाराज ऐसा ही होगा। वे ज्ञानी लोग राजा को यह तो बता देते हैं कि सिद्धार्थ के भीतर एक सम्राट के गुण हैं, परंतु वे यह नहीं बताते कि सिद्धार्थ के भीतर एक सन्यासी के भी गुण हैं क्योंकि वे सभी राजा के क्रोध को जानते थे। वे जानते थे कि राजा अपने पुत्र को सम्राट ही बनाना चाहते हैं, इसलिए सभी ज्ञानी वही बताते हैं जो राजा सुनना चाहते थे।

सिद्धार्थ के जन्म के सात दिन पश्चात रानी महामाया की मृत्यु हो जाती है। मृत्यु से पहले ही रानी महामाया को यह आभास होने लगा लगा था कि उनका समय पूरा हो गया है । इसलिए उन्होंने पहले ही अपनी बहन प्रजापति से यह वचन ले लिया था, कि वे उनके पुत्र को अपने पुत्र की तरहपालेंगी और सिद्धार्थ को कभी पता नहीं लगने देंगी कि उनकी मां इस दुनिया में नहीं है।

गौतम बुद्ध का बचपन (Gautam Buddha Early Life)

जब सिद्धार्थ तीस दिन के हो जाते हैं तो पुत्र और पिता के मिलन का समय आता है । राजा शुद्धोधन से कहा जाता है कि वे अपने पुत्र को देख सकते हैं , परंतु राजा अपने पुत्र को देखने से यह कहते हुए मना कर देते हैं कि जिसने मेरी माया को मुझसे छीन लिया, मैं उस पुत्र को नहीं देखना चाहता।

गौतम बुद्ध का जीवन परिचय

परंतु रानी प्रजापति के समझाने पर वे अपने पुत्र को देखते हैं और उसमें अपनी पत्नी माया की झलक पाते हैं। उसी क्षण वहाँ द्रोणोधन की पत्नी मंगला आ जाती है और राजा शुद्धोधन से कहती है , महाराज मैं आपसे कुछ मांगना चाहती हूं । राजा कहते हैं मांगो मंगला क्या मांगना चाहती हो ?

मंगला कहती है महाराज मैं आपसे आपका पुत्र मांगना चाहती हूं। मैं चाहती हूं कि आप के पुत्र की परवरिश मैं करूं। राजा कहते हैं, मैं तुम्हें अपना पुत्र अवश्य दे देता परंतु यह महामाया की आखिरी इच्छा थी कि उसके पुत्र को प्रजापति पाले और मैं उसकी आखरी इच्छा को नकार नहीं सकता।

इसलिए मैं तुम्हें सिद्धार्थ को नहीं दे सकता। मंगला चाहती थी कि वह सिद्धार्थ को गोद लेकर अपने हाथों की कठपुतली बना ले जिससे कि जो वह चाहे सिद्धार्थ वही करे , परंतु ऐसा नहीं हो पाता। उसी क्षण महल के बाहर से लोगों का शोर सुनाई देता है । राजा अपने सैनिक से पूछते हैं। यह शोर कैसा है ?

सैनिक कहता है महाराज राज्य की जनता अपने युवराज को देखना चाहती है। इतने में ही एक और सैनिक आता है और राजा से कहता है। महाराज महल के द्वार पर एक वृद्ध मुनिवर आपसे मिलने की इच्छा लेकर पधारे हैं। राजा पूछते हैं , कौन है वो ? सैनिक कहता है मूनिवर ने अपना नाम असित मुनि बताया है। राजा कहते हैं क्या मुनिवर असित पधारें हैं , मैं खुद उनका स्वागत करूंगा।

असित मूनि एक महान तपस्वी थे। जो शाक्यों के कुलगुरु भी रह चुके थे। वे इतने ज्ञानी थे कि उनकी भविष्यवाणी कभी भी गलत साबित नहीं होती थी। राजा शुद्धोधन अपने छोटे भाइयों के साथ असित मुनि के स्वागत के लिए महल के द्वार पर पहुंचते हैं और असित मुनि को पैर छूकर प्रणाम करते हैं और कहते धन्य हु जो आप हमारे महल पधारे।

असित मुनि कहते हैं , मैं तुझसे मिलने नहीं आया हूं राजन ! मैं तो उस युग पुरुष के दर्शन करने आया हूं जिसने तेरे यहां पुत्र बनकर जन्म लिया है। राजा कहते हैं अवश्य मूनिवर और अपने पुत्र को असित मुनि के हाथों में थमा देते हैं और कहते हैं जिसकी प्रतीक्षा करते – करते आधी उम्र बीत गई । अब आया है ये ! असित मुनि कहते हैं ,

केवल तू ही नहीं राजन , सारा जग इसकी प्रतीक्षा कर रहा था । असित मुनि सिद्धार्थ को पालने में लिटा देते हैं और उनके चारों ओर घूमकर परिक्रमा करने लगते हैं। राजा यह देखकर थोड़ा आश्चर्यचकित होता है और असित मूनि से पूछता है , मुनिवर यह आप क्या कर रहे हैं ? असित मुनि कहते हैं ब्रह्मांड की परिक्रमा ! फिर असित मुनि सिद्धार्थ के पैरों में अपना सिर रखकर रोने लगते हैं।

असित मुनि को रोता देख राजा पूछते हैं , क्या हुआ मुनिवर आप रो क्यों रहे हैं ? क्या कोई संकट है इस बालक के भविष्य पर ? असित मुनि कहते हैं नहीं राजन मैं बालक के लिए नहीं, अपने लिए रो रहा हूं। अब मैं वृद्ध हो गया हूं , बहुत दिन जीवित नहीं रहूंगा। मैं इस बालक को बुद्ध बनते नहीं देख सकूंगा।

असित मुनि की बात सुनते ही राजा क्रोधित हो जाता है और असित मुनि से कहता है मुनिवर यह कोई ज्ञानी वैरागी नहीं बल्कि सम्राट बनेगा। यह बुद्ध नहीं योद्धा बनेगा, एक ऐसा योद्धा जिसकी तलवार के सामने बड़े – बड़े महारथी भी काँप उठेंगे। यदि आपको इसे आशीर्वाद देना ही है तो ऐसा आशीर्वाद दीजिए कि यह हर युद्ध में विजयी हो।

असित मुनि कहते हैं , ऐसा ही होगा। जीवन के हर युद्ध में यह विजयी होगा पर वह युद्ध भावनाओं का होगा। यह सारे ब्रह्मांड पर राज करेगा , पर वह ब्राह्मण मन के भीतर होगा। असित मुनि कहते हैं , इस बालक के शरीर के सभी गुण बताते हैं कि यह भविष्य में बुद्ध होगा। राजा कहता है गुण चाहें जो भी कहते हो , परंतु थामेगा यह बालक तलवार ही।

Gautam Buddha Biography in Hindi | गौतम बुद्ध की जीवनी

असित मुनि कहते हैं तलवार से केवल राज्य जीते जाते हैं परंतु तेरा पुत्र मन जीतेगा , युद्ध से केवल सीमाएं बदलती है परंतु तेरा पुत्र युग बदलेगा। राजा कहता है यदि यह लेख विधाता का है तो मैं उससे भी लड़ जाऊंगा ! इतनी राग रागनियां भर दूंगा इसके चारों तरफ की वैराग्य का विचार भी इसे बुरा लगेगा ।

असित मूनि कहते हैं , चाहे लाख जतन कर ले राजन , परंतु तेरा पुत्र सन्यासी ही बनेगा। इतना कहकर असित मुनि वहां से चले जाते हैं । राजा शुद्धोधन असित मुनि से कह तो देते हैं कि वे अपने पुत्र को सम्राट ही बनाएंगे परंतु भीतर ही भीतर उन्हें चिंता सताने लगती है कि कहीं उनका पुत्र सन्यासी ही ना बन जाए।

अपनी इस चिंता को लेकर राजा शुद्धोधन कुलगुरु के पास जाते हैं और उन्हें अपनी समस्या बताते हैं। कुल गुरु कहते हैं राजन असित एक सन्यासी हैं इसलिए उन्हें सिद्धार्थ की महानता एक सन्यासी बनने में लगती है और आप एक राजा है इसलिए आपको सिद्धार्थ की महानता एक राजा बनने में लगती है।

सवाल यह नहीं है कि सिद्धार्थ क्या बनेंगे ? सवाल यह है कि आप उन्हें क्या बनाना चाहते हैं? अगर आप उन्हें एक सम्राट बनाना चाहते हैं तो उन्हें एक सम्राट बनने की प्रक्रिया से गुजारिए। अगर आप उन्हें एक सन्यासी बनने से रोकना चाहते हैं तो उन्हें वैराग्य से दूर रखिए। जीवन के ऐसे सत्यों से दूर रखिए जो उनके मन में वैराग्य उत्पन्न करें।

उन्हें कठोर बनाइए , शक्तिशाली बनाइए, कोमल और करुणावान नही। कहा जाता है कि उसी रात राजा शुद्धोधन अपने पुत्र सिद्धार्थ को उढ़ाने के लिए लोहे की पतली चादर भेजते हैं ताकि सिद्धार्थ अभी से लोहे से खेलना सीख जाएं। जब रानी प्रजापति उस लोहे की चादर को देखती हैं, तो बहुत चिंतित होती परंतु राजा शुद्धोधन की आज्ञा का पालन सबको करना पड़ता है।

गौतम बुद्ध का प्रारंभिक जीवन – Gautam Buddha Early Life

अगले दिन राजा एक बैठक बुलवाते हैं जिसमें राज्य के सभी महत्वपूर्ण लोग शामिल होते हैं । राजा सभी लोगों से पूछते हैं कि ऐसा क्या किया जाए कि असित मुनि की भविष्यवाणी गलत साबित हो जाए ? सभा के सभी लोग राजा शुद्धोधन को अलग – अलग राय देते हैं।

परंतु सभी सुझावों का निष्कर्ष यही निकलता है कि रोगी , वृद्ध , गरीब , यानी जो लोग दुखी हैं , वहीं संन्यास लेने के बारे में सोचते हैं इसलिए सिद्धार्थ को इन सभी से दूर रखना होगा। राजा शुद्धोधन सभी सुझावों को सुनने के बाद सभा के सभी लोगों से पूछते हैं कि ऐसा क्या किया जाए कि सिद्धार्थ हर दुख और हर दुखी से दूर रहे।

राजा शुद्धोधन की बात सुन उनका सेनापति कहता है महाराज क्यों ना हम राज्य के सभी वृद्ध , रोगी और दुखी मनुष्यों को राज्य के बाहर कर दें। सेनापति की बात सुन मंत्री कहता है, ऐसा नहीं हो सकता महाराज क्योंकि हमारा कर्तव्य प्रजा की सेवा करना है ना कि उन पर अत्याचार करना।

राजा शुद्धोधन कहते हैं , हम प्रजा पर अत्याचार नहीं करेंगे बल्कि उन्हें एक उचित जीवन देंगे। मंत्री पूछता है परंतु वो कैसे महाराज ? राजा कहते हैं हम एक अलग नगर का निर्माण करेंगे जिसमें सभी वृद्ध , बीमार और दुखी मनुष्य रहेंगे।

Gautam Buddha Biography in Hindi | गौतम बुद्ध की जीवनी

मंत्री कहता है परंतु महाराज इस निर्णय को हम अकेले नहीं ले सकते । हमें शाक्य सभा बिठानी होगी। राजा कहते हैं , चाहे कुछ भी हो जाए यह निर्णय सभा में पारित होना ही चाहिए क्योंकि मैं अपने पुत्र को सन्यासी बनते नहीं देख सकता। सभा बुलाई जाती हैं और धन और बल के जोर पर राजा का निर्णय पारित हो जाता है।

नगर के सभी लोगों को राजा के सैनिकों के द्वारा यह सूचना दी जाती है कि एक नई नगरी का निर्माण किया जा रहा है जिसमें सभी वृद्धि , रोगी और आर्थिक रुप से कमजोर लोगों को भेजा जाएगा। राजा शुद्धोधन यह दिखावा करते हैं कि यह निर्णय प्रजा की भलाई के लिए है और लोग भी यह मान लेते हैं कि राजा का निर्णय उनकी भलाई के लिए है।

परंतु मंगला अपनी दासी के द्वारा लोगों तक यह बात पहुंचा देती है कि राजा शुद्धोधन अपने स्वार्थ के लिए नई नगरी का निर्माण कर रहे हैं। मंगला ऐसा इसलिए करती है क्योंकि वह सिद्धार्थ को सन्यासी ही बनते देखना चाहती थी। मंगला रानी प्रजापति को भी भड़काती है कि राजा शुद्धोधन उचित नहीं कर रहे हैं।

रानी प्रजापति नई नगरी की बात सुन राजा शुद्धोधन के पास जाती हैं और उनसे पूछती हैं , यह कैसा न्याय है महाराज ? मुनिवर असित की भविष्यवाणी के कारण आप पूरे कपिलवस्तु को बेघर कर रहे हैं। राजा कहते हैं एक अच्छे भविष्य के लिए वर्तमान को दंड भुगतना ही पड़ता है।

रानी प्रजापति पूछती है , किसका अच्छा भविष्य महाराज ? राजा कहते हैं , कुमार सिद्धार्थ का ! रानी पूछती हैं तो प्रजा क्यों दंड भुगते ? प्रजा का क्या अपराध है ? अभी भी समय है महाराज अपना आदेश वापस ले लीजिए वरना प्रजा की बदुआएँ हमें जीने नहीं देंगी । क्या मिलेगा आपको प्रजा को दुख पहुंचाकर ?

राजा कहते हैं कपिलवस्तु का भावी सम्राट ! जो संपूर्ण भारतवर्ष पर राज करेगा। रानी कहती हैं प्रजा को दुखी कर कर कोई राजा खुश नहीं रह सका है । किस – किस से दूर रखेंगे आप कुमार को ? प्रकृति के भेद छुपाए नहीं छुपते। आप उनसे मनुष्य के दुखों को तो छुपा सकते हैं , परंतु वृक्षों के गिरते हुए पीले पत्तों को कैसे छुपाएँगे ?

मुरझाते हुए फूलों को कैसे छुपाएँगे ? रानी प्रजापति की लाख कोशिशों के बाद भी राजा शुद्धोधन नहीं मानते और राज्य के सभी वृद्ध , बीमार और गरीब लोगों को नई नगरी भेजना शुरू कर देते हैं ।

गौतम बुद्ध का जीवन परिचय

लोग रोते हैं , चीखते हैं , चिल्लाते हैं , परंतु उनकी एक नहीं सुनी जाती । कहा जाता है कि जिस रात सभी दुखी लोगों को नई नगरी भेजा जा रहा था , उसी समय सिद्धार्थ की आंखों से भी आंसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे।

रानी प्रजापति यह देखकर राजा शुद्धोधन के पास जाती हैं और उनसे कहती हैं महाराज राज्य के सभी दुखी लोगों को तो आपने नई नगरी भेज दिया है , परंतु एक दुखी अभी भी यहां है । राजा पूछते हैं , कौन है वो ? रानी कहती हैं कुमार सिद्धार्थ ! उनके आंसू नींद में भी रुकने का नाम नहीं ले रहे हैं।

राजा तुरंत वैद्य को बुलाने का आदेश देते हैं । रानी प्रजापति राजा से कहती हैं , दुख केवल तन में ही नहीं होता , मन में भी होता है। आप तन के दुख को तो दूर कर सकते हैं, परंतु मन के दुख को कैसे दूर करेंगे महाराज ? राजा कहते हैं क्षत्रिय के मन में केवल स्वाभिमान होता है, दुख नहीं।

वैद्य आता है और सिद्धार्थ को देखता है और राजा से कहता है , युवराज को शारीरिक कोई समस्या नहीं है। अवश्य ही इन्होंने कोई डरावना सपना देख लिया होगा जिसके कारण नींद में इनके आंसू बह रहे होंगे ।

राजा शुद्धोधन वैद्य से कहते हैं। आज से आप अपने परिवार के साथ राजमहल में ही रहेंगे और देखेंगे कि सिद्धार्थ या राजमहल के किसी भी व्यक्ति को कोई भी शारीरिक दुख ना हो । कहा जाता है कि राजा शुद्धोधन ने अपने सैनिकों को यह आदेश दे दिया था कि राज्य में कोई भी शमशान नहीं रहेगा।

जहां जहां तक सिद्धार्थ जाएंगे , वहां पेड़ों पर सूखी पत्ती तक नहीं दिखनी चाहिए। फूलों की बेल या वृक्षों पर कोई मुरझाया फूल नहीं दिखना चाहिए। वृद्ध , बीमार और गरीब लोगों को तो नई नगरी भेज ही दिया गया था। समय बीतता है और सिद्धार्थ और देवदत्त बड़े होने लगते हैं । देवदत्त की रुचि तो अस्त्र शस्त्र चलाने में होती है परंतु सिद्धार्थ की रुचि प्रकृति में होती है।

सिद्धार्थ अपना ज्यादातर समय पशु पक्षियों के साथ बिताना पसंद करते हैं। जब सिद्धार्थ की आयु लगभग 8 वर्ष हो जाती है तब उन्हें प्रथम बार न्याय सभा ले जाया जाता है । न्यायसभा जाने से पहले और वहाँ पहुँचने के बाद की दो बड़ी कमाल की घटनाएं हैं , जिन्हें मैं आपको थोड़े विस्तार से समझाना चाहूंगा।

जब रानी प्रजापति सिद्धार्थ को न्याय भेजने के लिए तरह – तरह के आभूषणों से सजा रही होती हैं तब सिद्धार्थ रानी प्रजापति से पूछते हैं माँ क्या न्याय सभा जाने के लिए इतने सारे आभूषण पहनना जरूरी है ? रानी प्रजापति सिद्धार्थ से कहती हैं , पुत्र तुम युवराज हो आभूषण तो तुम्हें पहनने ही पड़ेंगे।

सिद्धार्थ पूछते हैं क्या बिना आभूषण पहने युवराज , युवराज नहीं रहते। रानी प्रजापति कहती हैं। तुम्हारा नाम सिद्धार्थ नहीं प्रश्न होना चाहिए था। दूसरी घटना जब सिद्धार्थ और देवदत्त न्याय सभा में पहुंच जाते हैं तो राजा शुद्धोधन की आज्ञा पाकर दो किसान न्याय सभा में उपस्थित होते हैं।

गौतम बुद्ध की बचपन की कहानी (Gautam Buddha Story in Hindi)

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Gautam Buddha Story in Hindi | गौतम बुद्ध की बचपन की कहानी

राजा शुद्धोधन दोनों किसानों से कहते हैं। कहो , क्या याचना है ? उन दोनों किसानों में से एक किसान अमीर था और दूसरा गरीब। अमीर किसान का नाम गौरी था और गरीब किसान का नाम कुशल। गौरी राजा शुद्धोधन से कहता है महाराज इस कुशल ने मुझसे पिछले वर्ष अनाज उधार लिया था, यह कहकर कि यह मुझे इस वर्ष लौटा देगा।

परंतु महाराज इसने मुझे आज तक वह अनाज वापस नहीं लौटाया। कुशल कहता है , कैसे लौटाऊँ महाराज ? पिछले दो वर्ष से बरसात के कारण फसल नष्ट हो रही है। इस साल भी कुछ हाथ नहीं लगा। गौरी कहता कुशल असत्य बोल रहा है महाराज आप चाहे तो अपने सिपाहियों से पूछ सकते हैं जब वे इसे लेने गए थे, उस समय भी यह अपने गेहूं को तेल लगाकर बोरियों में भर रहा था।

कुशल कहता है महाराज मेरे पास दो ही बोरी गेहूं है। उसी से मैं अपने परिवार का पोषण पूरे वर्ष करूंगा। गेहूं को तेल लगाकर इसलिए रख रहा था ताकि वो खराब ना हों । अगर मैं उन दो बोरी गेहूं को भी गौरी को दे दूंगा तो हम खाएंगे क्या ? गौरी कहता है महाराज यदि यह मुझे अनाज नहीं दे सकता तो अपने खेत दे दे।

कुशल कहता है यदि मैं खेत दे दूंगा तो अनाज कभी ना लौटा पाऊंगा। दोनों पक्षों की बात सुनने के बाद राजा शुद्धोधन , सिद्धार्थ और देवदत्त से न्याय करने के लिए कहते हैं। देवदत्त कहता है महाराज पहले न्याय मैं करूंगा। राजा कहते हैं अवश्य । देवदत्त कहता है महाराज मेरा मत है कि कुशल ने गौरी को दिया हुआ वचन पूरा नहीं किया , इसलिए कुशल को गौरी को अपना खेत दे देना चाहिए।

देवदत्त का मत सुनते ही कुशल रोने लगता है। राजा शुद्धोधन सिद्धार्थ से पूछते तुम्हारा क्या मत है सिद्धार्थ ? सिद्धार्थ अपने आसन से खड़े होते हैं और कुशल के पास जा उसके आंसू पूछते हैं और कहते हैं महाराज यदि कुशल गौरी को अनाज दे देगा तो अपने परिवार का पेट कैसे पालेगा और अगर खेत दे देगा तो अनाज कहां से उगाएगा ?

और गौरी को उसका अनाज कहां से लौटाएगा। वैसे भी गौरी के पास अनाज का अभाव नहीं है । इसलिए हमें कुशल की अनाज लौटाने की अवधि बढ़ा देनी चाहिए। राजा शुद्धोधन कहते हैं , मैं देवदत्त के निर्णय से सहमत हूं क्योंकि कुशल ने गौरी को वचन दिया था , इसलिए कुशल को गौरी को कुछ ना कुछ तो देना ही पड़ेगा।

कुशल कहता है परंतु महाराज घर से चलते वक्त मेरे पास जो भी सिक्के थे , वे मैं गौरी को दे चुका हूं। गौरी कहता है महाराज कुशल असत्य बोल रहा है। इसने मुझे कुछ नहीं दिया। कुशल कहता है महाराज गौरी असत्य कह रहा है। गौरी कहता है महाराज भला मैं असत्य क्यों कहूँगा ? सिद्धार्थ कहते हैं महाराज यदि आपकी आज्ञा हो तो मैं सत्य का पता लगा सकता हूं। राजा कहते हैं अवश्य।

सिद्धार्थ गौरी से सिक्के लेकर पानी में डाल देते हैं और राजा शुद्धोधन से कहते हैं। महाराज ये सिक्के कुशल के हैं। राजा पूछते हैं इस बात का क्या प्रमाण है कि ये सिक्के कुशल के हैं । सिद्धार्थ कहते हैं जब कुशल ने गौरी को सिक्के दिए थे उस समय कुशल अपने गेहूं को तेल लगा रहा था और वह तेल इन सिक्कों पर अभी भी लगा हुआ है।

सिद्धार्थ की बुद्धिमता देख सभा के सभी सदस्य उनकी जय – जयकार करने लगते हैं। राजा शुद्धोधन कहते हैं , कुशल ने अपना वचन निभाया इसलिए कुशल की अनाज लौटाने की अवधि बढ़ा दी जाती है और गौरी को असत्य बोलने के कारण दस कोड़े मारने का आदेश दिया जाता है।

Gautam Buddha Biography in Hindi | गौतम बुद्ध की जीवनी

राजा का आदेश सुन गौरी रोने लगता है। सिद्धार्थ राजा से कहते हैं महाराज गौरी को क्षमा कर दीजिए , यह आज के बाद असत्य नहीं बोलेगा। राजा कहते हैं , मैं इसे क्षमा तभी कर सकता हूं , जब इसका कोई उत्तरदायित्व ले कि यह आज के बाद कभी असत्य नहीं बोलेगा। सभा का हर सदस्य गौरी का उत्तरदायित्व लेने से मना कर देता है।

जब गौरी को कोड़े मारने के लिए ले जाया जाने लगता है , तब सिद्धार्थ कहते हैं महाराज गौरी का उत्तरदायित्व मैं लेता हूं । सिद्धार्थ की बात सुन देवदत्त सिद्धार्थ से कहता है उत्तरदायित्व लेने का अर्थ पता भी है सिद्धार्थ ?

यदि गौरी ने दोबारा असत्य बोला तो कौडे तुम्हे खाने पड़ेंगे। सिद्धार्थ कहते हैं , मैं जानता हूं जेष्ठ । सिद्धार्थ के इस निर्णय से राजा शुद्धोधन को बहुत पीड़ा होती है क्योंकि सिद्धार्थ का निर्णय करुणा से भरा हुआ था।

गौतम बुद्ध का शिक्षण – Gautam Buddha Education

समय बीतता है और सिद्धार्थ गुरुकुल जाने के योग्य हो जाते हैं। रानी प्रजापति राजा शुद्धोधन से सिद्धार्थ को गुरुकुल भेजने के लिए कहती हैं परंतु राजा शुद्धोधन यह कहते हुए मना कर देते हैं कि वे अपने पुत्र के लिए महल के पास ही गुरुकुल बनवाएँगे क्योंकि वे नहीं चाहते थे कि उनके पुत्र को कोई भी ऐसा ज्ञान दिया जाए जो उन्हें वैराग्य की तरफ ले जाए।

गौतम बुद्ध की कहानी – Gautam Buddha Story in Hindi

सिद्धार्थ का शिक्षण शुरू होने से पहले की एक घटना है जो आपको जरूर समझनी चाहिए। एक बार सिद्धार्थ अपने भाइयों के साथ बगीचे में खेल रहे होते हैं, तो देवदत्त सिद्धार्थ को चोट पहुंचाने का प्रयास करता है, परंतु सूर्या का पुत्र चन्ना सिद्धार्थ को बचा लेता है।

सूर्या वही है जो राजा शुद्धोधन के पास सिद्धार्थ के पैदा होने की खबर लाया था और राजा ने सूर्या को वचन दिया था कि बड़े होकर सूर्या का पुत्र युवराज सिद्धार्थ का सार्थी बनेगा। सिद्धार्थ को बचाने के चक्कर में चन्ना और सिद्धार्थ दोनों को चोट लग जाती है।

सैनिक सिद्धार्थ को जल्दी से महल ले जाने लगते हैं। सिद्धार्थ चन्ना से भी उनके साथ आने के लिए कहते हैं। चन्ना सिद्धार्थ के साथ महल चला जाता है। महल पहुंचने के बाद सिद्धार्थ को दवाई लगाई जाती है।

सिद्धार्थ चन्ना को भी दवाई लगाने के लिए अपने पास बुलाते हैं , परंतु एक दासी सिद्धार्थ से चन्ना को अपने पास बुलाने से यह कहते हुए मना कर देती है कि चन्ना एक सार्थी पुत्र है। वह आपके पास नहीं आ सकता। सिद्धार्थ पूछते हैं परंतु क्यों ? दासी कहती है, वह नीची जात का है।

आप उसे छू नहीं सकते । सिद्धार्थ पूछते हैं यह जात क्या होती है ? दासी कहती है जैसे आप युवराज हैं और वह सार्थी पुत्र। सिद्धार्थ पूछते हैं तो वह मुझसे अलग कैसे है ? दासी कहती आपका जन्म राजप्रसार में हुआ है । इसलिए आप युवराज हैं और उसका जन्म छोटे घर में हुआ है , इसलिए वह सार्थी पुत्र है।

सिद्धार्थ कहते हैं तो इसमें भिन्नता क्या है ? घाव होने पर रक्त उसे भी तो आता है। दासी के पास सिद्धार्थ के इस प्रश्न का कोई उत्तर नहीं था। सिद्धार्थ चन्ना को अपने पास बुलाते हैं और उसे दवाई लगाते हैं। उस दिन से सिद्धार्थ और चन्ना एक दूसरे के मित्र बन जाते हैं। चन्ना हमेशा ख्याल रखता है कि सिद्धार्थ को कोई परेशानी ना हो।

जब यह बात देवदत्त को पता चलती है कि सिद्धार्थ और चन्ना मित्र बन गए हैं, तो उसे बहुत ईर्ष्या होती है।

राजा शुद्धोधन की बहन अमिता अपनी पुत्री यशोधरा के साथ कपिलवस्तु आती हैं। अमिता रानी प्रजापति के भाई की पत्नी और राजा शुद्धोधन की बहन थी। राजकुमारी यशोधरा और सिद्धार्थ के बीच अच्छी मित्रता थी। इसलिए जब भी वे मिला करते थे तो साथ ही खेला करते थे , जिसके कारण देवदत्त को बहुत ईर्ष्या होती थी।

सिद्धार्थ का स्वभाव बहुत ही कोमल और करुणामय था जिसके कारण कोई भी उनकी तरफ आकर्षित आसानी से हो जाता है। अब युवराज सिद्धार्थ और देवदत्त की गुरुकुल जाने की शुरुआत हो जाती है। गुरुकुल महल के पास ही होता है।

राजा शुद्धोधन सभी गुरुओं से सिद्धार्थ को मिलाते हैं और उनकी आज्ञा का पालन करने के लिए कहते हैं। सिद्धार्थ पूरी लगन से सीखना शुरू करते हैं परंतु देवदत्त की शिक्षा में ज्यादा रुचि नहीं होती। गुरुकुल को महल के पास बनवाने की वजह यह थी कि राजा शुद्धोधन हर समय अपने पुत्र पर नजर रखना चाहते थे।

Gautam Buddha Biography in Hindi | गौतम बुद्ध की जीवनी

गुरुकुल महल के इतने पास था कि शिक्षा प्राप्त करने के दौरान भी सिद्धार्थ महल हर दिन आया जाया करते थे। उसी समय की एक और घटना है जो आपको जरूर समझनी चाहिए।

एक दिन सिद्धार्थ अपने पिता के साथ बैठे कुछ बात कर रहे थे। अचानक सिद्धार्थ बोलते बोलते चुप हो जाते हैं और अपने पिता के सिर की ओर देखने लगते हैं। सिद्धार्थ को अपने पिता के सिर में एक सफेद बाल दिख रहा होता है। सिद्धार्थ अपने पिता से पूछते हैं , पिताजी यह एक बाल सभी बालों से भिन्न कैसे है ?

राजा शुद्धोधन सिद्धार्थ के इस प्रश्न का कोई जवाब नहीं दे पाते। कुछ क्षण सोचने के बाद राजा कहते हैं , पुत्र जिस प्रकार तुम्हारे पुराने दांत टूट कर नए दांत आ गए हैं। उसी प्रकार मेरे पुराने बाल टूट कर नए बाल आ जाएंगे। किसी तरह से राजा शुद्धोधन सिद्धार्थ को समझा देते हैं। उसी समय की एक और घटना है जो आपको जरूर जाननी चाहिए।

गौतम बुद्ध की बचपन की कहानी – Gautam Buddha Story in Hindi

एक दिन सिद्धार्थ , देवदत्त , यशोधरा तथा अन्य बच्चे बगीचे में खेल रहे होते हैं। खेलते खेलते अचानक देवदत्त सिद्धार्थ पर छल से जीतने का आरोप लगाता है और यह बात रानी प्रजापति तक पहुंचती है । रानी प्रजापति सिद्धार्थ को छल से जीतने के लिए बहुत डाँटती हैं, जबकि सिद्धार्थ ने छल नहीं किया था।

जब सभी बच्चों से पूछा जाता है कि छल किसने किया था? तो सब देवदत्त का नाम लेते हैं। फिर रानी प्रजापति सिद्धार्थ से पूछती हैं, अगर गलती तुम्हारी थी ही नहीं तो तुमने मना क्यों नहीं किया। सिद्धार्थ कहते हैं, गुरुदेव ने कहा है कि सत्य स्वयं प्रकाशित है, इसलिए मैं चुप था , यह बात सुनकर रानी प्रजापति की आंखों में आंसू आ जाते हैं और वे सिद्धार्थ को अपने सीने से लगा लेती हैं।

गौतम बुद्ध की कहानी – Gautam Buddha Story in Hindi

उसी समय की एक और घटना है जो आपको जरूर समझनी चाहिए। गुरुकुल में सिद्धार्थ देवदत्त तथा अन्यविद्यार्थियों को धनुर्विद्या सिखाई जाती हैं। देवदत्त की धनुर्विद्या सीखने में बहुत रुचि होती है। देवदत्त धनुर्विद्या आखेट और युद्ध के लिए सीखता है , परंतु सिद्धार्थ धनुर्विद्या अपने पिता की इच्छा पूरी करने के लिए सीखते हैं।

एक दिन सिद्धार्थ और यशोधरा महल के पास ही बगीचे में खेल रहे होते हैं , अचानक उनके पास एक घायल पक्षी आकर गिरता है और उस पक्षी के शरीर में बाण लगा होता है और उसके शरीर से खून बह रहा होता है। सिद्धार्थ उस पक्षी को देख कर व्याकुल हो जाते हैं और उसके प्राण बचाने के प्रयास में लग जाते हैं।

इतने में ही वहाँ देवदत्त आ जाता है और सिद्धार्थ से कहता है , देखा सिद्धार्थ मैंने उड़ते हुए पक्षी को मार गिराया। लाओ इसे मुझे दे दो। सिद्धार्थ देवदत्त को पक्षी देने से मना कर देते हैं। देवदत्त कहता है सुना नहीं तुमने यह मेरा आखेट है। सिद्धार्थ कहते हैं , परंतु इसे मैंने बचाया है , इसीलिए यह पक्षी मेरा है।

पर देवदत्त कहता है , तुम अपने जेष्ठा का अपमान कर रहे हो सिद्धार्थ। सिद्धार्थ कहते हैं मैं अपना कर्तव्य निभा रहा हूं जेष्ठा। देवदत्त कहता है , आखेट क्षत्रिय का गुण है । सिद्धार्थ कहते हैं , रक्षा करना क्षत्रिय का कर्तव्य है जेष्ठा। देवदत्त कहता है यदि तुमने मुझे यह पक्षी नहीं दिया तो मैं महाराज के पास जाऊंगा।

सिद्धार्थ कहते हैं , मैं महाराज के आदेश की प्रतीक्षा करूंगा। देवदत्त न्याय सभा जाता है और राजा शुद्धोधन से न्याय मांगता है। राजा शुद्धोधन सिद्धार्थ को बुलवाते हैं और सुनवाई शुरू की जाती है। मंत्री देवदत्त से पूछता है क्या याचना है तुम्हारी देवदत्त ?

देवदत्त कहता है महाराज मैंने पक्षी का आखेट किया तो वह पक्षी मेरा हुआ। सिद्धार्थ कहते महाराज मैंने इस पक्षी को घायल अवस्था में पाया और इसकी रक्षा की , इसलिए अब यह मेरे पास रहेगा।

राजा कहते हैं तो अब यह न्याय करना है कि यह पक्षी किसे दिया जाए जिसने इसे घायल किया है उसे या जिसने इसकी रक्षा की है उसे ? न्याय सभा का एक सदस्य सिद्धार्थ से कहता है आखेट करना तो क्षत्रिय का धर्म है युवराज। सिद्धार्थ कहते हैं निर्बल की रक्षा करना क्षत्रिय का कर्तव्य है महाराज।

Gautam Buddha Biography in Hindi | गौतम बुद्ध की जीवनी

देवदत्त सिद्धार्थ से कहता है मुझे तुम्हारी क्षत्रियता पर संदेह है सिद्धार्थ सिद्धार्थ कहते हैं और मुझे तुम्हारी मनुष्यता पर संदेह है। घायल करने से पीड़ा होती है और रक्षा करने से स्नेह बढ़ता है। इस जगत में स्नेह बढ़ना चाहिए या पीड़ा ? सच्चा क्षत्रिय रक्षक होता है।

दोनों का पक्ष जानने के बाद राजा कुलगुरु से कहते हैं। कुलगुरु कृपाकर अब आप ही न्याय करें। कुलगुरु अपने आसन से खड़े होते हैं और राजा से कहते हैं , मैं भी असमर्थ हूं राजन अब तो यह पक्षी ही बता सकता है कि यह किसके पास रहेगा।

कुलगुरु सिद्धार्थ से उस पक्षी को लेकर देवदत्त और सिद्धार्थ को समान दूरी पर खड़ा कर देते हैं और उस पक्षी को कुछ दूरी से जमीन पर छोड़ते हैं और कहते हैं कि अब यह पक्षी जिसके भी पास जाएगा , इसका हकदार वही होगा।

पक्षी हमारी तरह कोई भाषा तो नहीं समझते परंतु करुणा की भाषा जरूर समझते हैं। वह पक्षी सीधा सिद्धार्थ के पास जाता है और सिद्धार्थ उसे गोद में उठा लेते हैं। कहानी में आगे बढ़ते हैं राजा शुद्धोधन अपने पूत्र की शिक्षा में उन्नति जानने के लिए सभी गुरुओं को अपने पास बुलवाते हैं और एक एक करकर सभी गुरुओं से सभी विषयों के बारे में पूछते हैं।

सभी गुरु सिद्धार्थ को हर विषय में उत्तम बताते हैं, सिवाय एक विषय को छोड़कर , वह विषय होता है , अस्त्र चलाना ऐसा नहीं था कि सिद्धार्थ को अस्त्र चलाने नहीं आते थे। बात बस इतनी थी कि अस्त्र चलाने में सिद्धार्थ की कोई रुचि नहीं थी। सिद्धार्थ का मन तो प्रकृति के साथ समय बिताने में लगता था।

जब यह बात राजा को पता चलती है कि सिद्धार्थ को अस्त्र चलाना अच्छा नहीं लगता, तो वे बहुत क्रोधित होते हैं और सभी गुरुओं को यह आदेश देते हैं कि सिद्धार्थ की रुचि अस्त्र चलाने में जगाई जाए। राजा की आज्ञा पा सभी गुरु इस कार्य में लग जाते हैं। समय बीतता है और सिद्धार्थ की शिक्षा पूर्ण हो जाती है।

सिद्धार्थ के साथ साथ देवदत्त तथा अन्य विद्यार्थियों की भी शिक्षा पूर्ण हो जाती है। अब समय आता है गुरुकुल की अंतिम परीक्षा का , जिसके द्वारा तय होगा कि गुरुकुल का सर्वश्रेष्ठ विद्यार्थी कौन है ? प्रतियोगिता का दिन तय किया जाता है और प्रतियोगिता को तीन चरणों में बांटा जाता है।

पहला तलवारबाजी , दूसरा दंड प्रतियोगिता और तीसरा तीरंदाजी । पहले दिन की प्रतियोगिता शुरू होती हैं । दो प्रतिभागी अपनी अपनी तलवार लेकर मैदान में उतरते हैं। लोगों को प्रतिभागी ना दिखे केवल प्रतिभा दिखे इसलिए दोनों प्रतिभागियों के चेहरे पर मुखौटा लगा होता है। एक मुखौटे के पीछे देवदत्त होता है और दूसरे मुखौटे के पीछे कोई अन्य प्रतिभागी होता है।

परंतु देवदत्त यह सोचता है कि सामने वाला प्रतिभागी सिद्धार्थ है, इसलिए वह सामने वाले प्रतिभागी को बुरी तरह से घायल कर देता है नियम यह था कि जीतने वाला तो अपने चहरे से मुखौटा हटाएगा परंतु हारने वाला बिना मुखौटा हटाए ही मैदान से बाहर चला जाएगा।

इसलिए देवदत्त अपने चेहरे से मुखौटा हटाता है और फिर दूसरे प्रतिभागी लड़ने के लिए आते हैं। इस बार एक मुखौटे के पीछे सिद्धार्थ होते हैं और दूसरे मुखौटे के पीछे कोई अन्य प्रतिभागी दोनों प्रतिभागी लड़ना शुरू करते हैं। शुरुआत में सिद्धार्थ प्रहार नहीं करते। केवल अपने आप को बचाते हैं परंतु जब गुरु प्रहार करने के लिए कहते हैं तो सिद्धार्थ प्रहार करते हैं और देखते ही देखते सामने वाले प्रतिभागी को हरा देते हैं।

जैसे ही सामने वाला प्रतिभागी सिद्धार्थ के प्रहार के कारण जमीन पर गिरता है। सिद्धार्थ तुरंत अपनी तलवार छोड़ कर उसे उठाने में लग जाते हैं और यह देखते हैं कि कहीं उसे चोट तो नहीं आई। जब सिद्धार्थ पाते हैं कि सामने वाला प्रतिभागी ठीक है । तब सिद्धार्थ अपने चेहरे से मुखौटा हटाते हैं।

सिद्धार्थ को देखकर राजा शुद्धोधन , रानी प्रजापति सभी बहुत प्रसन्न होते हैं , सिवाय देवदत्त के , जैसे ही देवदत्त को पता चलता है कि जिसे उसने हराया था वह सिद्धार्थ नहीं कोई और था तो वह क्रोध से भर जाता है , परंतु सिद्धार्थ को जीत का कोई अभिमान नहीं होता। वे विनम्रता के साथ अपने गुरु और माता – पिता से आशीर्वाद लेते हैं। पहले दिन की प्रतियोगिता सिद्धार्थ की जीत के साथ समाप्त होती है।

Gautam Buddha Biography in Hindi | गौतम बुद्ध की जीवनी

अगले दिन धनुर्विद्या की प्रतियोगिता शुरू होती है। पहला प्रतिभागी आता है और एक पक्षी में निशाना लगाने का प्रयास करता है , परंतु निशाना चूक जाता है। दूसरा प्रतिभागी देवदत्त होता है और उसके लिए भी एक पक्षी उड़ाया जाता है परंतु जैसे ही देवदत्त निशाना लगाने के लिए तैयार होता है , सिद्धार्थ उसे रोक देते हैं और कहते हैं, क्षमा करें गुरुदेव परंतु परीक्षा के लिए क्या मूक पक्षियों को लक्ष्य बनाना उचित है ?

वहां उपस्थित सभी गुरुओं में से एक गुरु सिद्धार्थ से कहते हैं , परीक्षा में धनुर्धर की योग्यता को परखा जाता है। क्या तुम्हारे पास कोई और विधि है ? सिद्धार्थ कई विधियां बताते हैं , परंतु उनकी किसी भी विधि को स्वीकारा नहीं जाता। देवदत्त कहता है गुरुदेव आप पक्षी उड़ाईए , मैं निशाना लगाने के लिए तैयार हूं । पक्षी उड़ाया जाता है और देवदत्त तीर चलाता है । देवदत्त का तीर सीधा जाकर उड़ते हुए पक्षी में लगता है और पक्षी घायल होकर जमीन पर गिर पड़ता है।

यह देखकर सिद्धार्थ को बहुत पीड़ा होती है , परंतु वे अपने गुरु के आदेश के कारण कुछ कर नहीं पाते। अगली बारी सिद्धार्थ की होती अगली बारी सिद्धार्थ की होती है। सिद्धार्थ धनुषबाण लेकर मैदान के बीचों बीच खड़े हो जाते हैं।

जैसे ही पक्षी उड़ाया जाता है , सिद्धार्थ के हाथों से धनुषबाण छूट जाता है और यह देखकर सिद्धार्थ के गुरु उनसे कहते हैं , धनुष बाण उठाओ सिद्धार्थ लक्ष्य तुम्हारे सामने हैं। सिद्धार्थ कहते हैं क्षमा करें गुरुदेव परंतु मैं परीक्षा नहीं दे सकता।

सिद्धार्थ की बात सुन देवदत्त कहता है तो ठीक है गुरुदेव आप मुझे सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर घोषित कर दीजिए। सिद्धार्थ कहते हैं जी गुरुदेव आप जेष्ठा को सर्वश्रेष्ठ घोषित कर दीजिए, मैं पक्षियों को निशाना नही बना सकता। गुरु कहते तुम्हें परीक्षा देनी ही होगी सिद्धार्थ यह मेरा आदेश है।

सिद्धार्थ कहते हैं गुरुदेव आप मेरी यही परीक्षा लेना चाहते हैं ना कि मैं धनुर्विद्या में निपुण हूं या नहीं, तो लक्ष्य कोई और भी तो हो सकता है। सभी गुरुओं में से एक गुरु कहते हैं , हाँ हो सकता है परंतु लक्ष्य उतना ही कठिन होना चाहिए जितना कि देवदत्त के लिए था।

सिद्धार्थ अपनी माला का एक छोटा सा मोती लेते हैं और उसे आकाश में उछालने के लिए कहते हैं। सिद्धार्थ कहते हैं इस मोती को इतना ऊपर उछाला जाए कि यह एक छोटे से बिंदु के रूप में भी ना दिखे। सिद्धार्थ के कहने पर देवदत्त खुद उस मोती को पूरी ताकत से आकाश में उछालता है। सिद्धार्थ उस मोती की सीध में बाण चलाते हैं । सबको लगता है कि निशाना चूक गया क्योंकि मोती दिखना तक बंद हो गया था , परंतु कुछ ही क्षण बाद मोती के छोटे – छोटे टुकड़े जमीन पर गिरते हैं।

सभी लोग यह देखकर आश्चर्यचकित होते हैं कि भला कोई इतने छोटे से मोती को निशाना कैसे बना सकता है ? परंतु क्योंकि सिद्धार्थ का उद्देश्य सर्वश्रेष्ठ बनना नहीं बल्कि अपनी योग्यता का प्रदर्शन करना था इसलिए वे ऐसा कर पाए। दूसरे दिन की प्रतियोगिता समाप्त होती है और सिद्धार्थ को सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर घोषित कर दिया जाता है।

अगले दिन तीसरी और अंतिम प्रतियोगिता होती है जिसका नाम दंड प्रतियोगिता होता है। इस बार देवदत्त का सामना सिद्धार्थ से होता है। देवदत्त मन ही मन सोचता है कि इस बार मैं सिद्धार्थ को सबक सिखा कर ही रहूंगा। प्रतियोगिता शुरू होती हैं और देवदत्त पहला प्रहार करता है , परंतु सिद्धार्थ केवल देवदत्त के प्रहार को रोकते हैं और उस पर पलटवार नहीं करते ।

यह देखकर सिद्धार्थ के गुरु आचार्य कोण्डन्य उनसे कहते हैं , सिद्धार्थ तुम देवदत्त पर प्रहार क्यों नहीं कर रहे हो ? सिद्धार्थ कहते हैं गुरुदेव मैं जेष्ठ पर प्रहार कैसे कर सकता हूं ? गुरु कहते हैं यह युद्ध नहीं प्रतियोगिता है । यहां प्रतिभागी को अपनी प्रतिभा दिखानी होती है। सिद्धार्थ कहते हैं परंतु मैं चाहकर भी जेष्ठ पर प्रहार नहीं कर पा रहा हूं।

Gautam Buddha Biography in Hindi | गौतम बुद्ध की जीवनी

सिद्धार्थ के इन शब्दों को सुन वहां बैठे सभी प्रजाजन , सिद्धार्थ के माता – पिता सभी बहुत निराश हो जाते हैं और फिर आचार्य कोण्डन्य सिद्धार्थ से कहते हैं , अब तुम्हारे पास दो विकल्प हैं सिद्धार्थ या तो तुम्हें प्रहार करना है या फिर मुझे भूल जाना है।

सिद्धार्थ अपने गुरु से बहुत प्रेम करते थे जिसके कारण वे देवदत्त पर प्रहार करना शुरू करते हैं और कुछ ही क्षणों में वे देवदत्त को हरा देते हैं। यह देखकर वहाँ उपस्थित सभी लोग सिद्धार्थ के जयकारे लगाने लगते हैं । सिद्धार्थ के माता – पिता भी यह देखकर बहुत प्रसन्न होते हैं ।

तीनों परीक्षाएं होने के बाद यह सुनिश्चित कर दिया जाता है कि गुरुकुल के सर्वश्रेष्ठ विद्यार्थी सिद्धार्थ हैं। राजा शुद्धोधन तथा उनकी पत्नी रानी प्रजापति सिद्धार्थ के विजय होने पर बहुत प्रसन्न होते हैं , परंतु देवदत्त मंगला और द्रोणोधन बहुत दुखी होते हैं क्योंकि उनकी उनके हर प्रयास के बाद भी सिद्धार्थ सर्वश्रेष्ठ साबित होते हैं।

राजा शुद्धोधन तो अपने पुत्र की विजय से इतने प्रसन्न हो जाते हैं कि वे पूरे राज्य में एक दिन का उत्सव घोषित कर इस उत्सव में राजकुमारी यशोधरा भी आती हैं। युवराज, सिद्धार्थ और राजकुमारी यशोधरा की बचपन से ही बहुत अच्छी मित्रता थी । इसलिए जब भी वे एक दूसरे से मिलते थे तो बहुत प्रसन्न होते थे।

राजा शुद्धोधन सिद्धार्थ की वजह से इतने प्रसन्न हो जाते हैं कि उन्हें पहली बार राज प्रसार की सीमा के बाहर जाने की अनुमति दे देते हैं परंतु अनुमति देने के साथ – साथ ऐसी व्यवस्था भी करवाते हैं कि सिद्धार्थ को हर जगह केवल सुख ही सुख दिखे।

राजा शुद्धोधन एक शोभा यात्रा आयोजित करते हैं जिसमें सिद्धार्थ , यशोधरा व कुछ सैनिक शामिल होते हैं । जैसे – जैसे शोभायात्रा आगे बढ़ती है , सिद्धार्थ को हर जगह हंसते हुए चेहरे नजर आते हैं। अचानक एक व्यक्ति सिद्धार्थ के रथ को रुकवाता है और उनसे कहता है रक्षा करें युवराज रक्षा करें।

Gautam Buddha Story in Hindi – गौतम बुद्ध की कहानी

सिद्धार्थ उस व्यक्ति से पूछते हैं , क्या हुआ तुम इतने भयभीत क्यों हो ? वह व्यक्ति कहता है , युवराज मेरे बच्चे को चीता उठाकर ले गया है और उसके प्राण खतरे में हैं और कृपाकर उसकी रक्षा करें। उस व्यक्ति की बात सुनते ही सिद्धार्थ तुरंत अपने रथ से उतरते हैं और उस व्यक्ति के साथ चल पड़ते हैं।

सिद्धार्थ को उस व्यक्ति के साथ जाता देख द्रोणोधन सिद्धार्थ से कहता है , युवराज आपको शोभा यात्रा नहीं छोड़नी चाहिए। महाराज को पता लगेगा तो वे क्रोधित होंगे। सिद्धार्थ कहते हैं , क्षमा करें द्रोणोधन काका परंतु इस खबर को सुनने के बाद मैं खुद को रोक नहीं सकता। जब सिद्धार्थ नहीं मानते तो द्रोणोधन देवदत्त और कुछ सैनिकों को सिद्धार्थ के साथ भेज देता है।

वन में उस बच्चे को ढूंढते वक्त देवदत सिद्धार्थ से कहता है की यदि वह चीता मेरे हाथ लग गया तो मैं उसका सिर धड़ से अलग कर दूंगा। देवदत्त की बात सुन सिद्धार्थ उससे कहते हैं नही जेष्ठ हम उसे कोई हानि नहीं पहुंचाएंगे। हम उसे सुरक्षित पकड़ेंगे।

अचानक एक बच्चे के रोने की आवाज सुनाई देती है और सभी लोग उस ओर दौड़ते हैं जिस ओर से आवाज आ रही होती है। दौड़ते दौड़ते अचानक सिद्धार्थ को एक बच्चा जमीन पर पड़ा दिखाई देता है और सिद्धार्थ उस बच्चे को अपनी गोद में उठाते हैं और महल की ओर दौड़ पड़ते हैं।

उस बच्चे के शरीर से रक्त बह रहा होता है। इसलिए महल पहुंचते ही सिद्धार्थ उस बच्चे का वैद्यराज से इलाज करवाते हैं । सिद्धार्थ के महल जाने के बाद देवदत्त उस चीते को खोजना शुरू करता है। काफी देर खोजने के बाद देवदत्त उस चीते को पकड़ लेता है और उसे खत्म कर देता है।

देवदत्त उस चीते का सिर काटकर महल ले जाता है और राजा शुद्धोधन के चरणों में रख देता है। यह देखकर सिद्धार्थ अपने आप पर से काबू खो देते हैं और क्रोध व पीड़ा से भर जाते हैं और देवदत्त से कहते हैं , जेष्ठ मेरे मना करने के बाद भी आपने यह क्यों किया ? हम इसे जीवित भी तो पकड़ सकते थे।

इस समय तक सिद्धार्थ को लगता था कि जीवन और मरण केवल पशु पक्षियों के लिए हैं मनुष्य का उससे कोई संबंध नहीं है। कहने का अर्थ यह है कि सिद्धार्थ के सामने जीवन के सत्य धीरे – धीरे लाए जा रहे थे और वही सत्य है सिद्धार्थ के भीतर पीड़ा के बीज बो रहे थे। देवदत्त कहता है जीवित पकड़ने से क्या हो जाता?

सिद्धार्थ कहते हैं , हम इसे वन में कहीं दूर छोड़ आते। देवदत्त कहता है , ये नरभक्षी होते हैं इन्हें कहीं भी छोड़ आओ, ये हर जगह लोगों को अपना शिकार बनाते हैं। सिद्धार्थ कहते हैं , ये नरभक्षी नहीं होते, हम इन्हे बनाते हैं । राजा शुद्धोधन सिद्धार्थ से कहते हैं , सिद्धार्थ तुम अपने जेष्ठ से इस तरह से बात नहीं कर सकते।

Gautam Buddha Biography in Hindi | गौतम बुद्ध की जीवनी

इससे पहले कि मेरा क्रोध अपनी हद पार कर दे, अभी के अभी यहां से चले जाओ। अपने पिता का आदेश सुन सिद्धार्थ वहां से चले जाते हैं। उस चीते की मृत्यु के कारण सिद्धार्थ इतने दुखी हो जाते हैं कि उनके मन में अजीब अजीब से प्रश्न उठने लगते हैं। अपने प्रश्नों को लेकर सिद्धार्थ अपने प्रिय गुरु आचार्य कोण्डन्य के पास जाते हैं और उनसे कहते हैं , गुरुदेव मेरे मन की बेचैनी बढ़ती ही जा रही है। क्या इस बेचैनी को खत्म करने का कोई उपाय है ?

आचार्य कोण्डन्य कहते हैं , मन की बेचैनी को खत्म करने का तो एक ही उपाय है सिद्धार्थ पूछते हैं , क्या उपाय है गुरुदेव ? गुरु कहते हैं , ध्यान ! ध्यान ही एकमात्र तरीका है, मन को शांत करने का। सिद्धार्थ की रूचि तब से ही ध्यान में जाग गई थी , जब आचार्य कोण्डन्य ने सिद्धार्थ को पहली बार ध्यान के बारे में बताया था, परंतु परिवार वालों के मना करने के कारण सिद्धार्थ ध्यान कर नहीं कर पाते थे।

आचार्य कोण्डन्य को भी मना किया गया था कि वे सिद्धार्थ को कोई भी ऐसा ज्ञान ना दें , जो सिद्धार्थ के मन में वैराग्य पैदा करे , परंतु एक सच्चा गुरु कभी भी अपने शिष्य को एक सही शिक्षा से वंचित नहीं रखता और अगर शिष्य सिद्धार्थ जैसा हो तो बिल्कुल नहीं रख सकता।

आचार्य कोण्डय सिद्धार्थ को ध्यान करने के लिए प्रेरित कर रहे हैं, और यह बात राजा शुद्धोधन के छोटे भाई अमीतोधन को पता लग जाती है और वह जाकर राजा शुद्धोधन को बता देते हैं। यह बात सुनकर राजा शुद्धोधन क्रोधित होते हैं और आचार्य कोण्डन्य को अगले दिन महल बुलवाते हैं।

उसी रात राजा शुद्धोधन एक स्वप्न भी देखते हैं जिसमें सिद्धार्थ को समाधि लगाकर बैठे हुए पाते हैं इस स्वप्न का अर्थ जानने के लिए राजा आचार्य कोण्डन्य के साथ – साथ अन्य गुरुओं को भी बुलवाते हैं । सभी गुरु व कुलगुरु भी राजा के महल में उपस्थित होते हैं और राजा सभी को अपना स्वप्न बताते हैं ।

राजा का स्वप्न सुन आचार्य कोण्डन्य राजा से कहते हैं , महाराज आपका स्वप्न पहले प्रहर का है इसलिए इसका सत्य होना निश्चित है। आचार्य कोण्डन्य की बात सुन राजा बहुत क्रोधित हो जाते हैं और आचार्य कोण्डन्य से कहते हैं , क्या आपको पता नहीं है कि इस बात के लिए आप को मृत्युदंड भी मिल सकता है ?

राजा को क्रोधित देख कुलगुर वाचस्पति उन्हें शांत करते हैं और कहते हैं , महाराज यह सत्य है कि पहले प्रहर के स्वप्न सत्य होते हैं , परंतु इनका अर्थ अलग भी हो सकता है। आपने युवराज को समाधि में देखा, इसका यह अर्थ है कि सिद्धार्थ का संकल्प बहुत दृढ़ है और दृढ़ संकल्प केवल एक सम्राट का ही होता है।

राजा कुलगुरु से कहते हैं , मैं आपकी बात से सहमत हूं , परंतु मेरा मतभेद आचार्य कोण्डन्य से है। और इन्होंने सिद्धार्थ को वो ज्ञान दिया जो मैं उसे देना नहीं चाहता था। इन्होंने सिद्धार्थ को अहिंसा व ध्यान का ज्ञान दिया जो इन्हें नहीं देना चाहिए था। आचार्य कोण्डन्य कहते हैं महाराज जो बालक आठ वर्ष की आयु में सारे शास्त्र कंठस्थ कर लेता हो , उससे भला क्या छुपेगा ?

महाराज, वेदों और शास्त्रों में जगह – जगह जीवन, मरण और मोक्ष का उल्लेख है। केवल इन उल्लेखों से कोई सन्यासी नहीं बन जाएगा। महाराज अब तक सिद्धार्थ के भीतर श्मशान वैराग्य की भावना उत्पन्न नहीं हुई है क्योंकि उन्होंने अब तक किसी भी मनुष्य की अथवा अपने स्वजन की मृत्यु नही देखी है।

उन्हें मनुष्य रोगों की अनुभूति नहीं हुई है और रही अहिंसा और ध्यान की तो अहिंसा उनका स्वभाव है और ध्यान उनकी रुचि है, महाराज स्वभाव और रुचि मनुष्य अपने साथ में लेकर जन्म लेता है। उसे सिखाया नहीं जाता। एक पक्षी की पीड़ा अथवा एक जीव की मृत्यु देख जो बालक बेहाल हो जाता है , मनुष्य के दुख उसके लिए अमूल्य होंगे।

आप और मैं , हम , यहां उपस्थित सभी जन मोक्ष प्राप्त करना चाहते हैं, प्राप्त करने के कई मार्ग हैं भक्ति , वैराग्य , ज्ञान ! अब कौन ? कौन सा मार्ग चुनता है ? यह व्यक्ति विशेष पर निर्भर करता है। फिर भी यदि आप सब गुणी जनों को मेरी शिक्षा प्रणाली अनुचित लगी हो तो मैं क्षमा चाहता हूं , महाराज मुझे मेरे कार्यभार से मुक्त कर दीजिए।

राजा शुद्धोधन आचार्य कोण्डन्य को गुरु दक्षिणा देकर विदा कर देते हैं। जैसे ही यह बात सिद्धार्थ को पता चलती है कि आचार्य कोण्डन्य गुरुकुल छोड़ कर हमेशा के लिए जा रहे हैं, तो वे उन्हें रोकने के लिए उनके पास पहुंचते हैं और उनसे पूछते हैं क्या यह सत्य है गुरुदेव कि आप हमें छोड़ कर जा रहे हैं।

गुरु कहते हैं जाना तो मैं पहले ही चाहता था सिद्धार्थ परंतु अब तक तुम्हारे कारण रुका हुआ था। सिद्धार्थ कहते हैं तो आज भी रुक जाइए ना गुरुदेव, आप तो जानते ही हैं कि मैं आप के बिना अधूरा हूं। सिद्धार्थ के शब्दों को सुन गुरु की आँखों में आँसु आ जाते हैं परंतु अपने आंसु छुपाने के लिए गुरु सिद्धार्थ से एक वृक्ष की ओर इशारा करते हुए पूछते हैं, अरे सिद्धार्थ तुम जानते हो ना उस पेड़ पर एक चिडिया ने घोंसला बनाया हुआ है ?

सिद्धार्थ कहते हैं जी गुरुदेव, गुरु कहते हैं यह वही चिड़िया है, जो रोज अपने बच्चों को अपनी चोंच से खाना लाकर खिलाती है। सिद्धार्थ कहते हैं जी गुरुदेव गुरु कहते हैं आज उस चिड़िया ने अपने उन बच्चों को घोंसले से नीचे धक्का दे दिया। सिद्धार्थ पूछते हैं, परंतु क्यों गुरुदेव ?

गुरु कहते हैं , जब बच्चे घोंसले से नीचे गिर रहे थे तो उन्होंने अपने पंख फडफडाए और देखते ही देखते वे उड़ने लगे। सिद्धार्थ रोते हुए अपने गुरु से कहते हैं परंतु मुझे उड़ना नही आता गुरुदेव। मैं आपके बिना नही रह पाऊंगा, कृपा कर मुझे छोड़कर मत जाइए।

गुरु कहते हैं, मुझे जाना होगा सिद्धार्थ, मेरा कर्तव्य पूरा हो चुका है। मैं तुम्हें अपना संपूर्ण ज्ञान दे चुका हूं। अब मेरे वानप्रस्थ होने का समय आ गया है। सिद्धार्थ कहते हैं गुरुदेव मेरी शिक्षा तो अभी अधूरी है और आपने मुझे वानप्रस्थ होने का ज्ञान तो दिया ही नहीं।

गुरु कहते हैं कुछ बातें समझाई नहीं जाती सिद्धार्थ समय के हैं साथ खुद समझ आती हैं। राग , द्वेष , मोह माया के बंधनों में बंधोगे तभी उसे छोड़ने का ज्ञान होगा , जिसका अनुभव नहीं उसकी बातें भी निरर्थक हैं। वानप्रस्थ का ज्ञान तुम्हें ग्रहस्त आश्रम के बाद ही होगा। सिद्धार्थ पूछते हैं, परंतु ग्रहस्त आश्रम पूर्ण होने के बाद मैं आपको कहां खोजूँगा ?

Gautam Buddha Biography in Hindi | गौतम बुद्ध की जीवनी

गुरु कहते हैं उस समय तुम्हें मुझे खोजने की आवश्यकता नहीं होगी सिद्धार्थ , तुम स्वयं ही ज्ञानी हो जाओगे। हो सकता है कि मैं ही तुम्हें ढूंढता हुआ तुम्हारे पास आ जाऊं। इतना कहकर आचार्य कोण्डय वहां से चले जाते हैं। आचार्य कोण्डन्य के जाने के कारण सिद्धार्थ बहुत दुखी रहने लगते हैं।

वे अपना ज्यादातर समय अकेले रहकर बिताने लगते हैं। अपने पुत्र के दुख को देखकर राजा शुद्धोधन को यह चिंता सताने लगती है कि कहीं असित मुनि की भविष्यवाणी सच ना हो जाए इसलिए राजा कोई ऐसा उपाय खोजने लगते हैं जिससे कि सिद्धार्थ का दुख गायब हो जाए।

राजा शुद्धोधन अपने मंत्री से पूछते हैं कि ऐसा क्या किया जाए अमात्य जिससे कि सिद्धार्थ के भीतर वैराग्य को पैदा होने से रोका जा सके। मंत्री कहता है महाराज वैराग्य को तो केवल काम ही नष्ट कर सकता है।

अब युवराज की आयु भी हो गई है। अब तक युवराज आचार्य कोण्डन्य की संगति में रह रहे थे , इसलिए उनके भीतर ध्यान और एकांत के प्रति रुचि जग रही थी , मगर जब वे सुंदर कन्याओं के साथ रहेंगे तो उनके भीतर कामवासना जागेगी और वैराग्य नष्ट जाएगा। राजा शुद्धोधन को अपने मंत्री की बात ठीक लगती है और वे अपने पुत्र को रंगभवन भेज देते हैं।

रंग भवन का अर्थ होता है वैश्या-लय। सिद्धार्थ के साथ उनके चचेरे भाई भी रंग भवन जाते हैं। सभी बहुत उत्सुक होते हैं, केवल सिद्धार्थ को छोड़कर क्योंकि उनके भीतर उनके प्रश्नों के उत्तर ना मिलने की पीड़ा होती है। रंग भवन की सभी स्त्रियों को पहले यह समझा दिया जाता है कि उन्हें किसी भी हालत में सिद्धार्थ को काम-वासना के जाल में जकड़ लेना है और जो भी स्त्री ऐसा करने में सफल होगी उसे उचित इनाम दिया जाएगा।

सिद्धार्थ के रंगभवन पहुंचते ही सभी स्त्रियां उन्हें रिझाने की कोशिश में लग जाती हैं। कोई उन्हें अपने नृत्य से रिझाने की कोशिश करती है, कोई उन्हें अपने संगीत से रिझाने की कोशिश करती है, तो कोई उन्हें अपने न-ग्न शरीर से रिझाने की कोशिश करती है।

परंतु सभी स्त्रियां अपने हर प्रयास के बाद भी विफल रहती हैं और चौंकती हैं, क्योंकि उन्होंने आज से पहले कभी कोई ऐसा पुरुष नहीं देखा था जिसके ऊपर काम-वासना का भी कोई असर ना हुआ हो। अन्य पुरुषों को तो रिझाने की भी कोशिश नहीं करनी पड़ रही थी।

वे तो अपने आप ही काम-वासना के मारे बेसुद हो रहे थे, परंतु सिद्धार्थ को आकर्षित करने के लिए वे स्त्रियां अपनी हदों से भी पार चली गई थीं, लेकिन सिद्धार्थ अपनी पीड़ा में इतने खोए हुए थे कि वे ना तो उन स्त्रियों का सौंदर्य देख पा रहे थे और ना ही उनका न-ग्न शरीर।

उन गणिकाओं ने ऐसे पुरुष तो बहुत देखे थे जो उनके शरीर से वस्त्र हटाना चाहते थे परंतु उन्होंने पहली बार कोई ऐसा पुरुष देखा था जो उनके नग्न शरीर पर वस्त्र ढ़कना चाहता था। उन गणिकाओं को आज तक तरह – तरह के उपहार तो मिले थे परंतु आज उन्हें स्त्री होने का सम्मान पहली बार मिला था।

उस समय पर स्त्रियों को केवल उपभोग की एक वस्तु समझा जाता था जिसके कारण स्त्रियों के साथ बहुत अन्याय हो रहा था। स्त्रियों के साथ हो रहे इस अन्याय को रोकने के लिए सिद्धार्थ अपने पिता राजा शुद्धोधन से प्रार्थना कर एक ऐसा आदेश पत्र जारी करवाते हैं।

जिसमें लिखा होता है कि यदि स्त्री की इच्छा नहीं है तो वह पुरुष के साथ संबंध बनाने से मना कर सकती है और अगर मना करने के बाद भी पुरुष जबरदस्ती करता है तो उसे दंड दिया जाएगा। राजा शुद्धोधन के इस आदेश को सुनते ही रंग भवन की सभी स्त्रियां बहुत प्रसन्न होती है।

सिद्धार्थ ने रंग भवन जाकर स्त्रियों के तन को जानने की बजाय उनके मन को जाना और लंबे समय से जो अत्याचार गणिकाओं के ऊपर हो रहा था, उसे बंद करवाया। राजा शुद्धोधन ने सिद्धार्थ को रंग भवन काम-शास्त्र सीखने के लिए भेजा था परंतु वे उस कार्य में सफल नहीं होते।

उसी बीच कौशल राज्य के राजा महाकौशल अपने पुत्र प्रसन्नजीत के राज्य अभिषेक के अवसर पर राजा शुद्धोधन को आमंत्रित करते हैं। राजा शुद्धोधन आमंत्रण स्वीकारते हैं और महाकौशल के पुत्र के राज्य अभिषेक में पहुंचते हैं। कौशल राज्य से लौटने के बाद राजा शुद्धोधन तय करते हैं कि वे भी अपने पुत्र का राज्याभिषेक करेंगे।

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परंतु फिर उन्हें कोई सलाह देता है कि पहले उन्हें सिद्धार्थ का विवाह करा देना चाहिए। उसके बाद उनका राज्याभिषेक करना उचित होगा। राजा शुद्धोधन को यह बात उचित लगती है और वे तय करते हैं कि राज्याभिषेक से पहले सिद्धार्थ का विवाह कराया जाएगा।

गौतम बुद्ध की शादी

राजा शुद्धोधन और रानी प्रजापति चाहते थे कि यशोधरा का विवाह सिद्धार्थ के साथ हो , परंतु यशोधरा के पिता चाहते थे कि यशोधरा का विवाह देवदत्त के साथ हो इसलिए यशोधरा के पिता यशोधरा के सामने देवदत्त के साथ विवाह का प्रस्ताव रखते हैं , परंतु यशोधरा देवदत्त के साथ विवाह करने से मना कर देती हैं, क्योंकि वे सिद्धार्थ से प्रेम करती थीं और उन्हीं से विवाह करना चाहती थीं।

यशोधरा के हृदय की बात सुन उनके पिता उनसे कहते हैं , सिद्धार्थ तुम्हारे योग्य नहीं है। जिस व्यक्ति के भीतर करुणा है, वह एक महान योद्धा कैसे बन सकता है ? और मैं चाहता हूं कि तुम्हारा विवाह एक वीर के साथ हो ना कि भविष्य में होने वाले एक जोगी के साथ। यशोधरा कहती हैं यदि आपको सिद्धार्थ की योग्यता पर शक है तो आप उनकी परीक्षा ले सकते हैं।

यशोधरा के पिता कहते हैं तो ठीक है मैं परीक्षा लूंगा परंतु जो भी परीक्षा में विजयी होगा , तुम्हें उसके साथ ही विवाह करना होगा। यशोधरा कहती हैं ठीक है। यशोधरा के पिता राजा दंडपानी यह घोषणा करते हैं कि उनकी पुत्री यशोधरा का स्वयंवर होगा।

यशोधरा का स्वयंवर के लिए परीक्षा

उसके लिए एक परीक्षा निर्धारित की जाएगी और जो उस परीक्षा में विजयी घोषित होगा, उसी के साथ यशोधरा का विवाह करा दिया जाएगा। देवदत्त की मां रानी मंगला पूरा प्रयास करती है कि सिद्धार्थ स्वयंवर में भाग ना लें क्योंकि वह जानती थी कि देवदत्त को केवल सिद्धार्थ ही हरा सकते थे।

सिद्धार्थ मंगला की बात मान भी लेते हैं परंतु जब उन्हें पता चलता है कि यशोधरा उनसे प्रेम करती हैं और उनके सिवा वे किसी से विवाह नहीं करेंगी, तब वे निश्चय करते हैं कि वे स्वयंवर में भाग लेंगे। स्वयंबर की तिथि निर्धारित कर दी जाती है। राजा दंडपानी स्वयंवर में पड़ोसी देशों के राजकुमारों को भी आमंत्रित करते हैं क्योंकि वे चाहते थे कि यशोधरा का विवाह सिद्धार्थ को छोड़कर और किसी के भी साथ हो जाए।

दोस्तो कहा जाता है कि स्वयंवर से कुछ दिन पहले ही सिद्धार्थ के हाथ में चोट लग जाती है जिसके कारण उनका स्वयंवर में भाग लेना मुश्किल लगने लगता है। परंतु यशोधरा के सच्चे प्रेम और अपने माता – पिता के विश्वास के कारण सिद्धार्थ स्वयंवर में भाग लेते हैं।

सिद्धार्थ को हराने के लिए स्वयंवर की परीक्षा ऐसी रखी जाती है, जिसमें सिद्धार्थ को अपने हाथों का ज्यादा उपयोग करना पड़े क्योंकि सिद्धार्थ के हाथों में चोट लगी हुई थी , परंतु इतने छल कपट के बाद भी सिद्धार्थ से ईर्ष्या करने वाले उन्हें हरा नहीं पाते और सिद्धार्थ स्वयंवर की परीक्षा में विजयी होते हैं।

सिद्धार्थ के स्वयंवर में विजय होने के बाद राजा शुद्धोधन और राजा दंडपानी विवाह के लिए एक उचित मुहूर्त निकलवाते हैं। सिद्धार्थ और यशोधरा के विवाह की खबर सुन पूरा कपिलवस्तु बहुत खुश होता है। और सिद्धार्थ और यशोधरा के विवाह की तैयारियां शुरू हो जाती हैं ।

सिद्धार्थ और यशोधरा का विवाह

राजा शुद्धोधन और राजा दंडपानी भारतवर्ष के बड़े – बड़े राजाओं को विवाह में आमंत्रित करते हैं । विवाह के लिए एक उचित मुहूर्त निकलवाया जाता है और सभी विधि विधानों के साथ विवाह संपन्न करा दिया जाता है।

एक घटना है जो सिद्धार्थ और यशोधरा के विवाह के समय घटती है जो आपको जरूर जानी चाहिए। सिद्धार्थ और यशोधरा के विवाह में आम्रपाली को भी बुलाया गया था। आम्रपाली उस समय पर पूरे भारतवर्ष की सबसे सुंदर नगरवधू थी । बड़े बड़े राजा महाराजा उसकी एक झलक को तरसते थे।

नगरवधू आम्रपाली की कहानी

जो एक बार उसे देख लेता था , वह अपने आप को उसकी तरफ आकर्षित होने से रोक नहीं पाता था। उसने आज तक कोई ऐसा राजा नहीं देखा था जो उसके सौंदर्य को देखने के बाद उसका दास ना बन गया हो , परंतु सिद्धार्थ को देखने के बाद उसे पहली बार लगता है कि उसके सौंदर्य में कोई कमी है क्योंकि अपने हर प्रयास के बाद भी वैशाली की नगरवधू सिद्धार्थ को अपनी तरफ आकर्षित नहीं कर पाई थी।

उसे अब तक ऐसे पुरुष तो मिले थे जिन्हें उससे प्रेम था, परंतु उसे पहली बार कोई ऐसा पुरुष मिला था जिससे उसे प्रेम हो गया था। सिद्धार्थ की छवि थी ही ऐसी , जो भी उन्हें देख लेता था, वह उनका ही हो जाता था। आम्रपाली के प्रयास करने के बाद भी जब सिद्धार्थ उसकी तरफ आकर्षित नहीं होते तो यह देख मगध के राजा बिंबिसार भी सिद्धार्थ के व्यक्तित्व से बहुत प्रभावित होते हैं और उनके मित्र बन जाते हैं। भला सिद्धार्थ जैसे व्यक्ति का मित्र कौन ना बनना चाहेगा ?

सिद्धार्थ का राज्याभिषेक

अब सिद्धार्थ का विवाह भी हो चुका था और अब सिद्धार्थ के राज्याभिषेक कि तैयारियां शुरू होती हैं, आखिरकार वह घड़ी करीब आ रही थी जिसका इंतजार राजा शुद्धोधन को कई वर्षों से था। राजा शुद्धोधन सिद्धार्थ से कहते हैं पुत्र अब तुम योग्य हो , तुम्हारा विवाह भी हो चुका है और तुम्हें राजनीति का पूरा ज्ञान भी हो गया है।

अब समय आ गया है कि तुम राजा बनकर अपनी प्रजा की सेवा करो सिद्धार्थ कहते हैं , परंतु पिताजी में राजा बनने से पहले अपनी प्रजा से मिलना चाहता हूं। कपिलवस्तु की सीमाओं के पार जाना चाहता हूं। मैं अपने पूरे राज्य को देखना चाहता हूं । मैं अपने सारे देश को देखना चाहता हूं और उसे जानना चाहता हूं।

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राजा सिद्धार्थ की बात सुन उनसे कहते हैं परंतु पुत्र पूरा राज्य देखने की क्या आवश्यकता है ? सिद्धार्थ कहते हैं पिताजी जिन लोगों की सेवा करने के लिए मैं राजा बनने जा रहा हूं , मैं उनसे मिलना चाहता हूं। उन्हें जानना चाहता हूं। सिद्धार्थ की यह बात सुन राजा शुद्धोधन घबराने लगते हैं।

क्योंकि वे जानते हैं कि अगर सिद्धार्थ राज्य की सीमा के बाहर चले गए तो वे उन सभी सत्यों से अवगत हो जाएंगे जो उनसे अब तक छुपाए गए थे। राजा शुद्धोधन सिद्धार्थ से कहते हैं पुत्र मैं तुम्हें कपिलवस्तु की सीमाओं से बाहर जाने की आज्ञा नहीं दे सकता। सिद्धार्थ पूछते हैं परंतु क्यों पिताजी ?

राजा शुद्धोधन कहते हैं तुम्हारे इस प्रश्न का मेरे पास कोई उत्तर नहीं है। सिद्धार्थ कहते हैं तो ठीक है पिताजी, मैं भी इस राज्य का कार्यभार नहीं संभाल सकता क्योंकि जिस प्रजा को मैं जानता ही नहीं हूँ , उसकी सेवा मैं कैसे कर सकूंगा। इतना कहकर सिद्धार्थ राजा के पास से चले जाते हैं।

सिद्धार्थ के जाने के बाद रानी प्रजापति राजा से कहती हैं , महाराज आपको सिद्धार्थ को कपिलवस्तु के बाहर जाने की आज्ञा दे देनी चाहिए क्योंकि अब सिद्धार्थ अकेला नहीं है अब उसके साथ उसकी पत्नी यशोधरा भी है। वह उसका ख्याल रखेगी।

सिद्धार्थ और यशोधरा का राज्य भ्रमण

राजा शुद्धोधन को रानी प्रजापति की बात उचित लगती है और वे सिद्धार्थ को कपिलवस्तु से बाहर जाने की अनुमति दे देते हैं। सिद्धार्थ अनुमति पाकर बहुत प्रसन्न होते हैं और राज्य भ्रमण की तैयारियों में लग जाते हैं। राजा शुद्धोधन सिद्धार्थ और यशोधरा के राज्य भ्रमण पर जाने से पहले ऐसी व्यवस्था कर देते हैं कि सिद्धार्थ को कोई भी ऐसा दृश्य ना दिखे जिससे उन्हें जीवन की सच्चाई का पता चले।

बहुत सारे दास दासियों व सैनिकों के साथ सिद्धार्थ और यशोधरा राज्य भ्रमण के लिए निकल पड़ते हैं। जैसे ही सिद्धार्थ और यशोधरा कपिलवस्तु की सीमा पार करते हैं। उन्हें कुछ व्यक्ति नजर आते हैं जिन्होंने एक अलग सा वेश धारण किया होता है। उन लोगों ने अपनी कमर पर मोर के पंख बांधे होते हैं।

सिद्धार्थ उन लोगों की इस वेशभूषा को देख अपना रथ रुकवाकर उनके पास जाते हैं और उनसे पूछते हैं यह मयूरपंख आपने अपनी कमर पर क्यों बांधे हुए हैं ? क्या यह यहां की कोई रीत है या केवल सुंदर दिखने के लिए आपने इन्हें सजाया हुआ है ? उन लोगों में से एक व्यक्ति कहता है नहीं, ये दोनों ही बातें सत्य नहीं है। सिद्धार्थ पूछते हैं तो इन्हें अपनी कमर से बांधने का कारण क्या है ?

वे लोग कहते हैं , हम अछूत हैं युवराज ! हमारे छूने से मिट्टी भी अपवित्र हो जाती है। हमारे पद चिन्हों पर ब्राह्मण और क्षत्रियों के पद ना पड़े इसलिए हमें अपने पद चिन्ह मिटाने पड़ते हैं। इसलिए प्रत्येक शूद्र अपनी कमर पर मयूरपंख बांधता है। उन लोगों की बात सुन सिद्धार्थ का हृदय पीड़ा से भर जाता है।

सिद्धार्थ उन लोगों से पूछते हैं, कि यह कैसी नीति है ? यह तो मनुष्यता का अपमान है। वे लोग कहते हैं, क्षमा करें युवराज परंतु यही नियम है और जो इस नियम को नहीं मानता, उसे दंड मिलता है। इतना कहकर वे लोग अपने मार्ग में आगे बढ़ जाते हैं । सिद्धार्थ भी अपने मन में पीड़ा ले आगे बढ़ते हैं।

जहां सिद्धार्थ पहला पड़ाव डालते हैं, वहाँ एक गरीब व्यक्ति की झोपड़ी होती है। वह गरीब व्यक्ति सिद्धार्थ और यशोधरा को अपने घर भोजन पर आमंत्रित करता है। सिद्धार्थ उस व्यक्ति के आमंत्रण को स्वीकार लेते हैं और उसके घर भोजन के लिए जाते हैं। जब सिद्धार्थ के सामने भोजन लाया जाता है तो उस भोजन को देख सिद्धार्थ की आंखों से आंसू बहने लगते हैं।

क्योंकि सिद्धार्थ को यह बात पहली बार पता लगती है कि इस संसार में ऐसे भी व्यक्ति हैं जिन्हें स्वादिष्ट भोजन तो दूर की बात है , पेट भर भोजन भी नहीं मिलता। सिद्धार्थ इतनी गरीबी, इतनी लाचारी , पहली बार देखते हैं। वह व्यक्ति सिद्धार्थ के लिए एक छोटे से बर्तन में थोड़े से चावल लेकर आया था।

उन चावलों के दानों को देख सिद्धार्थ समझ गए थे कि उस व्यक्ति का परिवार कितनी गरीबी में जी रहा था। सिद्धार्थ उसी क्षण बिना भोजन करें, वहां से चले जाते हैं। सिद्धार्थ के मन में केवल यही प्रश्न उठता रहता है कि भला मनुष्य और मनुष्य के बीच इतना अंतर क्यों ? किसी के पास इतना धन है कि उससे संभाला भी नहीं जाता और किसी के पास धन की इतनी कमी है कि वह पेट भरकर भोजन भी नहीं कर सकता।

लोग कहते हैं कि ईश्वर कण कण में बसा है फिर वह किसी के पैरों की मिट्टी से अछूता कैसे रह सकता है। किसी की पीड़ा से अछूता कैसे हो सकता है। सिद्धार्थ को धीरे धीरे जीवन के वे सभी सत्य पता लग रहे थे जो अब तक उनसे छुपाए गए थे। अब तक उन्होंने पशु पक्षियों की मृत्यु तो देखी थी परंतु अभी तक उन्होंने अपने किसी परिजन की मृत्यु नहीं देखी थी।

जिसके कारण उन्हें लगता था कि उनके माता पिता , पत्नी , रेशेदार सभी हमेशा रहने वाले हैं, परंतु उनका यह वहम भी बहुत जल्दी टूटने वाला था। अपने मन की पीड़ा को शांत करने के लिए सिद्धार्थ अपने सार्थी चन्ना के साथ , यूं ही कहीं घूमने के लिए निकल पड़ते हैं।

सिद्धार्थ का सत्य से अवगत

मार्ग में सिद्धार्थ को एक अजीब सा दृश्य नजर आता है। ऐसा दृश्य सिद्धार्थ ने आज से पहले कभी नहीं देखा था। सिद्धार्थ देखते हैं कि चार लोगों ने अपने कंधों पर कुछ उठाया हुआ है और बहुत सारे लोग उनके पीछे चल रहे हैं। सभी के चेहरों पर एक उदासी है। सिद्धार्थ ने आज से पहले कभी भी इतने सारे उदास लोग एक साथ नहीं देखे थे।

सिद्धार्थ अपने सारथी चन्ना से पूछते हैं, चन्ना ये लोग कौन हैं ? और कहां जा रहे हैं ? और उन चार लोगों ने अपने कंधों पर क्या उठाया हुआ है ? चन्ना थोड़ा सा हिचकिचाते हुए कहता है युवराज ये लोग अपने किसी परिजन के मृत शरीर को शमशान ले जा रहे हैं।

सिद्धार्थ पूछते हैं मृत शरीर का क्या अर्थ है चन्ना ? चन्ना कहता है मृत शरीर का अर्थ है जिसमें प्राण ना हो, जिसकी मृत्यु हो गई हो। सिद्धार्थ कहते हैं ऐसे कैसे किसी की मृत्यु हो सकती है ? ऐसे कैसे प्राण शरीर को छोड़ सकते हैं ? चन्ना कहता है युवराज यही जीवन का सत्य है। सिद्धार्थ रोते हुए कहते हैं यह जीवन कितना पीड़ादायक है चन्ना।

मैंने आज तक मृत्यु के बारे में सुना था , परंतु आज देख भी लिया। रथ वापस घुमा लो, चन्ना , अब मुझे और कुछ नहीं देखना। अपने मन की गहरी पीड़ा के कारण सिद्धार्थ सभी लोगों के साथ कपिलवस्तु वापस लौट आते हैं। कपिलवस्तु आने के बाद यशोधरा सिद्धार्थ व सभी परिवार वालों को यह खुशखबरी देती हैं कि वे गर्भ से हैं।

जैसे ही यह बात सिद्धार्थ को पता चलती है कि वे पिता बनने वाले हैं तो उनके मन का सारा दुख दर्द गायब हो जाता है। कुछ क्षण के लिए उन्हें लगता है कि उनके जीवन में कोई दुख है ही नहीं। राजा शुद्धोधन और रानी प्रजापति को भी जब यह खुशखबरी मिलती है , तो उनकी भी खुशी का ठिकाना नहीं रहता।

सारा महल बहुत प्रसन्न होता है केवल कुछ लोगों को छोड़कर। दादा बनने की खुशी में राजा शुद्धोधन तय करते हैं कि वे ब्राह्मणों में अनाज बाटेंगे जिससे कि उनके घर की खुशियां इसी तरह बनी रहें परंतु सिद्धार्थ इस बात का विरोध करते हुए अपने पिता से कहते हैं , क्षमा करें पिताजी परंतु अनाज की जरूरत ब्राह्मणों को नहीं बल्कि उन गरीबों को है जिनके घरों में दो वक्त का खाना तक नहीं है।

यदि पुण्य मिलेगा तो ऐसे लोगों को भोजन खिलाने से नहीं जिनका पेट पहले से ही भरा हुआ है, बल्कि ऐसे लोगों को भोजन खिलाने से जिनका पेट सच में खाली है , जो भूखे हैं। मैं चाहता हूं कि आप इस अनाज को ब्राह्मणों में बांटने की बजाय उन लोगों में बंटवाएँ जिन्हें इसकी ज्यादा जरूरत है।

जब यह बात ब्राह्मणों को पता चलती है तो वे बहुत क्रोधित होते हैं, परंतु सिद्धार्थ उस अनाज को गरीबों में ही बाँटते हैं। नगर में अनाज बांटकर जब सिद्धार्थ अपने सारथी चन्ना के साथ महल लौट रहे होते हैं तो मार्ग में उन्हें एक सन्यासी मिलता है। सिद्धार्थ ने अब से पहले कभी कोई सन्यासी नहीं देखा था।

इसलिए वे चन्ना से पूछते हैं, चन्ना यह व्यक्ति कौन है ? जो ध्यान की अवस्था में बैठा हुआ है। चन्ना कहता है युवराज यह एक सन्यासी है । सिद्धार्थ कहते हैं परंतु मैंने इन्हें पहले कभी नहीं देखा। चन्ना कहता है युवराज ये कभी – कभी भ्रमण करते हुए आ जाते हैं। सिद्धार्थ अपने रथ से उतरकर उन सान्यासी के पास जाते हैं और उनसे कहते हैं।

मैं शाक्य युवराज सिद्धार्थ हूं और में आपको अन्न देने आया हूं। सन्यासी अपनी आंखें खोलते हैं और सिद्धार्थ की ओर देखते हैं । सिद्धार्थ उन सन्यासी से कहते हैं, क्षमा कीजिएगा, परंतु मैं जानना चाहता हूं कि आप कौन हैं ? और कहां रहते हैं ?

वे सन्यासी कहते हैं, मेरे बहुत सारे नाम हैं तू किसी भी नाम से मुझे पुकार सकता है । सिद्धार्थ पूछते हैं जैसे ? सन्यासी कहते हैं साधु संत, सन्यासी, बैरागी इत्यादि सिद्धार्थ पूछते हैं, परंतु आपका घर कहां है ? वे सन्यासी कहते हैं यह पूरा संसार ही मेरा घर है। मेरा जहां मन करता है, मैं वहाँ ठहर जाता हूं।

सिद्धार्थ पूछते हैं और काम ? काम क्या करते हैं आप ? वे सन्यासी कहते हैं , काम तो संसारी करते हैं सन्यासी नहीं। सिद्धार्थ पूछते हैं और भोजन का प्रबंध वो कैसे होता है ? वे सन्यासी कहते हैं भोजन का प्रबंध भिक्षा द्वारा हो जाता है। सिद्धार्थ पूछते हैं, भिक्षा मांगने में लज्जा नहीं आती।

वे सन्यासी कहते हैं अहम और लज्जा को कुचल कर ही मनुष्य सन्यासी बनता है। सिद्धार्थ पूछते हैं और यदि किसी दिन कोई भिक्षा ना दे तो ? सन्यासी कहते हैं तो कोई शोक नहीं। यह प्रकृति इंकार नहीं करती । हवा कभी नहीं रुकती , पेड़ फल देने से मना नहीं करते । नदियां जल देने से मना नहीं करतीं।

जीवन बिल्कुल वैसे ही चलता है जैसे चलना चाहिए । सिद्धार्थ पूछते हैं वैसे आप पूरे समय करते क्या है ? आपका लक्ष्य क्या है ? वे सन्यासी कहते हैं, मैं मन को जीतने का प्रयास करता हूं। सिद्धार्थ पूछते हैं यह कैसा कार्य है ? वे सन्यासी कहते हैं यह मन ही तो है जो वासना क्रोध और लालच जैसी चीजों में फंस जाता है।

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सिद्धार्थ पूछते हैं, आप किस मार्ग जाएंगे ? वे सन्यासी कहते हैं, वो मैं तय नहीं करूंगा। यह मार्ग ही तय करेगा कि यह मुझे कहां ले जाएगा। इतना कहकर वे संन्यासी वहां से चले जाते हैं और सिद्धार्थ के मन पर एक गहरी छाप छोड़ जाते हैं।

उस सन्यासी के जाने के बाद सिद्धार्थ अपने सार्थी से कहते हैं चन्ना मैंने धनी देखें, दरिद्र देखे, सत्ता में अंधे क्षत्रिय देखें, ज्ञानी ब्राह्मण देखे परंतु यह कैसा जीवन है जो कुछ ना होने पर भी इतना सुखी है।

अब समय करीब आ रहा था , उस सीमा को पार करने का जो सिद्धार्थ और सन्यास के बीच में थी। इसी बीच सिद्धार्थ को किसी के द्वारा यह भी पता चलता है कि रानी प्रजापति सिद्धार्थ की जननी नहीं हैं, उनकी असली मां महामाया की मृत्यु तो उन्हें जन्म देने के सात दिन पश्चात ही हो गई थी।

सिद्धार्थ इस सत्य को सुनकर पूरी तरह से टूट जाते हैं क्योंकि उन्होंने पहली बार किसी अपने को खोने का दर्द महसूस किया था। उसी बीच सिद्धार्थ को नई नगरी भी देखने का अवसर मिल जाता है। अब से पहले सिद्धार्थ ने केवल नई नगरी का नाम सुना था, परंतु कभी उसे देखा नहीं था।

यह घटना थोड़ी ध्यान से समझने वाली है कि जब सिद्धार्थ नई नगरी पहुंचते हैं तो वे क्या देखते हैं। जैसे ही सिद्धार्थ नई नगरी पहुंचते हैं तो उन्हें समझ नहीं आता कि वे कहां आ गए हैं, क्योंकि उन्होंने आज से पहले कभी भी ऐसे मनुष्य नहीं देखे थे। उन्हें सबसे पहले एक कुबडा व्यक्ति दिखता है।

सिद्धार्थ उस व्यक्ति को देख अपने सार्थी चन्ना से पूछते हैं , चन्ना इस व्यक्ति के शरीर की बनावट मुझसे इतनी अलग कैसे हैं ? यह कमर झुकाकर क्यों चल रहा है ? चन्ना कहता है युवराज यह अपने पुराने जन्मों के कर्मों के फल भोग रहा है। सिद्धार्थ कहते हैं परंतु मैंने तो सुना था कि कर्म फल से मनुष्य धनिक बनता है या फिर दरिद्र परंतु यह कैसा कर्मफल है।

फिर सिद्धार्थ को एक वृद्ध व्यक्ति दिखता है। सिद्धार्थ पूछते हैं, क्या यह व्यक्ति भी अपने पुराने जन्मों के कर्मफल भोग रहा है ? चन्ना कहता है नहीं युवराज यह वृद्धावस्था है जो अमीर और गरीब सभी के जीवन में आती है। वृद्धावस्था , धनी और निर्धन में भेद नहीं करती। सिद्धार्थ पूछते हैं तो क्या सब इस अवस्था से गुजरते हैं ? मैं भी और तुम भी ?

चन्ना कहता है हां युवराज जन्म लेने वाला प्रत्येक मनुष्य जीवन के अंतिम चरण में इस अवस्था से गुजरता है। फिर सिद्धार्थ को एक कुष्ठ रोगी नजर आता है जिसे कुछ लोग पीट रहे होते हैं। सिद्धार्थ उस रोगी को बचाते हैं और पीटने वालों से पूछते हैं आप लोग इसे क्यों पीट रहे हैं ?

वे लोग कहते हैं युवराज यह रोगी है और आप भी इससे दूर रहिए वरना यह रोग आपको भी लग जाएगा। यह रोग छूने से लगता है। सिद्धार्थ पूछते हैं परंतु रोग तो मुझे भी हुआ था लेकिन मुझे तो सब ने छुआ था। सिद्धार्थ का सार्थी चन्ना कहता है परंतु युवराज वह साधारण रोग था और यह कुष्ठ रोग है।

सिद्धार्थ पूछते हैं क्या ये भी सब को होता है ? चन्ना कहता है नहीं युवराज परंतु ऐसे कई रोग हैं जिनसे मनुष्य घिर जाता है। सिद्धार्थ को नई नगरी में वृद्ध और तरह तरह के रोगों से ग्रस्त लोग दिखते हैं। उन लोगों को देख सिद्धार्थ के मन में यही प्रश्न उठते हैं कि क्या उन्हें भी कोई रोग हो सकता है ? क्या उनके पुत्र और पत्नी को भी कोई रोग हो सकता है ?

क्या उन्हें और उनके पत्नी और बच्चे को भी एक दिन वृद्ध होना पड़ेगा ? सिद्धार्थ सोचते हैं कि जब वे वृद्ध हो जाएंगे या रोगी हो जाएंगे तो अपने उस दुख को कैसे संभालेंगे ? क्या कोई ऐसा उपाय भी है जो उनके सभी दुखों को दूर कर सके ? सिद्धार्थ के मन में बार – बार लगातार यही प्रश्न घूमता रहता है कि क्या कोई मार्ग है जिस पर चलकर सभी दुखों का अंत किया जा सके ?

यहां पर एक बात समझने वाली है कि जब लगातार कोई प्रश्न हमारे भीतर उठता है तो हमें उसका उत्तर अवश्य मिलता है। सिद्धार्थ को भी उत्तर मिलता है उन्हें वह सन्यासी याद आता है जिसने सिद्धार्थ से मन जीतने की बात कही थी। सिद्धार्थ को समझ आता है कि उनका मन ही उनके वश में नहीं है जिसके कारण वे दुख से पीड़ित हैं ।

वे अपनी भावनाओं और इच्छाओं पर काबू नहीं कर पा रहे थे। उन्हें किसी भी हालत में अपने मन को जीतना होगा और मन को जीतना तभी संभव है जब वे सन्यास ग्रहण कर लें। सिद्धार्थ को यह बात साफ साफ नज़र आ जाती है कि उन्हें उनके दुखों से मुक्ति संयासी बनकर ही मिल सकती है।

क्योंकि जिन लोगों के होने से आज उन्हें खुशी मिल रही है , कल उन्हीं लोगों के ना होने से उन्हें दुख भी मिलेगा। सिद्धार्थ को सुख के पीछे छिपा हुआ दुख स्पष्ट रूप से दिख जाता है। यहां पर एक बात समझनी जरूरी है कि सिद्धार्थ के पास दो विकल्प नहीं थे कि वे सन्यासी बने या ग्रहस्त जीवन बिताएं।

गौतम बुद्ध का संन्यास ग्रहण

ज्यादातर लोग सोचते हैं कि उनके पास दो विकल्प थे , परंतु अगर आप ध्यान से समझने का प्रयास करें तो आपको समझ आएगा कि उनके पास केवल एक ही विकल्प था , क्योंकि वे ग्रहस्त जीवन के बारे में पूरी तरह से स्पष्ट थे और जहां स्पष्टता होती है , वहां दो विकल्प नहीं होते।

अब तक सिद्धार्थ को समझ आ गया था कि हर चीज की शुरुआत में तो सुख होता है परंतु हर चीज का अंत दुख के साथ होता है। इसलिए सिद्धार्थ सबसे पहले अपनी पत्नी यशोधरा को बताते हैं कि वे सन्यास लेना चाहते हैं। संन्यास की बात सुनते ही यशोधरा को एक बहुत बड़ा धक्का लगता है।

वे सिद्धार्थ को संन्यास लेने से रोकना तो चाहती हैं परंतु वे सिद्धार्थ से प्रेम भी करती हैं, जिसके कारण वे जानती हैं कि सिद्धार्थ की खुशी रुकने में नहीं है बल्कि जाने में सिद्धार्थ यशोधरा से कहते हैं। मेरे भीतर की पीड़ा मुझे जीने नहीं दे रही है यशोधरा क्या तुम इस पीड़ा को खत्म करने में मेरा सहयोग करोगी।

यशोधरा कहती हैं अवश्य परंतु मैं और हमारा पुत्र राहुल आपके बिना कैसे रहेंगे ? कृपाकर आप जहां भी जाना चाहते हैं। हमें भी अपने साथ ले चलें। सिद्धार्थ कहते हैं मैं ले तो चलता परंतु मैं खुद नहीं जानता हूं कि मुझे कहां जाना है ? लेकिन मैं तुमसे एक वादा जरुर करता हूं कि जैसे ही मुझे मेरे सभी प्रश्नों के उत्तर मिल जाएंगे , मैं तुम्हारे पास लौट आऊंगा।

यशोधरा कहती हैं भविष्य के गर्भ में क्या छुपा है , यह कौन जानता है ? लेकिन अगर आपने वानप्रस्थ होने का निर्णय ले ही लिया है, तो आपसे एक विनती है कि आप दिन के उजाले में ना जाएं बल्कि रात के अंधेरे में जाएं क्योंकि आपको जाते हुए मैं देख ना सकूंगी।

Gautam Buddha Biography in Hindi | गौतम बुद्ध की जीवनी

सिद्धार्थ कहते हैं , मैं अज्ञान के अंधेरे को ओढ़ कर ही जा रहा हूं यशोधरा , परंतु मैं तुम्हें वचन देता हूं कि ज्ञान का उजाला मिलते ही लौट आऊंगा तुम्हारे पास। उसी रात सिद्धार्थ वानप्रस्थ होने का निश्चय करते हैं । सिद्धार्थ के मन में अपनी पत्नी और बच्चे को उनका अधिकार ना दे पाने की पीड़ा तो होती है परंतु उसके साथ – साथ उनके मन में मनुष्य के दुखों का कारण जानने की आशा भी होती है।

सिद्धार्थ आधी रात नंगे पैर अपने कक्ष से बाहर निकलते हैं। नंगे पैर सिद्धार्थ इसलिए निकलते हैं ताकि उनके कदमों की आहट सुन कोई जगे ना। महल के बाहर सिद्धार्थ को उनका सार्थी चन्ना उनके प्रिय अश्व कंधक के साथ मिलता है। सिद्धार्थ का सार्थी चन्ना भी अनूमा नदी तक उनके साथ जाता है।

अनुमा नदी पर पहुंचने के बाद , सिद्धार्थ एक पत्थर पर बैठकर अपनी तलवार से अपने बाल काटते हैं और अपने सभी आभूषणों को उतारकर एक पोटली में बांधकर अपने सार्थी चन्ना को दे देते हैं और कहते हैं यह पोटली महाराज को दे देना चन्ना।

और उनसे कहना कि मैं मनुष्यों के दुखों का कारण खोजने निकला हूं और जैसे ही मेरी खोज पूरी हो जाएगी , मैं उनके पास लौट आऊंगा । वे मुझसे बहुत स्नेह करते हैं ना इसलिए पीड़ा में होंगे । तुम उन्हें सांत्वना देना। चन्ना पूछता है युवराज क्या मैं आपके साथ नहीं चल सकता ?

सिद्धार्थ कहते हैं , साधुओं के सेवक नहीं हुआ करते चन्ना। चन्ना कहता है परंतु शिष्य तो होते हैं ना युवराज। सिद्धार्थ कहते हैं , परंतु मैं गुरु नहीं हूं। चन्ना कहता है युवराज आपको छोड़कर मैं महल वापस कैसे जा सकता हूँ। सिद्धार्थ कहते हैं इसे मेरा आखरी आदेश समझो चन्ना। इतना कहकर सिद्धार्थ मार्ग में आगे बढ़ जाते हैं और चन्ना रोते हुए महल वापस लौट जाता है।

जैसे ही यह खबर सिद्धार्थ के माता – पिता को मिलती है तो उनके ऊपर मानो दुखों का पहाड़ टूट पड़ता है। अचानक सिद्धार्थ के माता – पिता को असित मुनि की भविष्यवाणी याद आती है। उन्हें इस बात का अंदेशा तो बहुत पहले से था , परंतु वे इस बात को नकारते आ रहे थे। राजा शुद्धोधन तुरंत अपने पुत्र को खोजने के लिए सैनिकों को भेजते हैं।

इधर सिद्धार्थ भी कपिलवस्तु की सीमा से बहुत आगे निकल आते हैं। सिद्धार्थ को यह तो पता नहीं था कि उनकी मंजिल कहां है ? परंतु वे एक आशा के साथ मार्ग में आगे बढ़ते जा रहे थे। चलते – चलते अचानक सिद्धार्थ को एक व्यक्ति नजर आता है जिसमें साधु वस्त्र धारण किए होते हैं।

उस व्यक्ति को देख सिद्धार्थ उसके पास जाते हैं और उससे पूछते हैं। सुनो भाई क्या तुम एक सन्यासी हो ? वह व्यक्ति कहता नहीं मैं एक सन्यासी नहीं शिकारी हुँ । सिद्धार्थ पूछते हैं फिर तुमने ये साधु वस्त्र क्यों धारण कर रखे हैं ? वह शिकारी कहता है , साधु वस्त्र इसलिए धारण करता हूं ताकि पक्षी मुझे पहचान ना सके और मैं उनका शिकार कर सकूं।

क्योंकि पक्षी साधु संतों से डरते नहीं है। सिद्धार्थ कहते हैं , इस तरह से तो पक्षियों का साधु संतों पर से विश्वास उठ जाएगा और यह गलत है , तुम्हें ऐसा नहीं करना चाहिए । वह शिकारी कहता है पेट भरने के लिए कुछ तो करना ही पड़ता है। अगर मैं यह काम नहीं करूंगा तो क्या करूंगा ?

सिद्धार्थ कहते हैं यदि मैं तुम्हें धन दे दूं तो क्या तुम इस काम को करना छोड़ दोगे ? वह शिकारी कहता है अगर तुम मुझे धन दोगे तो मैं यह काम करना छोड़ दूंगा और तुम्हारे द्वारा दिए गए धन से कोई और व्यवसाय शुरू कर लूंगा।

सिद्धार्थ कहते हैं व्यवसाय शुरू कर सकते हो, वह शिकारी कहता यह तो ठीक है परंतु मुझे यह समझ नहीं आ रहा कि तुम इन साधु वस्त्रों का क्या करोगे ? सिद्धार्थ कहते हैं मैं इन वस्त्रों को पहनकर पशु पक्षियों का विश्वास जीतुंगा, उन्हें अपना मित्र बनाऊँगा ।

वह शिकारी अपने वस्त्र सिद्धार्थ को दे देता है और सिद्धार्थ अपने वस्त्र उस शिकारी को दे देते हैं और उस शिकारी को वस्त्र देकर सिद्धार्थ अपने मार्ग में आगे बढ़ते हैं। एक ऐसा मार्ग जो कहां खत्म होगा , कुछ पता नहीं है।

सिद्धार्थ को आदत नहीं थी , जमीन पर नंगे पैर चलने की परंतु अब उन्हें कंकड़ पत्थरों पर चलना पड़ रहा था , कांटों पर चलना पड़ रहा था। सिद्धार्थ चाहते तो उस पीड़ा को देखकर वापस लौट सकते थे , परंतु सिद्धार्थ ऐसा नहीं करते क्योंकि उस पीड़ा से कहीं गहरी पीड़ा सिद्धार्थ के मन में थी।

उधर कपिलवस्तु में राजा शुद्धोधन चन्ना से पूछते हैं कि तुमने सिद्धार्थ को जाने क्यों दिया ? चन्ना कहता है महाराज मैंने उनसे बहुत विनती करी परंतु वे नहीं माने। मैंने उनके साथ चलने को भी कहा परंतु उन्होने मना कर दिया। चन्ना राजा शुद्धोधन से कहता है महाराज युवराज सिद्धार्थ ने आपसे कहने को कहा था कि युद्ध किसी भी प्रश्न का हल नहीं होता और युद्ध से केवल विनाश ही होता है।

चन्ना रानी प्रजापति से कहता है , महारानी युवराज सिद्धार्थ ने आपसे कहने को कहा था कि जन्म देने वाली मां को तो नहीं देखा परंतु तुम उससे भी बढ़कर हो। तुम्हारे खिलाए हर निवाले का ऋणी रहूंगा मैं और चन्ना यशोधरा से कहता है रानी यशोधरा युवराज ने आपसे कहने को कहा था कि मेरी व्यथा को अपनी व्यथा बनाने के लिए मैं सदैव तुम्हारा ऋणी रहूंगा।

Gautam Buddha Biography in Hindi | गौतम बुद्ध का जीवन परिचय

पति की इच्छा और अनिच्छा का ध्यान तो हर पत्नी रखती है पर पति की व्यथा को अपनाने वाली भार्या शायद ही कोई होती है । यह जानते हुए भी कि मैं चला जाऊंगा तुमने मेरा विरोध नहीं किया। यदि मैं अपने संकल्प में सफल हुआ तो समग्र मनुष्य जाति तुम्हारे इस त्याग की ऋणी रहेगी। चन्ना की बात सुन राजा शुद्धोधन यशोधरा से कहते हैं।

यदि तुम्हें पता था यशोधरा तो तुमने मुझे क्यों नहीं बताया ? मैं सिद्धार्थ के पैर पकड़ लेता , उसकी हर बात मानता परंतु उसे रोक लेता । यशोधरा कहती हैं क्षमा कीजिएगा पिताजी, परंतु जब से उन्होंने युद्ध के बाद आप सभी को घायल देखा है , नई नगरी के भेद को जाना है तब से उन्हें कोई सुद बुद ही नहीं थी।

रात रात भर जागते कभी राहुल को देखते तो कभी ध्यान करने लगते। ना ध्यान कर पा रहे थे , ना पीड़ा सह पा रहे थे और मैं उनकी यह पीड़ा देख ना सकी इसलिए मैंने ना तो उन्हें रोका और ना ही किसी को बताया। सिद्धार्थ के सन्यास ले लेने से पूरा परिवार शोक में था। सिवाय तीन लोगों के द्रोणोधन उसकी पत्नी मंगला और देवदत्त और ये तीनों बहुत प्रसन्न थे।

कहानी में आगे बढ़ते हैं आपने सुना होगा कि जब हमारा संकल्प प्रबल होता है तो रास्ते अपने आप ही खुलते चले जाते हैं। सिद्धार्थ भी एक दृढ़ संकल्प के साथ अपने मार्ग में बिना किसी मार्गदर्शन के आगे बढ़ रहे थे। उन्हें गुरु की आवश्यकता तो थी परंतु उनके गुरु उन्हें कहां मिलेंगे ? वे ये नहीं जानते थे। एक अनजाने मार्ग पर चलते चलते सिद्धार्थ को एक सन्यासी मिलते हैं जो गुरु अलारकलाम के शिष्य होते हैं।

सिद्धार्थ और गुरु आलार कलाम की भेंट

सिद्धार्थ को देख वे सन्यासी उनसे पूछते हैं , कौन हो तुम ? सिद्धार्थ कहते हैं , मेरा नाम सिद्धार्थ है। वे सन्यासी पूछते हैं , तुम इस वन में क्या कर रहे हो ? सिद्धार्थ कहते हैं मैंने गृह त्याग किया है। वे सन्यासी मुस्कुराते हुए पूछते हैं कितने दिन के लिए ? सिद्धार्थ कहते हैं जब तक मुझे मेरे प्रश्नों के उत्तर ना मिल जाए।

मुझे एक गुरु की तलाश है जो मुझे मेरे प्रश्नों के उत्तर दे सके। उन सन्यासी को सिद्धार्थ के अंतर की प्यास दिख जाते हैं और वे सिद्धार्थ को गुरु अलारकलाम के पास ले जाते हैं। गुरु अलारकलाम की यह विशेषता थी कि वे किसी को भी आसानी से अपना शिष्य नहीं बनाते थे।

जब सिद्धार्थ पहली बार उनके पास पहुंचते हैं तो वे सिद्धार्थ को ठीक से देखते तक नहीं है परंतु सिद्धार्थ के भीतर इतनी गहन प्यास थी कि कोई उन्हें ज्यादा देर तक अनदेखा नहीं कर सकता था। गुरु अलारकलाम भी सिद्धार्थ के भीतर की प्यास को पहचान जाते हैं, परंतु फिर भी वे सिद्धार्थ की परीक्षा लेते हैं।

सिद्धार्थ का पहली बार भिक्षाटन के लिए जाना 

सबसे पहले वे सिद्धार्थ को अन्य शिष्यों के साथ भिक्षाटन के लिए भेजते हैं। जब सिद्धार्थ सभी भिक्षुओं के साथ भिक्षाटन के लिए पहुंचते हैं तो उन्हें नगर की एक स्त्री पहचान लेती है। वह स्त्री सिद्धार्थ से पूछती है आप शाक्य युवराज सिद्धार्थ हैं ना ? परंतु आप भिक्षा क्यों मांग रहे हैं ?

सिद्धार्थ कहते हैं अब मैं युवराज नहीं , एक भिक्षु हूँ और भिक्षा मांगना ही मेरा कार्य है। इतना कहकर सिद्धार्थ अपने मार्ग में आगे बढ़ जाते हैं । सिद्धार्थ के साथ जो अन्य कुछ भिक्षु थे , उन्हें भी यह बात पता लग जाती है कि सिद्धार्थ कोई साधारण व्यक्ति नहीं बल्कि कपिलवस्तु का युवराज हैं ।

सिद्धार्थ व अन्य सभी भिक्षु भिक्षाटन कर आश्रम वापस लौट आते हैं। यह देखकर कि सिद्धार्थ भिक्षाटन कर लाए हैं। गुरु अलारकलाम सिद्धार्थ से पूछते हैं , क्या यह भिक्षा तुम खुद मांग कर लाए हो ? सिद्धार्थ कहते हैं जी गुरुदेव। गुरु अलारकलाम कहते हैं , इसका अर्थ यह है कि अब तुम्हारा अहम तुम्हारी साधना के बीच में नहीं आएगा और यह एक अच्छा संकेत है।

समय बीत रहा था और सिद्धार्थ हर वो प्रयास कर रहे थे जिससे गुरु अलारकलाम उन्हें अपना शिष्य बना लें परंतु गुरु सिद्धार्थ के धैर्य की परीक्षा ले रहे थे। वैसे गुरु अलारकलाम पहले दिन से ही सिद्धार्थ से बहुत प्रभावित से थे और उन्हें मन ही मन अपना शिष्य स्वीकार चुके थे।

जब सिद्धार्थ को गुरु अलारकलाम के पास पूरे दो दिन हो जाते हैं तब गुरु अलारकलाम सिद्धार्थ के हाथ में एक सूत्र बांधते हैं , जो गुरु के द्वारा एक शिष्य के हाथ में बांधा जाता है। सिद्धार्थ के साथ – साथ गुरु एक अन्य शिष्य को भी उसी दिन अपना शिष्य स्वीकारते हैं।

वह दूसरा शिष्य गुरु से कहता है क्षमा करें गुरुदेव परंतु मैं आपसे एक प्रश्न पूछना चाहता हूं। गुरु कहते हैं पूछो वत्स । वह शिष्य कहता है अब मैं अपने मुंह से अपनी क्या प्रशंसा करूं। मैं कई गुरुओं से ज्ञान प्राप्त कर चुका हूं। चारों वेद और उपनिषद मुझे कंठस्थ हैं , परंतु फिर भी आपने मुझे अपना शिष्य बनाने में पूरा एक महीना लगा दिया और इस सिद्धार्थ को मात्र दो दिन में ही आपने अपना शिष्य बना लिया , क्यों ?

उस शिष्य की बात सुन , गुरु अलारकलाम उससे एक प्रश्न पूछते हैं , परंतु वह उस प्रश्न का उत्तर नहीं दे पाता । फिर उसी प्रश्न को गुरु सिद्धार्थ से पूछते हैं और सिद्धार्थ उस प्रश्न का उत्तर दे देते हैं । गुरु उस शिष्य से कहते हैं , यही अंतर है तुम में और सिद्धार्थ में।

वह शिष्य गुरु की इस बात को सुन अपमानित महसूस करता है और मन ही मन सिद्धार्थ से ईर्ष्या करने लगता है। ईर्ष्या का खेल संसारियों में ही नहीं बल्कि सन्यासियों में भी चल चलता है। जब गुरु कुछ भी समझाते तो सिद्धार्थ तो बड़े ध्यान से सभी बातों को सुनते परंतु वह दूसरा शिष्य सिद्धार्थ को हमेशा नीचा दिखाने का प्रयास करता।

शुरुआत में सिद्धार्थ को ध्यान करने में बहुत कठिनाई में होती है। उनके भूत और भविष्य के विचार उन्हें ध्यान करने से रोकते हैं , परंतु लगातार प्रयास करने के कारण सिद्धार्थ का ध्यान में बैठने का समय बढ़ता चला जाता है।

गुरु अलारकलाम भी यह देखकर बहुत प्रसन्न होते हैं कि सिद्धार्थ ध्यान के मार्ग पर पूरी लगन के साथ चल रहे हैं । एक दिन ऐसा होता है कि गुरु अपने सभी शिष्यों के साथ बैठे होते हैं। अचानक वे देखते हैं कि सिद्धार्थ वहाँ नहीं हैं, इसलिए गुरु अपने एक शिष्य को सिद्धार्थ को देखने के लिए भेजते हैं।

Gautam Buddha Biography in Hindi | गौतम बुद्ध का जीवन परिचय

वह शिष्य देख कर आता है और गुरु को बताता है कि सिद्धार्थ सुबह से ही एक वृक्ष के नीचे ध्यान की अवस्था में बैठे हैं । इस बात को सुन गुरु अपने सभी शिष्यों से कहते हैं। ज्ञान प्राप्ति के लिए सिद्धार्थ के मन में बड़ी तड़प है । सिद्धार्थ के मन में बड़ी तड़प है। ऐसा प्रतीत होता है कि ज्ञान के मार्ग पर चलने के लिए वह अपने समस्त भौतिक सुखों को त्याग कर आया है।

गुरु की बात सुन , गुरु का वह शिष्य जो सिद्धार्थ से ईर्ष्या करता है , वह कहता है की क्षमा करें गुरुदेव मैं अपने मुंह से अपनी क्या प्रशंसा करूँ , परंतु सिद्धार्थ से बड़ा त्यागी मैं हूं। मैं तो ऐसे – ऐसे सुख चैन त्यागकर आया हूं कि आप चकित रह जाएंगे गुरुदेव। अंग देश के सबसे बड़े व्यापारी का पुत्र हूं मैं ।

उसकी मुझसे क्या बराबरी ? इतना सुनकर गुरु अलारकलाम का एक और शिष्य खड़ा होता है और कहता है आप सही कह रहे हैं सिद्धार्थ की और आपकी कोई बराबरी नहीं है क्योंकि आप एक व्यापारी के पुत्र हैं और सिद्धार्थ एक राजा के ! उस शिष्य की बात सुन वहां बैठे सभी शिष्य व स्वयं गुरु अलारकलाम भी चौंक जाते हैं।

गुरु अलारकलाम अपने उस शिष्य से पूछते हैं , क्या तुम सत्य कह रहे हो ? वह शिष्य कहता है जी गुरुदेव सिद्धार्थ शाक्य राजा शुद्धोधन के पुत्र हैं। इतना सुनते ही गुरु अलारकलाम की आंखों से आंसू बहने लगते हैं क्योंकि उन्हें पता लग जाता है कि सिद्धार्थ वही हैं जिनके बारे में भविष्यवाणी असित मुनि ने करी थी।

गुरु अलारकलाम अपने आप को बहुत सौभाग्यशाली समझते हैं कि उन्हें उस युग पुरुष का गुरु बनने का अवसर मिला था जो संपूर्ण मनुष्य जाति को दुख से मुक्ति का मार्ग दिखाएगा। समय बीतता है और सिद्धार्थ पूरी लगन और मेहनत के साथ ध्यान करते रहते हैं।

गुरु अलारकलाम समय – समय पर सिद्धार्थ से उनकी ध्यान में हो रही उन्नति के बारे में पूछते हैं और पाते हैं कि सिद्धार्थ ध्यान में बहुत तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। एक दिन सिद्धार्थ ध्यान में बैठते हैं और लगातार दो दिन तक ध्यान में बैठे ही रहते हैं ।

यह देखकर गुरु अलारकलाम के अन्य शिष्य चिंतित होने लगते हैं कि कहीं सिद्धार्थ को कुछ हो ना जाए परंतु गुरु अपने शिष्यों को समझाते हैं कि चिंता की कोई बात नहीं है। सिद्धार्थ पूरी तरह से सुरक्षित हैं । जब दो दिन बाद सिद्धार्थ अपनी आंखें खोलते हैं तो गुरु अलारकलाम उनसे ध्यान में हुए अनुभव के बारे में पूछते हैं।

सिद्धार्थ गुरु को अपना अनुभव बताते , सिद्धार्थ का अनुभव सुनते ही गुरु कहते हैं की अब मुझमें और तुम में कोई अंतर नहीं रह गया है। सिद्धार्थ कहते हैं नहीं गुरुदेव गुरु मैं और आपकी बराबरी! गुरू कहते हैं जिस ध्यान को साधने में मुझे सत्तर वर्ष लग गए , तुमने वही दो माह में कर लिया।

गुरु रोते हुए कहते हैं , मैं धन्य हो गया , तुम्हें अपने शिष्य के रूप में पाकर सिद्धार्थ। सिद्धार्थ कहते हैं नहीं गुरुदेव आपकी और मेरी बराबरी जब तक मैं ध्यान में था तब तक मेरा मन शांत था , परंतु जैसे ही मेरा ध्यान भंग हुआ , उसी पीड़ा और व्याकुलता ने मुझे आ घेरा।

गुरुदेव मुझे इस पीड़ा और व्याकुलता से मुक्ति का मार्ग सुझाइए। गुरु कहते हैं , मेरे पास जो भी ज्ञान था , वह मैंने तुम्हें उड़ेल दिया है। मेरा पात्र अब खाली है । तुम्हें देने के लिए मेरे पास कुछ नहीं है और मेरी आयु हो चली है इसलिए यह मेरी प्रबल इच्छा है कि मेरे जाने के बाद इस आश्रम की बागडोर तुम संभालो।

सिद्धार्थ पूछते हैं गुरुदेव मैं ? गुरु कहते हैं हां सिद्धार्थ ज्ञान में तुम अब मेरे बराबर हो गए हो। इसी ज्ञान से आने वाले दीपों को प्रज्वलित करो। सिद्धार्थ गुरु अलारकलाम के सामने हाथ जोड़ते हैं और कहते हैं गुरुदेव आपने मुझे इस योग्य समझा , इसके लिए मैं धन्यवाद करता हूं , परंतु मुझे सोचने के लिए कुछ समय चाहिए।

गुरु कहते हैं ठीक है सोच लो , मुझे तुम्हारे उत्तर की प्रतीक्षा रहेगी। अगले दिन सिद्धार्थ अपने गुरु के पास जाते हैं और उनसे कहते हैं , यह आपका मुझ पर अपार स्नेह है गुरुदेव कि आप मुझे इस योग्य समझते हैं कि  मैं इस आश्रम की बागडोर अपने हाथ में ले लूं , परंतु मेरे मन में कुछ और है गुरुदेव।

गुरु कहते हैं, निसंकोच कहो सिद्धार्थ। सिद्धार्थ कहते हैं , गुरुदेव मैं आश्रम छोड़कर जाना चाहता हूं । सिद्धार्थ का निर्णय सुन अलारकलाम को थोड़ी पीड़ा होती है , परंतु वे सिद्धार्थ के निर्णय का आदर करते हैं और उन्हें आज्ञा दे देते हैं। सिद्धार्थ कहते हैं गुरुदेव आप जैसा गुरु पाकर मैं धन्य हुआ।

गुरु कहते हैं नहीं सिद्धार्थ धन्य तो मैं हुआ तुम जैसा शिष्य पाकर। ध्यान के सात सोपान तक का ज्ञान मुझे था जो मैंने तुम्हें सौंप दिया , परंतु तुम्हारे जैसी उज्जवल आत्मा को और आगे जाना है । ध्यान समाधि के आठवें सोपान तक तुम्हें पहुंचना है और संभवत उससे भी कहीं आगे।

Gautam Buddha Biography in Hindi | गौतम बुद्ध का जीवन परिचय

सिद्धार्थ कहते हैं गुरुदेव अब आप ही मेरा मार्गदर्शन करें कि ध्यान समाधि के आठवें सोपान का ज्ञान मुझे कौन दे सकता है ? गुरु कहते हैं उसके लिए तुम्हें मगज जाना होगा , वहां आदरणीय मुनि उदरकरामापुत्ता तुम्हारे आगे के आध्यात्मिक मार्ग में सहायक बनेंगे।

सिद्धार्थ कहते हैं गुरुदेव यदि मैं अपना मार्ग खोजने में सफल रहा तो आपको आकर अवश्य बताऊंगा। गुरु कहते हैं , मुझे इसकी प्रतीक्षा रहेगी , यदि इस वृद्धा अवस्था ने अवसर दिया तो ! इतना सुन सिद्धार्थ गुरु अलारकलाम के चरण छू वहां से प्रस्थान कर देते हैं।

सिद्धार्थ के जाने के बाद गुरु अलारकलाम उनके पद चिन्हों की धूल को अपने माथे से लगाने लगते हैं। यह देखकर गुरु के अन्य शिष्य उनसे पूछते हैं , गुरुदेव आप ये क्या कर रहे हैं ? गुरु अपने सभी शिष्यों से कहते हैं तुम भी इनके चरणों की धूल अपने माथे से लगा लो कदाचित यह अवसर फिर मिले या ना मिले !

सिद्धार्थ के जाने के बाद राजा शुद्धोधन के सैनिक सिद्धार्थ को ढूंढते हुए गुरु अलारकलाम के आश्रम भी पहुंचते हैं परंतु उन्हें वहां से सिद्धार्थ के बारे में कुछ पता नहीं लगता।

दोस्तो ऐसे ही सिद्धार्थ ऐसे ही बहुत से गुरुओ से आत्मज्ञान प्राप्त करने के लिए मिलते है और उनसे से ज्ञान प्राप्त करते हैं। पर अभी भी सिद्धार्थ को जिस आत्मज्ञान की तलाश थी वह उसे अब तक नहीं प्राप्त हुआ था। सिद्धार्थ अपने आत्मज्ञान की तलाश में 3 साल भटकते रहते हैं।

अब सिद्धार्थ को कपिलवस्तु छोड़े हुए 3 वर्ष से भी अधिक समय हो गया था, परंतु अभी भी उन्हें उनका लक्ष्य नहीं मिला था। इन तीन वर्षों में सिद्धार्थ को जो भी मिला , जिसने जो भी बता दिया सिद्धार्थ ने उसे पूरी लगन और ईमानदारी के साथ किया परंतु सिद्धार्थ को कोई परिणाम हाथ नहीं लगा ।

अब सिद्धार्थ के मन में ये विचार भी आने लगे थे कि कहीं उनकी खोज गलत तो नहीं है ? फिर सिद्धार्थ खुद को समझाते हैं कि यह मन का खेल है , मन ही हमारे भीतर नकारात्मकता और सकारात्मकता पैदा करता है इसलिए मुझे दोनों से ही ऊपर उठना है।

सिद्धार्थ का कठोर तप

समय बीतता है और फिर एक दिन सिद्धार्थ कुछ ऐसे सन्यासियों से मिलते हैं जो एक बहुत ही कठोर तप में लगे होते हैं। सिद्धार्थ उन सन्यासियों से पूछते हैं कि इस शरीर से मुक्त कैसे हुआ जाए। वे सन्यासी कहते हैं इस शरीर को सुखाओ , जलाओ पिघलाओ , इसके सारे अहंकारों पर विजय पाओ

सिद्धार्थ पूछते हैं , क्या यह संभव है ? वे संन्यासी सिद्धार्थ को अपने गुरु की जीवनी बताते हैं । सिद्धार्थ उन सन्यासियों की बात सुन बहुत प्रभावित होते हैं और उनसे कहते हैं मैंने परम सत्य की खोज में अब तक बहुत सारी साधनाएं कीं परंतु वे सभी साधनाएं बहुत सहज थीं।

मैं आपका आभारी हूं कि आपने मुझे यह साधना बताइए । सिद्धार्थ उसी दिन से कठोर तप में लग जाते हैं । उस समय सिद्धार्थ निरंजना नदी के किनारे पर एक गुफा में रहा करते थे। उसी बीच कोण्डन्य भी अपने चार साथी सन्यासियों के साथ सिद्धार्थ को खोजते खोजते उनके पास पहुंच जाते हैं ।

सिद्धार्थ और आचार्य कोण्डन्य की भेंट

सिद्धार्थ से मिलकर कोण्डन्य बहुत प्रसन्न होते हैं और उनसे कहते हैं सिद्धार्थ मैं और मेरे साथी सन्यासी तुम्हारे पास इस आशा में आए हैं कि तुम हमें अपना शिष्य बना लो । सिद्धार्थ कहते हैं , यह नहीं हो सकता । कोण्डन्य पूछते हैं परंतु क्यों सिद्धार्थ ?

सिद्धार्थ कहते हैं मेरे गुरु कह रहे हैं कि मैं उन्हें अपना शिष्य बना लूं । भला गुरु शिष्य कैसे बन सकता है ? कोण्डन्य कहते हैं ज्ञान में तुम हमसे बहुत आगे निकल हैं गए हो सिद्धार्थ और एक ज्ञानी का शिष्य बनना हमारे लिए सौभाग्य की बात होगी।

सिद्धार्थ कहते हैं , मैं आप लोगों को अपना शिष्य तो नहीं बना सकता , परंतु सहयोगी अवश्य बना सकता हूं । सिद्धार्थ कहते हैं , जीवन के इस खेल के पीछे जो अविनाशनीय सत्य है , उसे देखने , उससे एक होने की यात्रा पर मैं निकला परंतु मेरा यह विश्वास टूटने लगा था गुरुदेव , फिर मुझे कुछ तपस्वी मिले जिन्होंने मुझे अपने गुरु की प्रेरणात्मक जीवनी सुनाई , जिसने मुझे एक नई राह दिखाई और अब मैं इस मार्ग पर चल रहा हूं।

कोण्डन्य कहते हैं , हम सभी इस मार्ग पर तुम्हारे साथ हैं सिद्धार्थ। सिद्धार्थ कहते हैं हां , हम सभी लोग इस मार्ग पर एक दूसरे के सहायक बनकर चलेंगे , जिसे उस चेतना की सर्वप्रथम अनुभूति होगी , वह दूसरों का मार्गदर्शन करेगा । सिद्धार्थ के साथ – साथ वे अन्य पांच सन्यासी भी कठोर तप में लग जाते हैं।

अन्य सन्यासी तो बहुत धीरे – धीरे अपने भोजन की मात्रा को कम करते हैं , परंतु सिद्धार्थ बहुत तेजी से अपने भोजन की मात्रा कम करते हैं । सबसे पहले सिद्धार्थ भोजन की मात्रा को आधी करते हैं , फिर आधे में से भी आधी करते हैं और फिर अन्न त्याग ही देते हैं और केवल फलों पर निर्भर रहने लगते हैं

फिर फलों की भी मात्रा कम करने लगते हैं , फिर धीरे – धीरे एक समय ऐसा आता है , जब सिद्धार्थ फलों को भी त्याग देते हैं और केवल पानी पर निर्भर रहते हैं। इस समय तक सिद्धार्थ का सुंदर शरीर कुरूप हो गया था। उनकी चमड़ी उनकी हड्डियों से चिपक गई थी। सिद्धार्थ का इतना कठोर तप देखकर उनके साथी सन्यासी सोचते हैं कि सिद्धार्थ परम सत्य के बहुत करीब हैं क्योंकि अब तक वे पानी भी त्याग चुके थे।

Gautam Buddha Biography in Hindi | गौतम बुद्ध का जीवन परिचय

उनके जितना कठोर तप करना असंभव प्रतीत हो रहा था। वे सभी सन्यासी अभी फलाहार पर ही थे , परंतु सिद्धार्थ अन्न , जल , फल सब कुछ त्याग चुके थे। एक दिन प्रातः सिद्धार्थ जल को स्पर्श करने के लिए लड़खड़ाते हुए नदी की ओर बढ़ते हैं। जैसे – जैसे सिद्धार्थ नदी की ओर बढ़ रहे थे , वैसे वैसे उनके शरीर पर से उनका नियंत्रण खोता जा रहा था।

जब वे नदी के किनारे पर पहुंचते हैं और जल को स्पर्श करने के लिए झुकते हैं तो अचानक चक्कर खाकर जमीन पर गिर पड़ते हैं और बेहोश हो जाते हैं । सिद्धार्थ को जमीन पर बेहोश पड़ा देख एक स्त्री दौड़कर उनके पास आती है। उस स्त्री का नाम सुजाता था वह सिद्धार्थ को तब से जानती थी जब सिद्धार्थ पहली बार निरंजना नदी के किनारे पर उस गुफा में आए थे।

सिद्धार्थ की बंद आंखें खुल जाना

वह स्त्री नदी से पानी लेकर सिद्धार्थ के ऊपर छिड़कती है। पानी की छींटे पड़ने के कारण सिद्धार्थ को थोड़ा होश आता है , वे अपनी आंखें खोलते हैं । वह स्त्री सिद्धार्थ से पूछती है कि, जब आप यहां आए थे तो कितने ओजस्वी थे , क्या खोज रहे हैं जिसके कारण आपकी ये दुर्दशा हो गई है ।

सिद्धार्थ कहते हैं , मैं मुक्ति का मार्ग खोज रहा हूं , मैंने अन्न जल सब त्याग दिया है । वह स्त्री कहती है भला अन्न जल त्याग कर भी कोई खोज पूरी हो सकती है ? जब शरीर ही ना बचेगा तो मुक्ति मिलेगी किसे ? उस स्त्री की बात सुन मानों सिद्धार्थ की बंद आंखें खुल जाती हैं।

उन्हें यह बात समझ आ जाती है कि अब तक वे अपने शरीर को कष्ट देकर गलत कर रहे थे क्योंकि अगर परम सत्य मिलेगा तो शरीर के साथ मिलेगा , शरीर के बिना नही । सिद्धार्थ उसी क्षण जल ग्रहण करते हैं और सुजाता के द्वारा लाई गई खीर भी खाते हैं।

खीर खाने के बाद सिद्धार्थ सुजाता से कहते हैं , तुम्हारी कही बात में बड़ा सत्य था सुजाता मैं कठोर तप के चरम बिंदु तक गया , परंतु वहां मुझे कुछ नहीं मिला। मेरी इस भ्रांति को झुठलाने वाली तुम मेरी प्रथम गुरु हो। जब यह बात सिद्धार्थ के उन पाँच साथी सन्यासियों को पता चलती है कि सिद्धार्थ ने कठोर तपस्याचर्या त्याग दी है तो वे सोचते हैं कि सिद्धार्थ पथभ्रष्ट हो गए हैं ।

पांचों सन्यासी सिद्धार्थ को छोड़कर चले जाना

उन पांचों सन्यासियों में से एक सन्यासी कहता है जिस पर भरोसा करके हम अपने प्राण तक दांव पर लगा चुके थे। वह खुद ही मार्ग से भटक गया। दूसरा सन्यासी कहता है , ऐसा भी तो हो सकता है कि यह मार्ग ही गलत हो। तीसरा सन्यासी कहता है , एक ने प्रण तोड़ा तो मन में बुरे विचार उपजने लगे , कहीं ऐसा ना हो कि यहां रहकर हम सब भी सिद्धार्थ की तरह पथभ्रष्ट हो जाए ।

हमें शीघ्र अति शीघ्र यहां से चले जाना चाहिए । वे सभी सन्यासी कहते हैं , हां , यही सही निर्णय है , हमें जल्दी से जल्दी उस पथभ्रष्ट सिद्धार्थ की संगत छोड़ देनी चाहिए । वे पांचों सन्यासी उसी क्षण सिद्धार्थ के पास जाते हैं और उनसे कहते हैं , हमें जाने की आज्ञा दीजिए सिद्धार्थ, तुम्हारा हमारा साथ यहीं तक का था।

सिद्धार्थ कहते हैं , आप मेरे जीवन के कठिन मोड पर आए और अब जाने के लिए कह रहे हैं। कोण्डन्य कहते हैं , जाने का कारण तुम ही हो सिद्धार्थ ! जिस सिद्धार्थ को हमने अपना गुरु माना था , वह सिद्धार्थ अब कहां है ? तुम तो वो हो जिसने पीड़ा के कारण कठोर तप का मार्ग छोड़ दिया।

सिद्धार्थ कहते हैं मनुष्य कितनी अवस्थाओं से इस एक ही जीवन में परिवर्तित होता है। बाल अवस्था से युवावस्था आती है और युवा अवस्था से प्रौढ़ अवस्था आती है । वे सन्यासी सिद्धार्थ से कहते हैं ये प्रकृति के नियम हैं सिद्धार्थ। सिद्धार्थ कहते हैं तो फिर हम प्रकृति के नियमों से भिन्न कैसे हुए ?

हमारे भीतर और बाहर प्रकृति के नियम हैं। वे सन्यासी कहते हैं , पुरुषार्थ भी तो कुछ है। अपने वचन पर अडिग रहने का मूल्य भी तो कुछ है। तुम्हारा यह पतन देखकर हमें बहुत पीड़ा हो रही है। तुम पथभ्रष्ट हो गए हो सिद्धार्थ। सिद्धार्थ कहते हैं उस पथ का परीक्षण कर उसे व्यर्थ पाया।

वे सन्यासी कहते हैं , सिद्धार्थ ये क्यों नहीं कहते कि उस पथ पर चलने का साहस ही खत्म हो गया था। यदि इस सांसारिक जीवन की ही अभिलाषा थी तो क्यों त्यागा घर द्वार ? क्यों त्यागा अपनी पत्नी और पुत्र को ? तुम तो इस संसार को मुक्ति के मार्ग पर ले जाने के लिए चले थे।

Gautam Buddha Biography in Hindi | गौतम बुद्ध का जीवन परिचय

छः वर्ष की खोज, कठिन तपस्चर्य तुमने सब व्यर्थ कर दिया सिद्धार्थ । अब हम तुम्हारी संगत में और नहीं रहना चाहते इसलिए हम जा रहे हैं। इतना कहकर वे पांचों सन्यासी सिद्धार्थ के पास से चले जाते हैं। उन सन्यासियों के जाने के बाद भी सिद्धार्थ अपनी साधना में पूरी एकाग्रता के साथ लगे रहते हैं।

गौतम बुद्ध को आत्मज्ञान की प्राप्ति

गौतम बुद्ध का जीवन परिचय
गौतम बुद्ध का जीवन परिचय | Gautam Budhha Biography In Hindi

समय बीतता है और सिद्धार्थ उस मंजिल के करीब पहुंच रहे होते हैं जिसका इंतजार सिद्धार्थ को वर्षों से था। एक दिन सिद्धार्थ ध्यान करने के लिए कोई उचित स्थान खोज रहे होते हैं । खोजते खोजते उन्हें बहुत ही विशाल पीपल का वृक्ष नजर आता है। उस वृक्ष को देखकर सिद्धार्थ तय करते हैं कि अब वे उस वृक्ष के नीचे बैठकर ही ध्यान करेंगे।

सिद्धार्थ उस वृक्ष के नीचे बैठकर ध्यान करना शुरू कर देते हैं । उस समय सुजाता उसकी एक सहेली और एक छोटा लड़का सिद्धार्थ के लिए प्रतिदिन भोजन लाया करते थे । एक दिन सिद्धार्थ उन लोगों से कहते हैं कि तुम मेरे लिए इतना कष्ट मत उठाया करो।

सिद्धार्थ की बात सुन सुजाता कहती है इसमें कष्ट कैसा हमें तो आपको भोजन खिलाकर प्रसन्नता होती है, और वैसे भी उस विशाल निरंजना नदी को पार करकर हमारे गांव की तरफ कोई साधु सन्यासी नहीं आता है । केवल आप ही हैं जिनकी सेवा का अवसर हमें मिल रहा है और अगर हम इसे भी गवा देंगे तो हमसे दुर्भाग्यशाली कौन है ?

सिद्धार्थ कहते हैं , ठीक है जैसी आप लोगों की इच्छा। एक दिन प्रातः सुजाता अपनी सहेली और उस छोटे लड़के के साथ सिद्धार्थ को भोजन देने के लिए आते हैं परंतु सिद्धार्थ को ध्यान में बैठा देख सभी लोग उन से कुछ दूरी पर ही चुपचाप बैठ जाते हैं और सिद्धार्थ के आंख खोलने का इंतजार करते हैं।

तभी एक घटना घटती है जिसे देखकर सभी लोगों के रोंगटे खड़े हो जाते हैं । वे देखते हैं कि सिद्धार्थ के शरीर पर एक सर्प चढ़ रहा है और सिद्धार्थ बिना भय के ऐसे बैठे हैं जैसे कि मनुष्य नहीं बल्कि कोई पत्थर हों। सिद्धार्थ के शरीर पर उस सर्प को लिपटा देख सुजाता व उसके साथी सोचते हैं कि ये कोई साधारण सन्यासी नहीं हैं , ये तो कोई बहुत ही पहुंचे हुए सन्यासी हैं।

सिद्धार्थ के पास सर्प का आना कोई संयोग नहीं था। कहा जाता है कि सर्प ही एक ऐसा जीव है जो सबसे पहले इस संभावना को देख लेता है कि व्यक्ति आत्मज्ञान के करीब है। वह सर्प कुछ क्षण बाद सिद्धार्थ के शरीर से उतरकर चला जाता है। सुजाता व उसके साथी भी भोजन को सिद्धार्थ के पास रखकर चले जाते हैं।

सिद्धार्थ का पहली बार मारा से सामना होना (मन की आखिरी कोशिश)

उस दिन सिद्धार्थ का मारा से पहली बार सामना होता है। कहा जाता है कि मारा से सामना होने का अर्थ है कि आप आत्मज्ञान से केवल कुछ कदम दूर हैं। क्योंकि मारा मन की आखिरी कोशिश का नाम है मारा गहरे ध्यान में सिद्धार्थ के सामने प्रकट होता है और उनसे कहता है आंखें खोल सिद्धार्थ ।

सिद्धार्थ पूछते हैं कौन हो तुम ? मारा कहता है लौकिक जगत में मुझे मारा कहते हैं , पर मैं तेरा ही रूप हूँ। सिद्धार्थ कहते हैं, मन जो विनाशी है, उसके आगे मैं उस आलौकिक जगत में जा रहा हूं जो अविनाशी है। मारा कहता है अब तू उस आलौकिक जगत में नहीं जा सकता क्योंकि तेरे तप की सीमा आ गई है।

सिद्धार्थ कहते हैं , तुम मुझे बांध नहीं पाओगे और मैं तुम से मुक्त हो जाऊंगा। मारा कहता है वहां जाने से पहले तुझे मुझ से युद्ध करना होगा। सिद्धार्थ कहते हैं , नहीं , युद्ध से भावनाएं प्रबल होती हैं और फिर वही भावनाएं हमें इस माया चक्र में फंसाती हैं। मैं इसी कर्म चक्र से परे जा रहा हूं।

Gautam Buddha Biography in Hindi | गौतम बुद्ध का जीवन परिचय

मारा कहता है असंभव यह असंभव है। सिद्धार्थ कहते हैं , तुम मुझे नहीं रोक सकते। मारा हंसता है और कहता है कामना, वासना और इच्छा पहले इनका तो सामना कर। मारा के द्वारा इतना कहते ही सिद्धार्थ के पास तीन सुंदर स्त्रियां प्रकट हो जाती हैं और सिद्धार्थ को रिझाने का प्रयास करने लगती हैं।

यहां पर एक बात समझनी जरूरी है कि जिस सुंदरता को हम संसार में देखते हैं, की वो उस सुंदरता के सामने कुछ भी नहीं है जो हम कल्पना कर सकते हैं। तो कहने का अर्थ यह है कि सिद्धार्थ के सामने जो स्त्रियां प्रकट हुई थीं , वे वास्तविक स्त्रियों के मुकाबले बहुत ज्यादा सुंदर थीं।

वे स्त्रियां सिद्धार्थ को उनके पथ से डिगाने के प्रयास में लग जाती हैं परंतु सिद्धार्थ ना तो उनका विरोध करते हैं और ना ही सहयोग करते हैं। कहा जाता है कि वे स्त्रियां अपना हर प्रयास करती हैं जिससे वे सिद्धार्थ को रिझा सकें , कोई सिद्धार्थ के ऊपर फूल बरसाती है , कोई उन्हें सोमरस पिलाने का प्रयास करती है, तो कोई अपने शरीर के सारे वस्त्रों को उतारकर उनके शरीर से लिपटने का प्रयास करती है।

सिद्धार्थ बुद्ध कैसे बने – सिद्धार्थ आत्मज्ञान से केवल एक कदम दूर

यहां पर यह बात समझनी जरूरी है कि यह सारी घटना सिद्धार्थ के मन में घट रही थी । अंत में जब उन स्त्रियों को पता लग जाता है कि उनका कोई भी प्रयास सिद्धार्थ को उनके पथ से नहीं डिगा सकता तो वे स्त्रियां व मारा सभी अप्रकट हो जाते हैं । अब सिद्धार्थ आत्मज्ञान से केवल एक कदम दूर थे , परंतु उन्हें पता नहीं था कि वे आत्मज्ञान के इतने समीप पहुंच चुके हैं।

जब सिद्धार्थ अगले दिन अपनी आंखें खोलते हैं तो उन्हें संसार में सब कुछ बदला – बदला सा नजर आता है। उनके भीतर से यह पुकार उठ रही होती है कि वे अपने लक्ष्य के बहुत करीब हैं , परंतु उन्हें यह समझ नहीं आ रहा होता है कि उनके भीतर की यह पुकार सच्ची है या फिर उनका वहम है।

इतने में ही वहाँ सुजाता अपने साथियों के साथ सिद्धार्थ के लिए खीर लेकर पहुंच जाती है और उनसे कहती है जोगी महाराज आज आप पूरे तीन दिन बाद ध्यान से उठे हैं । बिना भोजन के आप कैसे रह पाते हैं ? लीजिए , मैं आपके लिए खीर लाई हूं ।

सिद्धार्थ उस स्वर्ण पात्र को अपने हाथों में ले लेते हैं जिसमें सुजाता उनके लिए खीर लाई थी। खीर खाने के बाद सिद्धार्थ सुजाता से पूछते हैं , सुजाता क्या मैं इस स्वर्ण पात्र को ले सकता हूं ? सुजाता कहती हैं अवश्य जोगी महाराज परंतु आप इसका करेंगे क्या ? सिद्धार्थ कहते हैं , मैं अपनी एक परीक्षा लेना चाहता हूं।

सुजाता पूछती हैं कैसी परीक्षा जोगी महाराज ? सिद्धार्थ कहते हैं उसके लिए हमें नदी किनारे पर जाना होगा। सिद्धार्थ के साथ सुजाता व उसके दोनों साथी नदी किनारे पर पहुंचते हैं। नदी किनारे पर पहुंचने के बाद सिद्धार्थ कहते हैं , अब मैं इस स्वर्ण पात्र को नदी में डालूंगा , अगर यह पात्र पानी की धारा के उल्टी दिशा में बहा तो मैं समझ जाऊंगा कि मैं परमसत्य के बहुत करीब हूं।

सिद्धार्थ उस पात्र को पानी में डालते हैं । पानी में डालते ही वह पात्र पानी की दिशा में बहने लगता है। सभी लोग सोचते हैं कि यह संभव नहीं है कि पात्र धारा के उल्टी दिशा में बहे परंतु वह पात्र कुछ ही क्षणों बाद पानी की उल्टी दिशा में बहने लगता है। सभी लोग यह देख कर चौंक जाते हैं कि पात्र पानी की धारा के उल्टी दिशा में कैसे बह रहा है।

सिद्धार्थ उस पात्र को उल्टी दिशा में बहता देखकर उसी क्षण संकल्प करते हैं कि चाहे मेरी चमड़ी ही झुलस क्यों ना जाए , चाहे मेरी हड्डियां ही बिखर क्यों ना जाए , चाहे मेरा शरीर चूर – चूर क्यों ना हो जाए। पर अब मैं साधना के आसन से तब तक नहीं उठुँगा जब तक कि मुझे ज्ञान की प्राप्ति ना हो जाए।

सिद्धार्थ उसी समय जाते हैं और ध्यान में बैठ जाते हैं। कई दिन बीत जाते हैं परंतु वे दृढ़ संकल्प के साथ ध्यान में बैठे रहते हैं। फिर गहरे ध्यान में दोबारा से मारा उनके सामने प्रकट होता है। इस बार मारा का रूप बहुत ही विकराल होता है। सिद्धार्थ देखते हैं कि मारा के साथ उसके लाखों सैनिक भी हैं, जिनके हाथों में अजीब अजीब तरह के हथियार हैं।

सिद्धार्थ और मारा के बिच युद्ध

एक अजीब से शोर के साथ मारा सिद्धार्थ की तरफ बढ़ने लगता है। मारा अपने सैनिकों को सिद्धार्थ के ऊपर आक्रमण करने का आदेश देता है। कोई धनुषबाण से आक्रमण करता है। तो कोई अपनी तलवार फेंककर सिद्धार्थ के ऊपर मारता है , कोई अपना भाला फेंककर सिद्धार्थ के ऊपर मारता है परंतु कोई भी हथियार सिद्धार्थ का कुछ नहीं बिगाड़ पाता।

क्योंकि सिद्धार्थ किसी भी हमले को देखकर विचलित नहीं होते। जब हर प्रहार बेकार चला जाता है तब मारा अपना आखिरी दांव चलता है। मारा सिद्धार्थ से कहता है यदि तू ने परमसत्य को पा भी लिया तो तेरा विश्वास करेगा कौन ? सिद्धार्थ मारा के प्रश्न का कोई उत्तर नहीं देते।

मारा कहता है तू बुद्ध के सिंहासन पर बैठ इतना अहंकारी कैसे हो सकता है ? सिद्धार्थ कहते हैं मैं स्वयं इस धरती को अपना साक्षी बनाता हूं। आज यह पृथ्वी साक्षी होगी कि कैसे सिद्धार्थ ने मारा को पराजित किया ! यह पृथ्वी प्रतीक है कि हम दो विपरीत विचारधाराओं के बीच स्थिर हो सकते हैं।

सुख और दुख एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। जब सुख की कामना का अंत होता है तो दुख का भय भी समाप्त हो जाता है। जीवन का उद्देश्य , हर जीव को अपनी चेतना को जगाना है। जो मैंने पा लिया है , सुख – दुख , रात दिन , अच्छा बुरा , मन और माया का खेल है परंतु इसके बीच एक मध्य बिंदु है ।

सिद्धार्थ को आत्मज्ञान की प्राप्ति

वही जीवन का स्रोत है और वह हर मनुष्य की चेतना में है , कहीं बाहर नहीं। ये सारी बातें तो वे थीं जिन्हें शब्दों में बताया जा सकता है परंतु जो सिद्धार्थ ने वास्तव में अनुभव किया था उसे शब्दों में कहना असंभव है। बस इतना ही कहा जा सकता है कि अब सिद्धार्थ बुद्ध हो चुके थे।

अगले दिन जब सुबह होती है , तो केवल सिद्धार्थ के लिए एक नई सुबह नहीं होती बल्कि पूरे जगत के लिए एक नई सुबह होती है। बिना मौसम के ही पेड़ों पर फूल खिलते हैं और पक्षी गीत गाते हैं। जिस वृक्ष के नीचे सिद्धार्थ बैठे थे, वह वृक्ष उनके ऊपर फूलों की वर्षा करता है।

Gautam Buddha Biography in Hindi | गौतम बुद्ध का जीवन परिचय

उस वृक्ष के चारों तरफ कमल के पुष्प खिल जाते हैं । बुद्ध अपनी आंखें खोलते हैं और अपने आसन से खड़े होते हैं और अपने चारों ओर देखते हैं , सब कुछ बदल गया था , ना कोई प्रश्न था , ना कोई उत्तर था। बस हर जगह परमानंद था , एक गहन शांति थी । बुद्ध उस वृक्ष को प्रणाम करते हैं जिसके नीचे बैठकर उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई थी।

दोस्तो असली ज्ञानी वही होता है , जिसे ज्ञान होने का भी अहंकार ना हो। जब सुजाता व उसके साथी सिद्धार्थ को भोजन देने के लिए आते हैं तो वे यह देख कर चौंकते हैं कि ये वो सन्यासी नहीं हैं जिसे वे भोजन देते आ रहे थे। वे देखते हैं कि सिद्धार्थ के चेहरे पर एक अलग सी चमक आ गई है।

उनके शरीर से एक अजीब सा प्रकाश निकल रहा है। वे पूरी तरह से रूपांतरित हो गए हैं। सुजाता व उसके साथी नहीं जानते थे कि सिद्धार्थ अब सिद्धार्थ नहीं हैं बल्कि बुद्ध बन गए हैं। वे डरते डरते बुद्ध के पास जाते हैं , और उनसे पूछते हैं , आप हमारे जोगी ही है ना ?

बुद्ध कहते हैं , हाँ मैं वही हूं , बस सोया हुआ था , परंतु अब जाग गया हूँ। सुजाता कहती है परंतु आपको हो क्या गया है ? जो आपकी आभा इतनी प्रकाशमान हो गई है। बुद्ध कहते हैं जिस खोज में मैं 6 वर्षों से था। वह खोज पूरी हो चुकी है।

जागरूकता का महत्व

सुजाता और उसके साथी कहते हैं , यह तो बहुत अच्छी बात है। क्या आप हमें भी कुछ सिखाने की कृपा करेंगे ? बुद्ध कहते हैं अवश्य। सभी लोग उस पीपल के वृक्ष के नीचे बैठ जाते हैं। सुजाता बुद्ध को खाने के लिए नारंगी देती है।

बुद्ध उस नारंगी को अपने हाथ में पकड़ कुछ क्षण देखते हैं और फिर कहते हैं जब हम नारंगी या कुछ भी खाते हैं तो उसे पूर्ण जागरूकता के साथ नहीं खाते। इसलिए वह खाद्य पदार्थ हमारे लिए असत्य होता है। यदि खाद्य पदार्थ असत्य है तो खाने वाला भी असत्य हुआ क्योंकि जो हम खाते हैं उसी से हमारा निर्माण होता है।

अगर हम इस नारंगी को पूरी जागरूकता के साथ खा पाएं तो हम इस नारंगी के साथ एक हो जाएंगे तो हम इसे जान पाएंगे। अभी हम इससे पूरी तरह से अनजान हैं। सुजाता पूछती है , परंतु ऐसा क्यों होता है कि हम किसी चीज को पूरी जागरूकता के साथ नहीं खा पाते ?

बुद्ध कहते हैं ऐसा इसलिए होता है क्योंकि हमारा मन भविष्य या भूत में खोया रहता है। अगर तुम भविष्य या भूत में ही खोए रहते हो तो इसका अर्थ यह है कि तुम सोए हुए हो । जो व्यक्ति जाग गया है , उसे उसी क्षण में वह सब दिखाई देगा जो एक बेहोश व्यक्ति को कभी नहीं दिख सकता और जागरूकता केवल खाने के समय ही जरूरी नहीं है ।

बल्कि यह हर कार्य को करते समय जरूरी है। दिन के पल को चेतना में जियो जो पीछे चला गया है , उसका ना राग मन में हो और ना ही आने वाले कल के सपनों में खोए रहो और इसी क्षण में पूर्ण जिओ। यदि जीवन ऐसे जी लिया तो भीतर एक समझ जागेगी , अपने विषय में और उसके विषय में जिसे हम खुद से बाहर समझते हैं।

यदि यह समझ किसी इंसान के अंदर जाग गई तो हमारे भीतर प्रेम और करुणा का भाव स्वाभाविक रूप से जाग जाएगा। वर्तमान में जीने की शिक्षा देने के बाद , बुद्ध सुजाता व उसके साथियों से कहते हैं, आप सभी का बहुत बहुत आभार आप लोगों ने मुझे इतना प्रेम दिया है , सत्य के मार्ग पर मेरा सहयोग किया , उसके लिए मैं आपका सदैव आभारी रहूंगा।

परंतु अब मेरे जाने का समय आ गया है क्योंकि जो ज्ञान मुझे मिला है उसे मुझे जन – जन तक पहुंचाना है। बुद्ध के जाने की बात सुन सुजाता व उसके साथियों को थोड़ा बुरा लगता है परंतु बुद्ध के समझाने पर सभी लोग उन्हें प्रसन्नता के साथ विदा करते हैं।

बोधि वृक्ष का इतिहास

यहां पर एक बात आपको जाननी चाहिए कि बुद्ध को बुद्ध नाम और जिस वृक्ष के नीचे बुद्ध ने आत्मज्ञान पाया था , उसे बोधि वृक्ष का नाम उरुविला के लोगों ने ही दिया था। बुद्ध का अर्थ होता है जो पूर्ण रूप से जाग चुका है।

बुद्ध तय करते हैं कि जो ज्ञान उन्होंने पाया है उसे वे सबसे पहले अपने दोनों गुरु उदरकरामा पुत्ता और गुरु अलारकलाम को बताएंगे क्योंकि यही वे व्यक्ति थे जो बुद्ध के ज्ञान को आसानी से समझ सकते थे। बुद्ध सबसे पहले गुरु उदरकरामा पुत्ता के आश्रम की ओर प्रस्थान करते हैं।

मार्ग में उन्हें एक सन्यासी मिलता है , जो उनकी आभा को देख उनसे पूछता है , आपका नाम क्या है मुनिवर ? बुद्ध कहते हैं मेरा नाम सिद्धार्थ गौतम है। वह सन्यासी पूछता है आपके मुख पर इतना तेज कैसे है ? कौन सी साधना की है आपने ? बुद्ध कहते हैं मैंने मुक्ति का मार्ग खोज लिया है ।

गौतम बुद्ध के गुरु का नाम

वह सन्यासी कहता है अच्छा तो आप के गुरु कौन हैं ? बुद्ध कहते हैं वैसे तो मैंने ज्ञान आचार्य कोण्डन्य, आचार्य अलारकलाम और उदरकरामापुत्ता से पाया है। वह सन्यासी कहता है , मैं इन तीनों को जानता हूं , इनमें से आचार्य उदरकरामापुत्ता और गुरु अलारकलाम की मृत्यु हो चुकी है परंतु आचार्य कोण्डन्य अभी भी अपने साथियों के साथ काशी के समीप मृगदाव में हैं।

मेरा प्रश्न यह है कि इनमें से किसने आपको मुक्ति का मार्ग दिखाया ? बुद्ध कहते हैं किसी ने नहीं , इस निर्जन पथ पर मैं अकेला ही चला अपना दीपक स्वयं बना। बुद्ध की बात सुन वह व्यक्ति कहता है , आप असत्य कह रहे हैं , बिना गुरु ज्ञान नहीं मिलता है और आप अपने गुरु से उनका श्रय छीन रहे हैं।

बुद्ध कहते हैं परम सत्य की खोज अकेले ही होती है और उसका अनुभव भी खुद ही किया जाता है । वह सन्यासी कहता है , अरे जाइए जाइए थोड़ा सा मान क्या दे दिया लगे उपदेश सुनाने। बुद्ध कहते हैं धन्यवाद आचार्य कोण्डन्य की दिशा मार्ग बताने के लिए । इतना कहकर बुद्ध आचार्य कोडन्य के आश्रम की ओर चल पड़ते हैं।

Gautam Buddha Biography in Hindi | गौतम बुद्ध का जीवन परिचय

लंबा सफर तय करने के बाद बुद्ध आचार्य कोण्डन्य के आश्रम पहुंचते हैं , जैसे ही बुद्ध आश्रम में प्रवेश करते हैं , तो कोण्डन्य व उनके चार साथी यह देखकर चौंकते हैं कि कोई आभावान व्यक्ति उनकी ओर बढ़ रहा है। उन्होंने आज से पहले कभी कोई इतना तेजस्वी व्यक्ति नहीं देखा था।

परंतु जब बुद्ध उनके समीप पहुंचते हैं तो वे देखते हैं कि यह तेजस्वी व्यक्ति कोई और नहीं बल्कि सिद्धार्थ हैं। वे पाँचो सन्यासी नहीं जानते थे कि सिद्धार्थ अब बुद्ध हो चुके हैं क्योंकि उन पाँचो संन्यासियों को लगता था कि सिद्धार्थ पथभ्रष्ट हैं , इसलिए उन्हें जो दिख रहा होता है वे उसे भी अनदेखा करके बुद्ध का सम्मान नहीं करते और उनसे कहते हैं , सिद्धार्थ अब यहां क्यों आए हो ?

बुद्ध कहते हैं, मैंने मुक्ति का मार्ग खोज लिया है। अब परम आनंद का द्वार खुल चुका है। मैंने उस परमसत्य को पा लिया है जिससे हर सोए हुए व्यक्ति की नींद टूटेगी। कोण्डन्य कहते हैं , जिसने कठोर तप बीच में ही छोड़ दिया हो , उसे मुक्ति का मार्ग कैसे मिल सकता है ? बुद्ध कहते हैं गुरुवर्य अब मैं सिद्धार्थ नहीं हूँ ।

आप मुझे अपनी अलौकिक दृष्टि से देखिए। कोण्डन्य सिद्धार्थ को अपनी आलौकिक दृष्टि से देखते हैं और देखते ही उनके चरणों में गिर पड़ते हैं और कहते हैं, हमें क्षमा करें, हम आप को पहचान ना सके। बुद्ध कहते हैं आपको क्षमा माँगने की कोई जरूरत नही है।

आपका कोई दोष नही है। वे सन्यासी कहते हैं हम अपने अहंकार के कारण आपको पहचान नहीं पाए। बुद्ध कहते हैं उस अंतिम बिंदु पर जब हम परमसत्य के करीब होते हैं तो अहंकार ही हमारे मार्ग की सबसे बड़ी बाधा होती है।

आचार्य कोण्डन्य कहते हैं करुणावश आप उस शिखर से उतरकर हमारे पास आए, इस मार्ग और इसका अनुभव सारी मानवता तक पहुंचाने के लिए। इस कृत्य के लिए मैं आपका जितना आभार व्यक्त करूं, उतना कम है। बुद्ध कहते हैं , कर्मचक्र से मुक्ति का मार्ग , मैं सभी लोगों को दिखाना चाहता हूं इसलिए मुझे पहिए से इंगित किया जाएगा।

आप लोगों को यह जानना चाहिए कि गौतम बुद्ध की शिक्षाओं में पहिए का एक बहुत बड़ा महत्व है । बुद्ध की प्रत्येक शिक्षा उस केंद्र बिंदु पर पहुंचने के बारे में है जो हर मनुष्य के भीतर है । अगर आप पहिए को देखेंगे तो पाएंगे कि पहिए में भी एक केंद्र बिंदु होता है जो स्थिर होता है और अचल होता है।

पहिया तो घूमता है परंतु वह केंद्र बिंदु नहीं घूमता। कहानी में आगे बढ़ते हैं , बुद्ध उन पांचों सन्यासियों से कहते हैं जो ज्ञान मैंने अपने अनुभव से जाना है , मैं उसी की बात करूंगा। इस यात्रा में सर्वप्रथम आप ही मेरे शिष्य बनेंगे। वे पांचों सन्यासी कहते हैं , यह हमारा सौभाग्य होगा।

गौतम बुद्ध का प्रथम उपदेश

बुद्ध कहते हैं अज्ञान ही दुख, भ्रम और चिंता को जन्म देता है। लोभ , क्रोध , भय , ईर्ष्या इसी अज्ञान की संताने हैं। माया का खेल विपरीत का है। अच्छे या बुरे का है, परंतु जो ज्ञानी है वह इस माया में नहीं फँसता क्योंकि वह किसी भी चीज की अति में नहीं पड़ता और ना तो वह अपने आपको तप के नाम पर अत्यधिक पीड़ा देता है और ना ही हर समय वासना में डूबा रहता है।

गौतम बुद्ध का प्रथम उपदेश
गौतम बुद्ध का प्रथम उपदेश – Gautam Buddha Biography in Hindi

वह मध्य मार्ग चुनता है। जब हम माया के खेल को समझ जाते हैं , तब सब दुख , सब चिंताएं , समाप्त हो जाते हैं। तब हमारे भीतर प्रेम और स्वीकृति का भाव पैदा होता है और जिसके बाद हम किसी से घृणा नहीं करते।

यहां तक कि ऐसे व्यक्ति से भी नहीं , जो हम से घृणा करता है। ध्यान में विचार भ्रांति पैदा करते हैं। बुद्धि ने सत्य को विषय और वस्तु में विभाजित कर रखा है। मैं और तुम में बांट दिया है , और इस विभाजन के कारण ही जीवन को समझने में भूल होती है , जिसके कारण मनुष्य भावनाओं में बंधकर खंडित होता गया है और लालच और मोह तृष्णा की पकड़ उस पर बढ़ती गई है ।

जन्म से वृद्धावस्था के चक्र में बीमारी और मृत्यु का भय उसके मन के चारों ओर बनी दीवार को और प्रबल करते गए हैं । इसलिए इस भ्रम को ही दूर करो। एक बार यह भ्रम टूट गया तो जीवन कारावास में नहीं बल्कि स्वतंत्रता में जिया जा सकता है.

गौतम बुद्ध के चार आर्य सत्य कौन कौन से हैं?

एक – जब तक सृष्टि रहेगी दुख मनुष्य के साथ छाया बनकर चलेगा ।

दो- दुख का कारण है , किसी वस्तु को स्वयं से पकड़कर रखना । जीवन के इस सत्य को ना देखना कि जीवन में हर चीज क्षणभंगुर है।

तीन- मुक्ति के लिए विवेक का जगाना आवश्यक है । स्वयं को केंद्रित करना सीखो जो आए चाहे दुख की सूचना या आनन्द की परछांई । इसके बीच स्वयं को स्थिर रखो ।

चार- इस मार्ग पर दुख के बंधन टूटेंगे और परम सत्य की उपलब्धि होगी ।

बौद्ध धर्म के अष्टांगिक मार्ग क्या है?

उन पांचों शिष्यों में से एक शिष्य पूछता है इस मार्ग का नाम क्या होगा ? बुद्ध कहते हैं , इस मार्ग का नाम होगा अष्टांगिक मार्ग । इसके माध्यम से सम्यक दृष्टि , सम्यक विचार , सम्यक वाणी , सम्यक कर्म , सम्यक जीवन व्यापन , सम्यक प्रयास , सम्यक चेतना और सम्यक समाधि संभव होती है।

बुद्ध कहते हैं , मैं बुद्ध हूं। मैं स्वयं धर्म हूं। जो मार्ग मैंने खोजा है , वह समस्त मानव जाति के निर्वाण का मार्ग बनेगा और यह गौतम बुद्ध का पहला उपदेश था , जो उन्होंने सारनाथ में दिया था । जब राजा शुद्धोधन के गुप्तचरों द्वारा यह बात कपिलवस्तु में पहुंचती है कि सिद्धार्थ ने परमसत्य पा लिया है तो पूरा कपिलवस्तु बहुत प्रसन्न होता है.

Gautam Buddha Biography in Hindi | गौतम बुद्ध का जीवन परिचय

सिवाय द्रोणोधन , मंगला और देवदत्त के , क्योंकि उन्हें लगता था कि यदि सिद्धार्थ वापस आ गया तो राजा शुद्धोधन उसे राजा बना देंगे परंतु वे लोग यह नहीं जानते थे कि सिद्धार्थ अब राजा ही हैं ! एक ऐसा राजा जो लोगों के दिलों में बसेगा। सिद्धार्थ ने यशोधरा को यह वचन दिया था कि जब उन्हें उनके प्रश्नों के उत्तर मिल जाएंगे तो वे उनके पास लौटकर अवश्य आएंगे। यशोधरा और उनका पुत्र 6 वर्ष से सिद्धार्थ की प्रतीक्षा कर रहे थे ।

दोस्तो गौतम बुद्ध की जीवनी इतनी छोटी नही है की सिर्फ एक आर्टिकल में ही कवर हो जाए, इसीलिए मैंने इस आर्टिकल में सिर्फ जो जो सबसे महत्वपूर्ण topics जो आपके साथ शेयर करनी बहुत जरूरी है, उनको ही सिर्फ इस “गौतम बुद्ध का जीवन परिचय और उनकी शिक्षाएं” आर्टिकल में कवर किया हुआ है।

दोस्तो अगर आप उनके द्वारा दिए गए सभी उपदेशो को जानना चाहते हैं? तो नीचे कमेंट बॉक्स में कॉमेंट करेंगे जरूर बताएं। हम उसके ऊपर भी एक दिल को छू लेने वाला आर्टिकल लिखेंगे। दोस्तो अब जानते हैं की…

  1. गौतम बुद्ध की मृत्यु कब हुई
  2. गौतम बुद्ध का बौद्ध धर्म से संबंध नहीं है
  3. किसी नारे से बुद्ध का कोई संबंध नहीं है
  4. गौतम बुद्ध ईश्वर विरोधी नहीं थे।
  5. बुद्ध को किसी धर्म से जोड़कर क्यों ना देखे।
  6. क्या गौतम बुद्ध निराशावादी थे?
  7. बौद्ध भिक्षुओं ने मांसाहार क्यूं शुरू किया।
  8. बुद्ध को समझने के लिए आपको बुद्ध होना आवश्यक है।

गौतम बुद्ध की मृत्यु कब हुई | Gautam Buddha Death 

समय बीत रहा था और बुद्ध की आयु लगभग 80 वर्ष हो गई थी। आत्मज्ञान के बाद ऐसा कोई दिन नहीं बीता था जब बुद्ध ने अपने शब्दों या कृत्यों से लोगों को कुछ सिखाया ना हो। एक दिन बुद्ध आनंद से कहते हैं , आनंद मुझे वैशाली गांव जाना है।

आनंद कहता है जैसी आपकी आज्ञा तथागत बुद्ध आनंद के साथ वैशाली के लिए प्रस्थान कर देते हैं। लंबा सफर तय करने के बाद बुद्ध और आनंद वैशाली पहुंचते हैं। वैशाली पहुंचने के बाद बुद्ध आनंद से कहते हैं , वैशाली कितना सुंदर है आनंद ! यहां के मंदिर भी कितने सुंदर हैं।

मैं कुछ देर यहां किसी मंदिर में विश्राम करना चाहता हु, आनंद कहता है अवश्य बुद्ध यहां से कुछ दूरी पर एक मंदिर है। आप वहां विश्राम कर लीजिएगा और मैं भिक्षाटन कर लाऊँगा। आनंद बुद्ध को मंदिर में छोड़ भिक्षाटन करने चला जाता है। भिक्षाटन करते – करते आनंद को अचानक वातावरण में एक अजीब सा सन्नाटा महसूस होता है और धरती कँपने लगती है।

आनंद दौड़कर बुद्ध के पास जाता है और उनसे कहता है बुद्ध आप ठीक तो है ना ? आपको कुछ हुआ तो नहीं ! अचानक पक्षियों का कलरव शांत हो गया और एक अजीब सा सन्नाटा चारों तरफ छा गया और फिर धरती बुरी तरह से कंपित हुई। बुद्ध कहीं यह किसी भयानक प्रलय का संकेत तो नहीं है ? बुद्ध मुस्कुराते हैं और आनंद से कहते हैं , आनंद इधर मेरे पास आकर बैठो।

आनंद बुद्ध के पास जाकर बैठ जाता है। बुद्ध आनंद से कहते हैं , आनंद मैंने एक निर्णय लिया है। आनंद पूछता है कैसा निर्णय बुद्ध ? बुद्ध कहते हैं आज से ठीक तीन माह पश्चात् मैं महापरिनिर्वाण लूँगा। बुद्ध की बात सुनते ही आनंद के पैरों के नीचे से ज़मीन खिसक जाती है?

आनंद रोने लगता है और बुद्ध के चरणों में गिर पड़ता है, और कहता है बुद्ध आप असत्य कह रहे हैं ना ? बुद्ध कहते हैं, आनंद जो जन्मा है , वह अपने बीज के साथ मृत्यु लेकर ही आता है। आनंद मैं बुद्ध हूं पर जिस शरीर में हूं , वह वृद्ध हो चुका है। मैं अपनी यात्रा के अंतिम चरण में हूं।

इन 80 वर्षों में मैंने कई ऋतुओं को कई सूर्यों को कई चंद्रमाओं को खिलते और लुप्त होते देखा है। आनंद मेरा निर्णय समय के अनुकूल  है। इसलिए तुम शोक मत करो , मृत्यु एक सत्य है और अगर सत्य के लिए शोक किया तो जीवन भूल में जिया , आनंद धैर्य धरो अभी तुम्हारे ऊपर बहुत बड़ा उत्तरदायित्व है।

बुद्ध के इन शब्दों को सुन आनंद थोड़ा शांत होता है। बुद्ध आनंद से कहते हैं आनंद जाओ और जाकर सभी भिक्षु और भिक्षुनियों को कुटागार धम्मसभा भवन में एकत्रित करो। मैं अपना अंतिम उपदेश वहीं दूंगा। बुद्ध के अंतिम उपदेश की बात सुन आनंद फिर से रोने लगता है और रोते हुए कहता है, मुझसे नहीं होगा बुद्ध, मैं हार गया हूं।

गौतम बुद्ध का अंतिम उपदेश

बुद्ध कहते हैं, जीवन में सबसे बड़ी हार अपनी संभावनाओं से मुंह मोड़ लेना है। तुम अभी जानते नहीं हो कि तुम क्या सह सकते हो। आनंद कहता है परंतु आप हमें इस पथ पर अकेले छोड़कर चले जाएंगे। बुद्ध कहते हैं आनन्द तुम इस पथ पर तब तक नही चल सकते जब तक कि तुम स्वयं यह पथ नहीं बन जाते।

बुद्ध की आज्ञा मान आनंद संघ के सभी भिक्षु और भिक्षुनियों को एकत्रित करने के लिए निकल पड़ता है। कुछ ही दिनों में आनंद सभी को गुटागार धम्म सभा भवन में एकत्रित कर लेता है। बुद्ध अपना अंतिम उपदेश देने के लिए वहां पहुंचते हैं। बुद्ध उपदेश देना शुरू करते हैं। बुद्ध कहते हैं आज मैं देख पा रहा हूं कि कैसे एक – एक बूंद मिलकर सागर बनता है। परमसत्य की इस संपदा को जन जन तक पहुंचाने के लिए मैं अकेला निकला था परंतु आज मेरे साथ अनेकों लोग जुड़ गए हैं।

तीन सत्य हैं , जिन्हें आपको जन – जन तक पहुंचाना है।

  1. उदार हृदय
  2. दयालु वचन
  3. सेवा में अर्जित जीवन और करुणा

यह तीन ही मंत्र है जो मानवता का नव निर्माण करेंगे । हर प्राणी से करुणा रखना धनी हो या निर्धन सबके जीवन में पीड़ा होती है। किसी के जीवन में कम तो किसी के जीवन में अधिक , मेरे प्रिय भिक्षुओं और भिक्षुनियों मैंने आज तक जो भी आप सब को सिखाया है।

Gautam Buddha Biography in Hindi | गौतम बुद्ध का जीवन परिचय

आप सब उसका ध्यानपूर्वक अध्ययन करना, उसे अनुभव करना सतत अभ्यास करना, स्वयं जांचना परखना उसके बाद ही मानवता में बाँटना। परमसत्य का ज्ञान आने वालीपीढ़ियों तक पहुंचे इसका बीड़ा आज आप सभी ने उठाया है।

किसी भी बात पर सहजता से विश्वास मत करना चाहे वह मेरे ही कहे हुए वचन क्यों ना हो , जब तक वह तुम्हारे विवेक और तुम्हारी व्यावहारिक बुद्धि से मेल ना खाएं। प्रयास करना । मेरे प्रिय भिक्षुओं और भिक्षुनियों हर क्षण मुक्ति के लिए आज से तीन माह पश्चात् मैं महापरिनिर्वाण लूंगा।

बुद्ध कहते ही की यह छोटा सा मिट्टी के घरों से बना गाँव, यह स्थान मेरे महापरिनिर्वाण लेने के लिए एकदम उचित है। आनंद कहता है जैसी आपकी इच्छा बुद्ध। बुद्ध कहते हैं आनंद तुम मेरा एक कार्य करो । आनंद कहता है , कहिए तथागत । बुद्ध कहते हैं कुसागार जाओ और मल्लनरेश को सूचित करो कि उनके वन में मैं और मेरे भिक्षु ठहरे हुए हैं और उनसे कहना कि मैं आज रात्रि ही तीसरे प्रहर में महापरिनिर्वाण लूँगा।

बुद्ध के इस वचन को सुनते ही आनंद और वहां उपस्थित सभी भिक्षु रोने लगते हैं। सभी भिक्षुओं को अंदेशा तो था कि बुद्ध के महापरिनिर्वाण लेने का समय करीब आ रहा है परंतु उन्हे ये नहीं पता था कि बुद्ध आज रात्रि ही महापरिनिर्वाण लेने वाले हैं । बुद्ध आनंद से कहते हैं आनंद जल्दी करो समय बहुत कम है।

आनंद रोते हुए कहता है यदि मेरे जाने के बाद आप हमें छोड़कर चले गए तो ? बुद्ध कहते हैं नहीं आनन्द रात्रि के तीसरे प्रहर से पहले नही। मैं आपको बताना चाहता हूं कि जीवन इसी को कहते हैं। जन्म कैसे हुआ , यह हमें नहीं पता परंतु मृत्यु कैसे और कब होगी इतना हमें पता हो , हमें इस काबिल होने का प्रयास करना चाहिए।

आनंद तुरंत जाता है और मल्लनरेश को सूचित करता है। सूचना पाते ही मल्लनरेश दौड़ा दौड़ा बुद्ध के पास आता है । मल्लनरेश के आने से पहले बुद्ध अपने भिक्षुओं को समझाते हैं कि याद रहे मेरा मार्ग संसार से विमुख होने का मार्ग नहीं है। मुझे उस भाग्य पर विश्वास नहीं है जो मनुष्य के अच्छे या बुरे कृतियों से अछूता है।

मुझे उस भाग्य पर विश्वास है जो मनुष्य तब तक नहीं बना सकता जब तक कि वह स्वयं कर्म ना करे। हमने इस मां समान पृथ्वी को दुखदाई बना दिया है और संपूर्ण संसार दुख और पीड़ा से तड़प रहा है , परंतु यह से संसार दुख और पीड़ा का संग्रह नहीं है।

इस संसार में बुद्ध का निवास हो सकता है , किंतु उसके लिए हमें स्वयं बुद्ध को जगाना होगा और उसका उत्तरदायित्व आप सब पर है। अज्ञान ही दुख , भ्रम और चिंता को जन्म देता है। क्रोध, लोभ, मोह, अभिमान, स्वाभिमान ईर्ष्या इसी अज्ञान की संताने हैं।

माया का खेल विपरीत का है और दो रूपों का है परंतु जीवन और मरण दो नहीं है , एक ही हैं। हमें इस भ्रम को दूर करना है । यदि एक बार यह भ्रम दूर हो गया तो हम अपना पूरा जीवन कारावास में नहीं बल्कि स्वतंत्रता में जी सकते हैं। शील समाधि प्रज्ञा और आर्य अष्टांग मार्ग से इस भ्रम को दूर किया जा सकता है।

जिसकी निद्रा उड़ गई हो उसके लिए रात्रि बहुत लंबी है , जो थक गया है उसके लिए मंजिल बहुत दूर है , जिसने अंधे होकर जीवन जिया और धर्म का मार्ग नहीं समझा , उसके जीवन में अनंत दुख है । उन सभी भिक्षुओं में से एक भिक्षु बुद्ध से पूछता है बुद्ध यदि परमज्ञान के मार्ग में आपसे भेंट हो गई तो ?

बुद्ध कहते हैं यदि परमज्ञान के मार्ग में कोई भी मिले तो उसे गले मत लगाना। यदि मार्ग में मैं भी मिलूँ तो मेरे मोह में भी मत फँसना। कहानी में आगे बढ़ते हैं। शाम हो चुकी थी । मल्लनरेश बुद्ध के पास पहुंच चुका था। मल्लनरेश अकेला नहीं आया था। वह अपनी पत्नी को भी बुद्ध के अंतिम दर्शन कराने के लिए लाया था।

राजा मल्ल बुद्ध से कहता है बुद्ध इस मिट्टी से बने घरों के गांव को आप की उपस्थिति ने पावन कर दिया है। यह हमारा सौभाग्य है कि हम आपके अंतिम दर्शन कर पा रहे हैं । थोडी देर बाद वहां एक और व्यक्ति आता है जो कि बुद्ध से मिलने की इच्छा प्रकट करता है।

आनंद उस व्यक्ति के पास जाता है और उससे कहता है , आपने आने में बहुत देर कर दी है। अब बुद्ध विश्राम की अवस्था में हैं । उन्होंने बोलना बंद कर दिया है और अब तक रात हो चुकी थी। पूर्णिमा का दिन था और चंद्रमा अपने पूरे आकार में आ चुका था।

बुद्ध के शरीर के चारों तरफ एक अजीब सा प्रकाश छाया हुआ था। अब से कुछ समय बाद ही बुद्ध अपना शरीर त्यागने वाले थे परंतु जब बुद्ध को पता चलता है कि उनसे मिलने के लिए ब्राह्मण सुभद्र आया है तो वे अपनी आंखें खोल लेते हैं और आनंद से कहते हैं , सुभद्र को मेरे पास आने दो आनंद बुद्ध के महापरिनिर्वाण लेने के लिए उस जगह का चयन करने के पीछे यही कारण था, वे एक अंतिम भिक्षु को दीक्षा देना चाहते थे।

सुभद्र बुद्ध के पास जाता है और उन्हें प्रणाम करता है और उनसे कहता है प्रभु आपके ज्ञान की ओर मैं हमेशा से आकर्षित हुआ , परंतु आपके दर्शन आज बड़े सौभाग्य से हुए हैं। बुद्ध पूछते हैं , क्या प्रश्न हैं तुम्हारे सुभद्र ?

सुभद्र कहता है, प्रभु मैंने पूर्णकश्यप, महाकाली गौशाला , अजीत केसांबल, संजय वेरथिपुत्र , निगंथानाथ पुत्ता जैसे आध्यात्मिक गुरुओं के बारे में सुना है। पर आपके विचार से क्या इनमें से किसी ने संबोधि प्राप्त कर ली है ?

बुद्ध कहते हैं इन्हें संबोधि मिली या नहीं यह जानना अब आवश्यक नहीं है सुभद्र। मूल्यवान बात यह है कि मैं तुम्हें सद्धर्म का वह मार्ग दिखा सकता हूं जिसपर चलकर तुम्हें संबोधित प्राप्त हो सकती है। व्यक्ति का दिमाग ऐसे ही काम करता है, जब वह हीरे जवाहरात पा सकता है, तब भी वह कंकड़ पत्थर चुगने में ही लगा रहता है।

बुद्ध करुणावश सुभद्र को उत्तर देने के लिए वापस इस संसार में लौटे । उन्होंने लगभग लगभग अपने शरीर को त्यागने की तैयारी कर ही ली थी परंतु अपनी करुणा के चलते उन्हें वापस आना पड़ा। बुद्ध सुभद्र से कहते हैं नश्वर में अविनाश को देखना , दुख में सुख को देखना, अव्यक्ति में व्यक्ति को देखना, घृणा में सौंदर्य को देखना यदि इस तरह से जिओगे तो जीवन में एक स्थिरता पाओगे।

अज्ञान मनुष्य को आहत कर विक्षिप्त कर देता है। जब हम माया के द्वेत रूप को सही तरह से पहचान लेते हैं तो हमारे सारे दुख , सारी चिंताएं समाप्त हो जाती हैं और हमारे अंदर प्रेम और स्वीकृति का भाव जागृत होता है, जो मूल में एक ही भाव है। यदि तुम बुद्ध नहीं हो तो तुम्हें बुद्ध में कोई रुचि भी नहीं होगी और यदि तुम्हें बुद्ध में रुचि है तो तुम स्वयं बुद्ध हो।

सुभद्र बुद्ध से पूछता है , प्रभु क्या आप मुझे अपना भिक्षु बनाएंगे ? बुद्ध कहते हैं , अवश्य। बुद्ध अपने भिक्षु अनिरुद्ध से कहते हैं, अनिरुद्ध सुभद्र को दीक्षा के लिए तैयार किया जाए। अभी इसी समय सुभद्र को दीक्षा दी जाएगी और ये मेरे अंतिम भिक्षु होंगे।

सुभद्र को दीक्षा के लिए तैयार किया जाता है और बुद्ध स्वयं सुभद्र को दीक्षा देते हैं । सुभद्र को दीक्षा देने के बाद बुद्ध अपने सभी भिक्षुओं से कहते हैं , मेरे प्रिय भिक्षुओं यदि धर्म के मेरे मार्ग में कोई भी संदेह या कोई भी जटिलता है , तो यही सही समय है पूछने का और इस अवसर को ना गवाएं जो भी प्रश्न आप में से किसी के मन में है तो इसी समय मुझसे पूछ लो।

बाद में आपको ऐसा ना लगे कि मैं बुद्ध के समक्ष था , परंतु उनसे पूछ ना सका। बुद्ध तीन बार अपने वचन को दोहराते हैं परंतु कोई भी भिक्षु या भिक्षुनी कोई प्रश्न नहीं पूछता। फिर बुद्ध अपने अंतिम शब्द कहते हैं कि मेरे प्रिय भिक्षुओं और भिक्षुनियों यह मेरी अंतिम दीक्षा है।

गौतम बुद्ध महापरिनिर्वाण

अपो दीपो भवः अपना दीपक स्वयं बनो ! जागो और धर्म के पथ पर चलो। अपने अंतर के संघ को साधो स्वयं अपनी शरण में जाओ। जो है सब अस्थिर है और उसके बीच में स्वयं को स्थिर रखना। परिश्रम के साथ निरंतर प्रयास करना कभी हार ना मानना । इतना कह बुद्ध अपनी आंखें बंद कर लेते हैं और चारों तरफ एक सन्नाटा छा जाता है।

बुद्ध के शरीर से एक अजीब सी रौशनी बहने लगती है, जो अपने तेज से पूरे वन को प्रकाशित कर रही होती है। रात्रि का तीसरा प्रहर था और बुद्ध के सभी भिक्षु उनके समक्ष हाथ जोड़कर बैठे हुए थे। सभी की आंखों से आंसुओं की धारा बह रही थी और तभी आनंद यह घोषणा करता है कि बुद्ध महापरिनिर्वाण ले चुके हैं।

आनंद के इन शब्दों को सुन वहां उपस्थित सभी लोग जोर जोर से रोने लगते हैं परंतु जब लोग बुद्ध की शिक्षाओं को स्मरण करते हैं तो उन्हें हिम्मत मिलती और वे शांत होते हैं। बुद्ध के शरीर त्यागने के बाद उनके सभी भिक्षु उनके अंतिम संस्कार की तैयारियों में लग जाते हैं।

गौतम बुद्ध का अंतिम संस्कार 

बुद्ध को अंतिम संस्कार के लिए कुशीनारा ले जाया जाता है और वहाँ एक नदी के किनारे बुद्ध का अंतिम संस्कार किया जाता है । बुद्ध को मुखाग्नि , आनंद और महाकाश्यप देते हैं। बुद्ध के अंतिम संस्कार के बाद उनकी अस्थियों को कौन ले जाएगा ? इस बात पर विवाद छिड़ जाता है बुद्ध के अंतिम संस्कार में उस समय के आठ शक्तिशाली राजा शामिल होते हैं।

हर राजा बुद्ध की अस्थियों पर अपना अधिकार बताता है और बात इतनी बढ़ जाती है कि युद्ध तक होने की संभावना पैदा होने लगती है। फिर वहां द्रोण नाम का एक समझदार व्यक्ति आता है जिसके बारे में बुद्ध पहले ही आनंद को बता चुके थे। उन्होंने आनंद को बताया था कि जब समस्या बढ़ेगी तो ब्राह्मण द्रोण उसका समाधान निकालेंगे।

द्रोण की हमेशा से बुद्ध का भिक्षु बनने की इच्छा थी परंतु किन्ही कारणों से वह बुद्ध का भिक्षु ना बन सका , परंतु अपने अंतर्मन से वह बुद्ध का भिक्षु ही था। द्रोण सभी आठ राजाओं से कहता है आप बुद्ध की अस्थियों को आठ जगह बांट लें और उनकी याद में एक महान स्तूप नहीं बल्कि आठ महान स्तूप बनवाएं।

सभी राजा बुद्ध की याद में एक महान स्तूप बनवाना चाहते थे। सभी राजाओं को ब्राह्मण द्रोण की बात उचित लगती है और वे ऐसा ही करते हैं। देखिए सवाल यह नहीं है कि जिस तरह से गौतम बुद्ध की जीवनी को प्रस्तुत किया गया है , क्या सारी घटनाएं बिल्कुल इसी तरह से घटी थीं ? नहीं !

सवाल यह है कि क्या हमने गौतम बुद्ध की जीवनी से कुछ ऐसा सीखा जो हमारे जीवन को पूरी तरह से रूपांतरित कर सकता है ? गौतम बुद्ध को तरह – तरह के लोगों ने तरह तरह की विचारधारा में बांध दिया है।

मैं गौतम बुद्ध की जीवनी के द्वारा आपको यह बताना चाहता हूं कि गौतम बुद्ध को ना तो किसी विचारधारा में बांधा जा सकता है और ना ही किसी के पक्ष और विपक्ष में खड़ा किया जा सकता है। अगर कोई ऐसा करता है तो इसका अर्थ यह है कि उसने बुद्ध को एक प्रतिशत भी नही समझा है।

गौतम बुद्ध की जीवनी को लिखने के पीछे मेरा उद्देश्य बस यही था कि मैं बुद्ध की उन शिक्षाओं को आप तक पहुंचा सकूं जो आपके लिए जाननी जरूरी हैं , जो आपको आपके लक्ष्य की ओर बढ़ने के लिए प्रेरित करें और मुझे लगता है कि मैं अपने प्रयास में सफल रहा।

बुद्ध का संबंध बौद्ध धर्म से नहीं है।

मैंने बहुत सारे लोगों को कहते सुना है। मैं सिख हूं , लेकिन मुझे बौद्ध धर्म बहुत पसंद है। मैं मुस्लिम हूं, लेकिन मुझे बौद्ध धर्म बहुत पसंद है। मैं हिंदू हूं , लेकिन मुझे बौद्ध धर्म बहुत पसंद है। जो लोग ऐसा कहते हैं । मैंने उनसे पूछा कि आपको बौद्ध धर्म क्यों पसंद है ?

तो उन लोगों ने मुझे उत्तर दिया क्योंकि यह बुद्ध का धर्म है। मुझे सुनकर बहुत आश्चर्य हुआ कि जो लोग बुद्ध से प्रभावित हैं , उनकी शिक्षाओं से प्रभावित हैं। वे लोग इतना भी नहीं जानते कि बुद्ध का किसी जाति धर्म से कोई संबंध नहीं है और जब बुद्ध का किसी जाति धर्म से कोई संबंध है ही नहीं तो उनका कोई धर्म कैसे हो सकता है?

जो व्यक्ति सभी जाति धर्म से ऊपर उठ गया हो , बुद्ध हो गया हो , वह भला खुद किसी धर्म में कैसे बंध सकता है ? यह मैं नहीं कह रहा हूं। मैं यह बुद्ध ने खुद कहा है कि उनका संबंध किसी भी जाति धर्म से नहीं है और उनका संबंध केवल मनुष्यता से है।

सिद्धार्थ का जन्म एक हिंदू परिवार में हुआ था और उस समय वर्ण व्यवस्था चलती थी । सभी लोगों को चार वर्णों में बांटा हुआ था।

  1. ब्राह्मण
  2. क्षत्रिय
  3. वैश्य
  4. शूद्र

सिद्धार्थ हिंदू थे , परंतु उन्होंने कभी भी किसी कर्मकांड को नहीं स्वीकारा उन्होंने हमेशा मनुष्यता को ऊपर रखा। उन्होंने अपने पूरे जीवन में कभी नहीं कहा कि किसी धर्म को अपनाओ या छोड़ो क्योंकि धर्म बाधा है ही नहीं। बाधा तो हमारी सोच है जो हमें बांधती है।

मैंने देखा है बहुत सारे लोग अफसोस करते हैं कि काश मेरा जन्म भी बौद्ध धर्म में हुआ होता तो कितना अच्छा होता। जो लोग ऐसा सोचते हैं , मैं उन लोगों से कहना चाहता हूं कि आपने बुद्ध की शिक्षाओं को एक प्रतिशत भी नहीं समझा है।

अगर आप समझ पाते तो अफसोस करने की बजाय आप इस बात के लिए खुश होते कि आपने इस पृथ्वी पर एक मनुष्य के रूप में जन्म लिया है। बुद्ध ने कहा है हर मनुष्य के भीतर बुद्ध होने की संभावना है। क्या आपको यह बात छोटी लगती है।

क्या यह एक छोटा सा वाक्य आपके जीवन को रूपांतरित करने के लिए काफी नहीं है ? अगर यह वाक्य आपके जीवन को रूपांतरित नहीं कर सकता तो इस जीवन में कुछ भी आपके जीवन को रूपांतरित नहीं कर सकता। परंतु मनुष्य का दिमाग इस तरह से सोचता ही नहीं है।

वह तो उन बातों को पकड़ता है जिनका जीवन से कोई संबंध ही नहीं है। वह ध्यान को नहीं पकड़ेगा और वह जाति, धर्म, विचारधारा और सोच को पकड़ेगा। इन सभी बातों को कहने के पीछे मेरा उद्देश्य बस यही है कि आप बुद्ध को किसी जाति , धर्म से जोड़कर ना देखें। चाहे वह बौद्ध धर्म ही क्यों ना हो क्योंकि बौद्ध धर्म का विकास बुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद हुआ था।

उससे पहले बुद्ध ने कभी भी बौद्ध धर्म का जिक्र नहीं किया क्योंकि बुद्ध का उद्देश्य लोगों को किसी धर्म में बांधना नहीं था बल्कि सभी जाति धर्म से मुक्त करना था और उन्हें उनकी वास्तविता से मिलवाना था।

अगर बुद्धिज्म कोई धर्म है तो बुद्ध का इससे कोई संबंध नहीं है क्योंकि बुद्ध सभी जाति धर्मों से परे हैं ।

किसी नारे से बुद्ध का कोई संबंध नहीं , बुद्ध की छवि का गलत प्रदर्शन !

मैंने देखा है बहुत सारे लोग ऐसा बोलते और मानते हैं की जय भीम ! में भीमराव अंबेडकर का सम्मान करता हूं। हर भारतीयों को उनका सम्मान करना चाहिए । लेकिन मैं आपको बताना चाहता हूं कि ऐसा नहीं है कि आप जय भीम लिखेंगे या बोलेंगे तभी आप बुद्ध की शिक्षाओं को ज्यादा अच्छे से ग्रहण कर पाएंगे।

बुद्ध को समझने के लिए जय भीम बोलना अनिवार्य नहीं है और ना ही किसी और की जय जयकार लगाना अनिवार्य है। बुद्ध को समझने के लिए तो ध्यान है , जागरूकता अनिवार्य है। जो व्यक्ति ध्यान नहीं करता या अपने जीवन के लिए जागरुक नहीं है । वह चाहे कितनी भी बुद्ध की जय जयकार लगाए या किसी और की जय जयकार लगाए, वह बुद्ध को नहीं समझ सकता है।

बुद्ध इतने सामानतावादी थे कि जिस पर अन्याय हो रहा था , उसके लिए भी करुणावान थे और उसके लिए भी जो अन्याय कर रहा था क्योंकि उनका मानना था कि जो अन्याय कर रहा है , वह भी अज्ञानतावश ही कर रहा है यदि अन्याय करने वाले को भी सद्बुद्धि मिले तो वह भी अन्याय करना छोड़ देगा।

बुद्ध के भिक्षुओं में सभी वर्गों के लोग शामिल थे। जिन्होंने उन्हें हृदय से समझा सिर्फ उन्होंने आत्मिक उन्नति करी और जिन्होंने उन्हें नहीं समझा है उन्होंने उनके बारे में भ्रांतियां फैलाईं , गलत जानकारियाँ फैलाईं , जिसके कारण बुद्ध की छवि बहुत सारे लोगों की नजरों में गलत बन गई।

इस पुस्तक को लिखने के पीछे मेरा उद्देश्य यही है कि मैं उस गलत छवि को लोगों की नजरों से मिटा सकुं। बुद्ध एक ऐसी निधि हैं जिनका ज्ञान आपके भीतर के अंधकार को मिटा सकता है पर सवाल यह है कि क्या आप तक वह सही ज्ञान पहुंच रहा है ?

दोस्तो इस दुनिया में ऐसे बहुत सारे लोग हैं जो बुद्ध के नाम को अपने मतलब के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं , जिन्होंने ना तो कभी खुद बुद्ध को सही से समझा और ना ही लोगों को समझा पा रहे हैं, तो आप ऐसे लोगों से दूर रहिए जो चमत्कारों की बात करते हैं या जिनके मन में किसी दूसरे के लिए ईर्ष्या है, जो किसी से बदला लेना चाहते हैं।

क्योंकि ऐसा नहीं था कि लोगों ने कभी बुद्ध के साथ कुछ गलत नहीं किया। लोगों ने तो अज्ञानतावश बुद्ध के प्राण तक लेने का प्रयास किया , परंतु बुद्ध ने कभी भी उनसे बदला लेना नहीं चाहा। मैंने तो ऐसे ऐसे लोग देखे हैं जिन्होंने गेरुआ वस्त्र धारण किए हुए हैं और वे किसी विशेष समूह के लोगों से बदला लेने की बात कर रहे हैं और उन्हें दंड देने की बात कर रहे हैं।

मैं ऐसे लोगों से कहना चाहता हूं कि अगर आपके साथ कुछ गलत हुआ है और आप उसका बदला लेना चाहते हैं तो बेझिझक लीजिए। इसमें कुछ गलत नहीं है परंतु इस बदले की आग में बुद्ध की सुंदर छवि को मत जलाईए। अपने आप को बुद्ध का भिक्षु मत बताइए।

क्योंकि बदला लेना बुद्ध का कभी भी स्वभाव नहीं था और उनका स्वभाव तो क्षमा करना था , प्रेम करना था। मैं आपसे कहना चाहता हूं कि उन बातों पर विश्वास मत करिए जो लोग आपसे कहते हैं , जो आपके अंतर्मन को सही नहीं लगतीं बल्कि उन बातों पर विश्वास कीजिए जो बुद्ध ने कही हैं , जो आपके अंतर्मन को सही लगती हैं , “

और यह केवल मैं ही नहीं , स्वयं बुद्ध ने भी कहा है कि तब तक किसी बात पर विश्वास मत करना जब तक कि वह तुम्हारे विवेक की कसौटी पर खरी ना उतरे । जब तक वह तुम्हारे खुद का अनुभव ना बन जाए। इस पाठ में मैंने जो भी बातें कहीं , अगर उन्हें सरल शब्दों में समझाया जाए तो मैं बस इतना कहना चाहता हूं कि आप किसी की भी जय जयकार लगाने के लिए स्वतंत्र हैं ।

मगर आप बुद्ध को किसी भी विशेष समुदाय में बांधने के लिए स्वतंत्र नहीं है , क्योंकि बुद्ध ने कभी भी किसी जाति , समुदाय या वर्ण के पक्ष में या विपक्ष में कुछ नहीं कहा । उन्होंने जो भी कहा , वह मनुष्यता के पक्ष में था । अगर आप किसी से बदला लेना चाहते हैं और आप एक भिक्षु हैं तो आप बदला लेने के लिए स्वतंत्र हैं। मगर उस बदले की आग में बुद्ध की सुंदर छवि को जलाने के लिए स्वतंत्र नहीं है।

बुद्ध की शिक्षाएं क्रोध नहीं सिखाती , प्रेम सिखाती हैं। जो लोग बुद्ध की छवि को खराब करने का प्रयास कर रहे हैं उनसे मैं इतना ही कहना चाहूंगा कि इस तरह से उनकी छवि को खराब कर आप उनके द्वारा किए गए महान कृत्यों को अपमानित कर रहे हैं।

अगर आपने बुद्ध को थोड़ा भी समझा है तो कृपाकर ऐसा पाप ना करें । यह बात मैं पहले भी कह चुका हूं और अब फिर कह रहा हूं कि आप बुद्ध को तब तक नहीं समझ सकते जब तक कि आप खुदको समझना शुरू नहीं कर देते।

गौतम बुद्ध ईश्वर विरोधी नहीं थे।

आपको यह सुनने में थोड़ा अजीब लग सकता है , अटपटा लग सकता है परंतु यह सच है कि बुद्ध ईश्वर विरोधी नहीं थे। हां , यह बात सच है कि बुद्ध उस ईश्वर के पक्ष में नहीं थे , जिसे ज्यादातर लोग ईश्वर समझते हैं।

आपका ईश्वर ऐसा है जो आपको डराता है जो आपको गलती करने पर दंड देता है जो कभी – कभी आपके लालच में भी फंस जाता है , परंतु बुद्ध ऐसे ईश्वर के पक्ष में थे जो ना तो आपको कमजोर बनाता है, ना दंड देता है और ना ही आपके लालच में फंसता है।

अब आप पूछ सकते हैं कि इस बात का क्या सबूत है कि बुद्ध ईश्वर के पक्ष में थे ? इस प्रश्न का उत्तर , बुद्ध के जीवन की इस घटना से समझिए। एक बार बुद्ध के पास एक व्यक्ति आता है और उनसे पूछता है , बुद्ध क्या ईश्वर है ? बुद्ध उस व्यक्ति से पूछते हैं , तुम्हें क्या लगता है ?

वह व्यक्ति कहता है, मुझे लगता है कि ईश्वर नहीं है बुद्ध कहते हैं , ईश्वर है। तभी वहां एक और व्यक्ति आता है और और बुद्ध से पूछता है , बुद्ध क्या ईश्वर है ? बुद्ध उस व्यक्ति से पूछते हैं , तुम्हें क्या लगता है ? वह व्यक्ति कहता है मुझे लगता है कि ईश्वर है ।

बुद्ध कहते हैं नहीं है। अब आप सोच रहे होंगे कि बुद्ध ने दोनों लोगों को अलग – अलग उत्तर क्यों दिया। इसका उत्तर है कि ईश्वर एक ऐसी बात है जिसे शब्दों में नहीं समझाया जा सकता। केवल अनुभव किया जा सकता है।

बुद्ध के उत्तर ने उन दोनों ही लोगों के भीतर जिज्ञासा जगाई और जिज्ञासा ही वह रास्ता है जिस पर चलकर हम सत्य तक पहुंच सकते हैं। या यूँ कहें कि ईश्वर तक पहुँच सकते हैं । ईश्वर को मानने वाले लोग भाग्य को भी मानते हैं।

वे मानते हैं कि हमारा भाग्य पहले से लिखा हुआ है और ईश्वर के द्वारा लिखा गया है , तो जो होना है वह तो होकर ही रहेगा। उसे कोई नहीं बदल सकता। इस तरह के लोग ऐसी सोच के कारण कर्म करने से मुंह मोड़ लेते हैं।

परंतु बुद्ध कहते हैं , मैं उस भाग्य को नहीं मानता जो मनुष्य के अच्छे या बुरे कर्मों से अछूता है। बुद्ध कहते हैं , मैं उस भाग्य को मानता हूं जो मनुष्य के कर्मों के द्वारा बनता है। आपके लिए यह जानना जरूरी नहीं है कि ईश्वर है या नहीं , आपके लिए सही कर्म करना जरूरी है इसलिए बुद्ध ने ईश्वर के बारे में बात नहीं करी।

मनुष्य की सोचने की शक्ति बहुत सीमित है । उसने ईश्वर को बहुत छोटा बना दिया है , जिसके कारण या तो वह ईश्वर को मानता है या उसे नकारता है । ये दोनों ही अतियाँ हैं । ईश्वर को मानना भी और उसे नकारना भी । बुद्ध ईश्वर की बात इसलिए नहीं करते क्योंकि यह प्रश्न जरूरी ही नहीं है ।

अब आपके मन में यह प्रश्न उठ रहा होगा कि वह ईश्वर कौन है जिसके पक्ष में बुद्ध भी थे , तो मैं आपको बताना चाहता हूं कि इस प्रश्न का कोई भी सीधा उत्तर नहीं है , परंतु मैं आपको समझाने का प्रयास अवश्य करूंगा और मैं शुरुआत कुछ प्रश्नों से करूंगा।

यह पृथ्वी हवा में झूल रही है और घूम रही है, जिसके कारण हमारे जीवन में दिन और रात घट रहे हैं , समय पर सूर्य उगता है और समय पर अस्त होता है। हमारी सांसे लगातार चल रही हैं , चाहें हम जागरूक हैं या नहीं । जो भी भोजन हम खाते हैं , वह अपने आप पच जाता है । आसमान में जो हम तारे देखते हैं , वो टूट कर किसी के सिर पर नहीं गिरते ।

ऐसी लाखों – करोड़ों चीजें हैं , जो इस समय घट रही हैं जिनके बारे में हम कुछ नहीं जानते परंतु हम यह जरूर जानते हैं कि ईश्वर नहीं है क्योंकि यह हमारा विश्वास है और हम अपने विश्वास को टूटने नहीं दे सकते । मैं आपसे पूछना चाहता हूं कि इस ब्रह्मांड में जो कुछ भी घट रहा है क्या उसमें आपका कोई हाथ है ?

क्या आप उस व्यक्ति को जानते हैं जिसने इस पूरे ब्रह्मांड को संभाला हुआ है ? नहीं ना तो फिर आप किसी निष्कर्ष पर कैसे पहुंच सकते हैं ? बुद्ध ने ईश्वर शब्द पर कुछ ना कहना उचित समझा क्योंकि इस शब्द की हर व्यक्ति के भीतर अलग – अलग परिभाषाएं हैं और ईश्वर कोई ऐसी बात नहीं है जिसे किसी परिभाषा में व्यक्त किया जा सके ।

इस पाठ का यह उद्देश्य नहीं है कि आप ईश्वर को मानने लगे, बल्कि इस पाठ का यह उद्देश्य है कि आप इस बात को स्वीकार लें कि कुछ तो ऐसा है जिसमें हर व्यक्ति समा जाता है।

चाहे वह साधारण व्यक्ति हो या बुद्ध ! कुछ तो ऐसा है जो हमारा स्रोत है , जहां से हम सब आए हैं। हमें उस स्रोत से कुछ मांगना नहीं है बल्कि उसके लिए कृतज्ञता से भर जाना है । यही इस पाठ का उद्देश्य है।

बुद्ध को किसी धर्म से जोड़कर क्यों ना देखें ?

मुझसे बहुत सारे लोग पूछते हैं , क्या आप बुद्धिस्ट हैं ? मैं उनसे पूछता हूं , बुद्धिस्ट होने का क्या अर्थ है ? वे कहते हैं , बुद्धिस्ट वो लोग होते हैं जिन्होंने बुद्ध का धर्म अपनाया हुआ है। मैं उनसे कहता हूं , परंतु बुद्धिज्म तो बुद्ध का धर्म है ही नहीं ।

वे लोग क्रोधित हो जाते हैं और पूछते हैं फिर बुद्ध का धर्म क्या है ? मैं कहता हूं मनुष्यता !

ऐसा क्यों होता है कि हम किसी ज्ञान को किसी विचारधारा में बांधकर देखना चाहते हैं , उसे सीमित करके देखना चाहते हैं। क्यों हम उसे उसकी असीमितता में नहीं स्वीकार पाते ?

हिंदू कहता है , हिंदू धर्म सर्वश्रेष्ठ है। मुसलमान कहता है मुस्लिम धर्म सबसे बड़ा है। सिख कहता है , सिख धर्म सबसे अच्छा है और ईसाई कहता है , उनका धर्म सबसे अच्छा है , परंतु ये कोई नहीं कहता कि मनुष्यता सर्वश्रेष्ठ है।

एक व्यक्ति ने प्रयास किया भी यह कहने का कि मनुष्यता सर्वश्रेष्ठ है , परंतु हमने उसे भी नहीं छोड़ा उसे भी धर्म में बांधकर सीमित कर दिया। अब बुद्ध को लोग उनकी शिक्षाओं की वजह से नहीं बल्कि उनके धर्म की वजह से जानते हैं।

अगर आप किसी से बुद्ध का कोई सूत्र पूछें तो वह नहीं बता पाएगा । मगर अगर किसी से बुद्ध का धर्म पूछें तो वह तुरंत बता देगा । बुद्ध को किसी भी धर्म में बाँधना इसलिए उचित नहीं है क्योंकि उन्होंने कभी भी किसी धर्म की बात नहीं करी बल्कि उन्होंने मनुष्यता की बात करी।

आज ना जाने कितने लोग बुद्ध की शिक्षाओं से अनजान हैं क्योंकि कुछ लोगों ने बुद्ध को एक धर्म में सीमित कर कर रख दिया है । अगर कोई व्यक्ति बुद्ध के बारे में सुनता है और उनके बारे में जानने का प्रयास करता है तो उसका यह विचार उसे ऐसा करने से रोक लेता है कि बुद्ध तो दूसरे धर्म के हैं , मुझे उनके बारे में नहीं जानना चाहिए।

मैं चाहता हूं कि बुद्ध के नाम पर किसी भी धर्म की मोहर ना लगे और ना ही यह भ्रम फैलाया जाए कि बुद्ध को समझने के लिए बुद्धिस्ट होना आवश्यक है । मुझे लगता है कि अगर कोई व्यक्ति बुद्ध को समझना चाहता है तो उसका मनुष्य होना काफी है ।

क्या बुद्ध निराशावादी थे ?

एक बार एक व्यक्ति बुद्ध के पास आता है और कहता है , बुद्ध आप कहते हैं कि यह जीवन दुख से भरा है। इस संसार में हर जगह दुख ही दुख है। क्या आपको नहीं लगता कि आपके ये शब्द लोगों को निराशावाद की तरफ ले जाते हैं ?

बुद्ध मुस्कुराकर उस व्यक्ति से कहते हैं , यह सत्य है कि मैंने कहा है कि यह जीवन दुख से भरा है , परंतु अगली ही पंक्ति में मैंने यह भी कहा है कि इस दुख से मुक्ति का मार्ग है । इस मार्ग के बारे में बताने के लिए मुझे दुख की बात पहले करनी पड़ी।

जो लोग बुद्ध को निराशावादी कहते थे या कहते हैं। उनकी एक आदत है कि वे किसी भी बात को पूरी तरह से नहीं समझना चाहते। वे बहुत जल्दी किसी निष्कर्ष पर पहुंच जाना चाहते हैं।

जब आप बुद्ध को सुनते हैं तो यह संभव है कि आपको उनकी बहुत सारी बातें समझ ना आएँ क्योंकि आप उन्हें एक नजरिए के साथ समझने का प्रयास करते हैं । अगर आप वास्तव में बुद्ध को समझना चाहते हैं तो आपको अपने नजरिए को हटाना होगा ।

अब प्रश्न उठता है कि अपने नजरिए को कैसे हटाए ? इस प्रश्न का उत्तर है , खुद से सही प्रश्न पूछकर ! आइए खुद से एक सही प्रश्न पूछते हैं क्या निराशा , दुख और चिंता बुरी हैं ? आप में से बहुत सारे लोग कहेंगे हां , परंतु मैं कहता हूं नहीं! ये बुरी नहीं है क्योंकि ये आपके विकास का कारण बनती हैं।

उदाहरण से समझिए यदि दुख , चिंता और निराशा सिद्धार्थ के जीवन में नहीं होती तो वे बुद्ध नही बन पाते और मैं यह आर्टिकल नहीं लिख रहा होता। हां , यह सच है कि निराशा , दुख व चिंता आपके विनाश और विकास दोनों का कारण बन सकती हैं , परंतु बिना इनके ना तो विकास संभव है और ना ही विनाश।

तो कुल मिलाकर कहने का मतलब यह है कि आपके जीवन में जो भी आता है , हो सकता है कि अभी वह आपको बुरा लग रहा हो परंतु उसका कोई ना कोई उपयोग है । बस आपको अपने नजरिए को बदलने की जरूरत है। जब दुख , चिंता और निराशा से भर जाओगे तभी तो इनसे मुक्ति पाने का विचार पैदा होगा ।

बौद्ध भिक्षुओं ने मांसाहार क्यों शुरू किया ?

बुद्ध जब सिद्धार्थ थे , जब उन्होंने परमसत्य को प्राप्त भी नहीं किया था , तब भी उनके भीतर करुणा और दया का भंडार था । तो ऐसा कैसे हो सकता है कि बुद्ध होने के बाद उनके भीतर की करुणा कम हो गई हो ?

गौतम बुद्ध ना तो खुद मांसाहार करते थे और ना ही वे चाहते थे कि उनका कोई भिक्षु मांसाहार करे । अब आपके मन में यह प्रश्न उठ सकता है कि फिर ऐसा क्यों था कि बुद्ध के बहुत सारे भिक्षु मांसाहार करते थे और आज भी खुद को बौद्ध भिक्षु बताने वाले लोग मांसाहार करते हैं ? इस प्रश्न का उत्तर एक छोटी सी घटना से आपको समझाने का प्रयास करूंगा।

गौतम बुद्ध ने अपने भिक्षुओं के लिए कुछ नियम बनाए हुए थे जिनमें एक नियम यह भी शामिल था कि भिक्षु पसंद नापसंद से परे है। वह अपनी पसंद के भोजन की मांग नहीं कर सकता। उसे उसके भिक्षा पात्र में जो भी मिलेगा उसे वह प्रेम के साथ ग्रहण करेगा ।

एक बार एक भिक्षु एक गांव में भिक्षाटन के लिए जा रहा होता है। मार्ग में उस भिक्षु के साथ एक ऐसी घटना घटती है जो अब से पहले किसी भिक्षु के साथ नहीं घटी थी । एक चील अपने मुंह में एक मांस का टुकड़ा लेकर आकाश में उड़ रही थी। ना जाने कैसे उस चील के मुंह से वह मांस का टुकड़ा छूट जाता है और संयोग से उस भिक्षु के भिक्षापात्र में गिर जाता है।

उस मांस के टुकड़े को अपने भिक्षा पात्र में देख वह भिक्षु घबरा जाता है । उसे समझ नहीं आता कि वह क्या करे क्योंकि बुद्ध ने यह भी कहा है कि मांसाहार नहीं करना है और यह भी कहा है कि जो भी भिक्षापात्र में मिले उसे प्रेम के साथ ग्रहण करना है।

वह भिक्षु दौड़कर बुद्ध के पास जाता है और उन्हें पूरी घटना बताता है। बुद्ध घटना सुन सोचते हैं कि यह कोई ऐसी घटना तो है नहीं जो रोज रोज घटेगी । यह तो संयोग से घट गई है। अब हो सकता है कि कभी ना घटे।

अब चील के मुंह से रोज – रोज मांस थोड़ी ही छूटेगा और अगर छूट भी गया तो यह पक्का थोड़ी है कि भिक्षापात्र में ही गिरेगा इसलिए इस छोटी सी बात के लिए नियम बनाना उचित नहीं है बुद्ध अपने उस भिक्षु से कहते हैं कि..

तुमने किसी की हत्या तो नहीं की है और ना ही तुमने यह माँस भिक्षा पात्र में मांगा है। यह तो अपने आप ही तुम्हारे भिक्षा पात्र में आ गिरा है। इसलिए अगर तुम चाहो तो निर्दोष भाव के साथ तुम अपने इस भिक्षापात्र में पड़ी भिक्षा को ग्रहण कर सकते हो।

बुद्ध के द्वारा कही गई इस बात को अलग अलग लोगों द्वारा अलग – अलग तरह से समझा गया जिसके कारण पहले और आज भी आप देखते हैं कि खुद को बौद्ध भिक्षु कहने वाले बहुत सारे लोग मांसाहार करते हैं।

मैं आपसे बस एक प्रश्न पूछना चाहता हूं कि जो व्यक्ति खुद मांसाहार नहीं करता , वह भला दूसरों को मांसाहार की अनुमति कैसे दे सकता है ? अब कुछ लोग मेरी इस बात का विरोध कर सकते हैं कि आप ऐसा कैसे कह सकते हैं ?

तो इस प्रश्न का उत्तर है…

आप गौतम बुद्ध के पूरे जीवन को पढ़िए उन्होंने अपने पूरे जीवन में जो भी कार्य किया , वह करुणा से भरा हुआ था , दया से भरा हुआ था. जो व्यक्ति बचपन से ही किसी दूसरे के दुख को देखकर खुद विचलित हो जाता हूं. वह भला जीभ के स्वाद के लिए किसी को किसी प्राणी के प्राण लेने कैसे दे सकता है!

यह साधारण सी बात तो उसे भी समझ आ जाएगी जिसने बुद्ध को थोड़ा भी समझा है । मैं माँसाहारियों के विरोध में नहीं हूं। मैं बस उस सोच के विरोध में हूं जो कहती है कि बुद्ध मांसाहार के पक्ष में थे।

“बेशक आप हत्या ना करते हों परंतु अगर आप उसे खाते हैं, तो आप उस हत्या के भागीदार अवश्य बन जाते हैं”

बुद्ध को समझने के लिए बुद्ध होना आवश्यक है !

अगर आप बुद्ध को पूरी तरह से समझना चाहते हैं तो आपको बुद्ध होना पड़ेगा और बुद्ध होने की यात्रा ध्यान से शुरू होती है और ध्यान भी बुद्ध जैसा ही है जिसे ना तो कहा जा सकता है और ना ही समझा जा सकता है, केवल अनुभव किया जा सकता है ।

बुद्ध की हर शिक्षा का ज़ोर लोगों को ध्यान की तरफ आकर्षित करने पर है , उन्हें जागरुक करने पर है परंतु दुर्भाग्य की बात यह है कि लोग बुद्ध को समझना तो चाहते हैं लेकिन उन्हें अनुभव नहीं करना चाहते। बुद्ध शब्द का संबंध केवल गौतम बुद्ध से ही नहीं है बल्कि उस हर व्यक्ति से है , जो संसार में सांस ले रहा है।

बुद्ध ने ना जाने कितनी बार अलग – अलग तरह से लोगों ने को जगाने का प्रयास किया , उन्हें यह बताने का प्रयास किया कि उनके भीतर भी बुद्ध होने की क्षमता है परंतु ज्यादातर ने बुद्ध को तो माना परंतु बुद्ध की नहीं मानी जिसके कारण आज आप देखते हैं कि दस लोग बुद्ध के बारे में दस तरह की बात बताते हैं।

दोस्तो गौतम बुद्ध की जीवनी को लिखने के पीछे मेरा उद्देश्य है कि आप बुद्ध को केवल समझें ही ना बल्कि अनुभव भी करें । एक बहुत गहरी बात आपको बताता हूं । ध्यान से समझने का प्रयास करिएगा।

आवश्यक यह नहीं है कि आप वह सुनें जो बुद्ध ने कहा है बल्कि आवश्यक यह है कि ने आप वह सुन लें जो बुद्ध ने नहीं कहा है। क्योंकि शब्दों में तो मिलावट हो सकती है। उन्हें अपनी मर्जी से बदला जा सकता है। लेकिन अनुभव में मिलावट करने का कोई तरीका नहीं है।

बुद्ध ने कहा है ध्यान करो मैंने ध्यान से ही अपने दुखों से मुक्ति पाई है। बस बात खत्म हो गई। अब और कुछ सुनने की क्या आवश्यकता है ? लेकिन लोग ध्यान नहीं करना चाहते और वे बुद्ध को और ज्यादा गहराई में समझना चाहते हैं।

यह कैसी बेवकूफी भरी बात है कि आप प्यास बुझाने के लिए पानी पीना नहीं चाहते बल्कि उसके बारे में जानकारी इकट्ठा करना चाहते हैं। जानकारी इकट्ठा करने से मन की प्यास नहीं बुझेगी बल्कि खुद के भीतर बुद्ध को अनुभव करने से मन की प्यास बुझेगी।

जैसे जैसे आप खुद को जानने लगेंगे, वैसे – वैसे आप बुद्ध को जानने लगेंगे और हां यह बात हमेशा याद रखना कि बुद्ध कहीं बाहर नहीं बल्कि आपके भीतर ही हैं ।

अगर मैं बुद्ध की सभी शिक्षाओं का निचोड़ कर दूँ और आपको उन्हें एक लाइन में बताऊं तो वह बस इतना है कि ध्यान करो क्योंकि वही आपके जीवन को बदल सकता है।

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गौतम बुद्ध विचार – Gautam Buddha Quotes in Hindi

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