गौतम बुद्ध का जीवन परिचय और उनकी शिक्षाएं | Gautam Buddha Biography in Hindi

गौतम बुद्ध का जीवन परिचय और उनकी शिक्षाएं | Gautam Buddha Biography in Hindi

नमस्ते मेरे प्यारे भाईयो और बहनों आप सभी का नॉलेज ग्रो मोटिवेशनल ब्लॉग पर स्वागत है। दोस्तो आज के इस आर्टिकल जरिए हम आपके साथ गौतम बुद्ध का जीवन परिचय और उनके द्वारा दिए गए शिक्षाओं को हिंदी में शेयर करने वाले हैं। इसीलिए इस आर्टिकल को अंत तक जरूर पढ़िए।

Gautam Buddha Biography in Hindi | गौतम बुद्ध की जीवनी
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Gautam Buddha Biography in Hindi | गौतम बुद्ध की जीवनी

दोस्तो इस आर्टिकल में दी गई जानकारी का स्रोत गौतम बुद्ध के जीवन पर आधारित 10 से भी ज्यादा किताबें, इंटरनेट और मेरे और मेरे गुरुजनों का अनुभव है। तो बिना समय को गवाएं चलिए गौतम बुद्ध की जीवनी को शुरुआत करते हैं।

गौतम बुद्ध की जीवनी आर्टिकल को लिखने का कारण:

गौतम बुद्ध की जीवनी को लिखने के पीछे का मेरा बस यही उद्देश्य है कि मैं आपको उस सत्य से अवगत करा सकूं, जो ज्यादातर लोगों से छिपा हुआ है। इस आर्टिकल के जरिए मैं आपको बुद्ध से मिलवाना चाहता हूं। अगर आप बुद्ध से मिलना चाहते हैं, तो मेरे साथ चलिए। मेरा विश्वास कीजिए अगर आप अच्छे और बुरे को छोड़ पाए, तो आप सच से मिल पाएंगे।

दोस्तो गौतम बुद्ध की जीवनी को पढ़ते वक्त ध्यान रखने योग्य बात सिर्फ यह है, कि जब तक आप इस आर्टिकल को पढ़ रहे हैं, तब तक आप भूल जाईए की आप किस जाति या धर्म से हैं। बस आप मान लीजिए की आप एक खाली पन्ना हैं जिसपर अब बुद्ध उतरने वाले हैं।

गौतम बुद्ध का जन्म कब और कहां हुआ?

दोस्तो इस कहानी की शुरुआत होती है, राजा शुद्धोधन और रानी महामाया से, कहने को तो ये दोनों राजा रानी थे, परंतु इनके जीवन में एक गहन पीड़ा थी। शादी के कई वर्ष बीत जाने के बाद भी इनकी कोई संतान नहीं थी, जिसके कारण रानी महामाया अपने आप को बाँझ समझने लगी थीं।

लेकिन फिर उनके सौभाग्य के कारण उन्हें बाद में एक पुत्र की प्राप्ति होती है, जिन्हे आज हम भगवान गौतम बुद्ध के नाम से जानते हैं। दोस्तो भगवान गौतम बुद्ध का जन्म नेपाल के लुंबिनी गांव में ईसा पूर्व 624 में हुआ था।

दोस्तो भगवान बुद्ध का जन्म होनें के 5 दिन बाद उनका नाम सिद्धार्थ रख दिया जाता है। सिद्धार्थ नाम सुन सभी लोग बहुत प्रसन्न होते हैं। राजा शुद्धोधन नामकरण के अगले ही दिन अपने राज्य के बड़े बड़े ज्ञानियों को बुलवाते हैं और उनसे कहते हैं कि, मैं अपने पूत्र का भविष्य जानना चाहता हूँ।

सभी ज्ञानी भविष्य देखना शुरु करते हैं और राजा शुद्धोधन से कहते हैं, महाराज युवराज बुद्धिमान होंगे, रूपवान होंगे, शक्तिशाली होंगे। उनके भीतर हर वो गुण होगा जिससे इस संसार को जीता जा सके। महाराज युवराज का नाम सिद्धार्थ है और इस तरह से वे सिद्धार्थ गौतम के नाम से जाने जाएंगे।

राजा शुद्धोधन कहते हैं सिर्फ सिद्धार्थ गौतम के नाम से नहीं, बल्कि सम्राट सिद्धार्थ गौतम के नाम से जाने जायेंगे। वे सभी ज्ञानी कहते हैं जी महाराज ऐसा ही होगा। वे ज्ञानी लोग राजा को यह तो बता देते हैं कि सिद्धार्थ के भीतर एक सम्राट के गुण हैं, परंतु वे यह नहीं बताते कि सिद्धार्थ के भीतर एक सन्यासी के भी गुण हैं।

क्योंकि वे सभी राजा के क्रोध को जानते थे। वे जानते थे कि राजा अपने पुत्र को सम्राट ही बनाना चाहते हैं, इसलिए सभी ज्ञानी वही बताते हैं जो राजा शुद्धोधन जी सुनना चाहते थे। सिद्धार्थ के जन्म के सात दिन पश्चात रानी महामाया की मृत्यु हो जाती है। मृत्यु से पहले ही रानी महामाया को यह आभास होने लगा लगा था, कि उनका समय पूरा हो गया है।

इसलिए उन्होंने पहले ही अपनी बहन प्रजापति से यह वचन ले लिया था, कि वे उनके पुत्र को अपने पुत्र की तरह पालेंगी और सिद्धार्थ को कभी पता नहीं लगने देंगी कि, उनकी मां इस दुनिया में नहीं है। और उसके बाद रानी प्रजापति ही सिद्धार्थ का अपनी मां की तरह पालन पोषण करती है, और उन्हें कभी पता नही चलने देती है की उनकी मां इस दुनिया में नहीं है।

उसके कुछ दिनों के बाद महल के द्वार पर एक वृद्ध मुनिवर पधारते है, जिनका नाम असित मुनि था। असित मूनि एक महान तपस्वी थे। जो शाक्यों के कुलगुरु भी रह चुके थे। वे इतने ज्ञानी थे कि उनकी भविष्य वाणी कभी भी गलत साबित नहीं होती थी।

राजा शुद्धोधन अपने छोटे भाइयों के साथ असित मुनि के स्वागत के लिए महल के द्वार पर पहुंचते हैं और असित मुनि को पैर छूकर प्रणाम करते हैं और कहते धन्य हु में, जो आप हमारे महल पधारे हैं।

असित मुनि कहते हैं की मैं तुझसे मिलने नहीं आया हूं राजन ! मैं तो उस युग पुरुष के दर्शन करने आया हूं, जिसने तेरे यहां पुत्र बनकर जन्म लिया है। राजा कहते हैं अवश्य मूनिवर और अपने पुत्र को असित मुनि के हाथों में थमा देते हैं। फिर असित मुनि कहते हैं, जिसकी प्रतीक्षा करते – करते आधी उम्र बीत गई, अब आया है ये!

केवल तू ही नहीं राजन, सारा जग इसकी प्रतीक्षा कर रहा था। असित मुनि सिद्धार्थ को पालने में लिटा देते हैं और उनके चारों ओर घूमकर परिक्रमा करने लगते हैं। राजा यह देखकर थोड़ा आश्चर्यचकित होता है और असित मूनि से पूछता है , मुनिवर यह आप क्या कर रहे हैं?

असित मुनि कहते हैं ब्रह्मांड की परिक्रमा ! फिर असित मुनि सिद्धार्थ के पैरों में अपना सिर रखकर रोने लगते हैं। असित मुनि को रोता देख राजा पूछते हैं , क्या हुआ मुनिवर आप रो क्यों रहे हैं ? क्या इस बालक के भविष्य पर कोई संकट है ?

असित मुनि कहते हैं नहीं राजन, मैं बालक के लिए नहीं, बल्कि में अपने लिए रो रहा हूं। क्योंकि अब मैं अब वृद्ध हो गया हूं और बहुत दिन जीवित नहीं रहूंगा। और उसके कारण मैं इस बालक को बुद्ध बनते हुए नहीं देख सकूंगा। असित मुनि की बात सुनते ही राजा क्रोधित हो जाता है।

और असित मुनि से कहते हैं की मुनिवर यह कोई ज्ञानी वैरागी नहीं, बल्कि सम्राट बनेगा। यह बुद्ध नहीं योद्धा बनेगा, एक ऐसा योद्धा जिसकी तलवार के सामने बड़े – बड़े महारथी भी काँप उठेंगे। यदि आपको इसे आशीर्वाद देना ही है, तो ऐसा आशीर्वाद दीजिए कि यह हर युद्ध में विजयी हो।

असित मुनि कहते हैं , ऐसा ही होगा। जीवन के हर युद्ध में यह विजयी होगा पर वह युद्ध भावनाओं का होगा। यह सारे ब्रह्मांड पर राज करेगा, पर वह ब्रह्मांड मन के भीतर होगा। असित मुनि कहते हैं , इस बालक के शरीर के सभी गुण बताते हैं कि यह भविष्य में बुद्ध होगा। राजा कहता है गुण चाहें जो भी कहते हो, परंतु थामेगा तो यह बालक तलवार ही।

असित मुनि कहते हैं तलवार से केवल राज्य जीते जाते हैं परंतु तेरा पुत्र मन जीतेगा , युद्ध से केवल सीमाएं बदलती है, परंतु तेरा पुत्र युग बदलेगा। राजा कहता है यदि यह लेख विधाता का है, तो मैं उससे भी लड़ जाऊंगा ! इतनी राग रागनियां भर दूंगा इसके चारों तरफ की वैराग्य का विचार भी इसे बुरा लगेगा।

असित मूनि कहते हैं , चाहे लाख जतन कर ले राजन , परंतु तेरा पुत्र सन्यासी ही बनेगा। इतना कहकर असित मुनि वहां से चले जाते हैं। राजा शुद्धोधन असित मुनि से कह तो देते हैं कि वे अपने पुत्र को सम्राट ही बनाएंगे, परंतु भीतर ही भीतर उन्हें चिंता सताने लगती है कि, कहीं उनका पुत्र संन्यास ही ना बन जाए।

अपनी इस चिंता को लेकर राजा शुद्धोधन कुलगुरु के पास जाते हैं और उन्हें अपनी समस्या बताते हैं। कुल गुरु कहते हैं राजन असित एक सन्यासी हैं , इसलिए उन्हें सिद्धार्थ की महानता एक सन्यासी बनने में लगती है और आप एक राजा है, इसलिए आपको सिद्धार्थ की महानता एक राजा बनने में लगती है।

सवाल यह नहीं है कि सिद्धार्थ क्या बनेंगे ? सवाल यह है कि आप उन्हें क्या बनाना चाहते हैं? अगर आप उन्हें एक सम्राट बनाना चाहते हैं, तो उन्हें एक सम्राट बनने की प्रक्रिया से गुजारिए। अगर आप उन्हें एक सन्यासी बनने से रोकना चाहते हैं , तो उन्हें वैराग्य से दूर रखिए।

जीवन के ऐसे सत्यों से दूर रखिए जो उसके मन में वैराग्य उत्पन्न करें। और आप सिद्धार्थ को जीवन भर भ्रम में रखो, क्योंकि जिस दिन उसको दुख का एहसास होंगा और उसके मन में पीड़ा हुई तो वो संन्यास की लेने तरफ़ चला जायेगा। फिर राजा कहता है की आखिर में करु तो क्या करू?

फिर कुलगुरु कहते हैं की एक बड़ा षड्यंत्र रचो , यानी सिद्धार्थ जिस भी मेहल में रहते हैं, वहा पर सर्दी हो तो गर्मी का एहसास न हो, और गर्मिया हो तो सर्दी का एहसास न हो, और उसे लड़कियों से घेरे रखो और उसके इर्द गिर्द झूठा संसार रचों। यानी उसे कभी भी ये पता नहीं चलने देना है की इस दुनिया में दुख नाम की भी कोई चीज होती भी है।

बूढ़े लोगों से इसको दूर रखो, मृत्यु शैय्या से इसको दूर रखो और सुखा पिल्ला पत्ता भी उसके बाग में नहीं दिखना चाहिए। क्योंकि ऐसी चीजे उसको संन्यास लेने की ओर आकर्षित कर सकती है। और उसके बाद राजा ने प्रपच किया यानी राजा ने सिद्धार्थ के इर्द गिर्द एक झूठा संसार रचा।

दोस्तो कहा जाता है कि राजा शुद्धोधन ने अपने सैनिकों को यह आदेश दे दिया था कि राज्य में कोई भी शमशान नहीं रहेगा। जहां जहां तक सिद्धार्थ जाएंगे , वहां पेड़ों पर सूखी पत्ती तक नहीं दिखनी चाहिए। फूलों की बेल या वृक्षों पर कोई मुरझाया फूल नहीं दिखना चाहिए। वृद्ध, बीमार और गरीब लोगों को तो नई नगरी में भेज ही दिया गया था।

गौतम बुद्ध का बचपन (Gautam Buddha Early Life)

समय बीतता है और सिद्धार्थ गुरुकुल जाने के योग्य हो जाते हैं, तब रानी प्रजापति राजा शुद्धोधन से सिद्धार्थ को गुरुकुल भेजने के लिए कहती हैं। परंतु राजा शुद्धोधन यह कहते हुए मना कर देते हैं, कि वे अपने पुत्र के लिए महल के पास ही गुरुकुल बनवाएँगे। क्योंकि वे नहीं चाहते थे कि उनके पुत्र को कोई भी ऐसा ज्ञान दिया जाए , जो उन्हें वैराग्य की तरफ ले जाए।

गौतम बुद्ध के बचपन की कहानी

सिद्धार्थ का शिक्षण शुरू होने से पहले की एक घटना है, जो आपको जरूर समझनी चाहिए। एक बार सिद्धार्थ अपने चचेरे भाइयों के साथ बगीचे में खेल रहे होते हैं, तो  सिद्धार्थ का चहेरा भाई देवदत्त सिद्धार्थ को चोट पहुंचाने का प्रयास करता है, परंतु सूर्या का पुत्र चन्ना सिद्धार्थ को बचा लेता है।

सूर्या यानी की राजा शुद्धोधन का सार्थी था और राजा ने सूर्या को वचन दिया था कि बड़े होकर सूर्या का पुत्र यानी चन्ना को युवराज सिद्धार्थ का सार्थी बनाएंगे। सिद्धार्थ को बचाने के चक्कर में चन्ना और सिद्धार्थ दोनों को भी चोट लग जाती है।

सैनिक सिद्धार्थ को जल्दी से महल ले जाने लगते हैं। सिद्धार्थ चन्ना कों भी उनके साथ आने के लिए कहते हैं। चन्ना सिद्धार्थ के साथ महल चला जाता है। महल पहुंचने के बाद सिद्धार्थ को दवाई लगाई जाती है। सिद्धार्थ चन्ना को भी दवाई लगाने के लिए अपने पास बुलाते हैं,

परंतु एक दासी सिद्धार्थ से चन्ना को अपने पास बुलाने से यह कहते हुए मना कर देती है, कि चन्ना एक सार्थी पुत्र है। वह आपके पास नहीं आ सकता। सिद्धार्थ पूछते हैं परंतु क्यों ? दासी कहती है, वह नीची जात का है और आप उसे छू नहीं सकते। सिद्धार्थ पूछते हैं यह जात क्या होती है ?

फिर दासी कहती है जैसे आप युवराज हैं और वह सार्थी पुत्र। सिद्धार्थ पूछते हैं तो वह मुझसे अलग कैसे है ? दासी कहती आपका जन्म राजप्रसार में हुआ है, इसलिए आप युवराज हैं और उसका जन्म एक छोटे घर में हुआ है, इसलिए वह सार्थी पुत्र है।

सिद्धार्थ कहते हैं तो इसमें भिन्नता क्या है ? घाव होने पर रक्त उसे भी तो आता है। दासी के पास सिद्धार्थ के इस प्रश्न का कोई उत्तर नहीं था। सिद्धार्थ चन्ना को अपने पास बुलाते हैं और उसे दवाई लगाते हैं। उस दिन से सिद्धार्थ और चन्ना एक दूसरे के मित्र बन जाते हैं। चन्ना हमेशा ख्याल रखता है कि सिद्धार्थ को कोई परेशानी ना हो।

गौतम बुद्ध का विवाह

राजा शुद्धोधन की बहन अमिता अपनी पुत्री यशोधरा के साथ कपिलवस्तु आती हैं। अमिता रानी प्रजापति के भाई की पत्नी और राजा शुद्धोधन की बहन थी। राजकुमारी यशोधरा और सिद्धार्थ के बीच अच्छी मित्रता थी। इसलिए जब भी वे मिला करते थे, तो साथ ही खेला करते थे।

जिसके कारण देवदत्त को बहुत ईर्ष्या होती थी। सिद्धार्थ का स्वभाव बहुत ही कोमल और करुणामय था जिसके कारण कोई भी उनकी तरफ आकर्षित आसानी से हो जाता है। उसके कुछ दिनों के बाद राजा शुद्धोधन तय करते हैं कि वे अपने पुत्र का राज्याभिषेक करेंगे।

परंतु फिर उन्हें कोई सलाह देता है कि पहले उन्हें सिद्धार्थ का विवाह करा देना चाहिए। उसके बाद उनका राज्याभिषेक करना उचित होगा। राजा शुद्धोधन को यह बात उचित लगती है और वे तय करते हैं कि राज्याभिषेक से पहले सिद्धार्थ का विवाह कराया जाएगा।

राजा शुद्धोधन और रानी प्रजापति चाहते थे कि यशोधरा का विवाह सिद्धार्थ के साथ हो, परंतु यशोधरा के पिता चाहते थे कि यशोधरा का विवाह देवदत्त के साथ हो। इसलिए यशोधरा के पिता यशोधरा के सामने देवदत्त के साथ विवाह का प्रस्ताव रखते हैं। परंतु यशोधरा देवदत्त के साथ विवाह करने से मना कर देती हैं।

क्योंकि वे सिद्धार्थ से प्रेम करती थीं और उन्हीं से ही विवाह करना चाहती थीं। यशोधरा के हृदय की बात सुन उनके पिता उनसे कहते हैं , सिद्धार्थ तुम्हारे योग्य नहीं है। जिस व्यक्ति के भीतर करुणा है, वह एक महान योद्धा कैसे बन सकता है? इसीलिए मैं चाहता हूं कि तुम्हारा विवाह एक वीर के साथ हो ना कि भविष्य में होने वाले एक जोगी के साथ हो।

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यशोधरा का स्वयंवर के लिए परीक्षा

फिर यशोधरा कहती हैं यदि आपको सिद्धार्थ की योग्यता पर शक है, तो आप उनकी परीक्षा ले सकते हैं। यशोधरा के पिता कहते हैं तो ठीक है मैं परीक्षा लूंगा परंतु जो भी परीक्षा में विजयी होगा, तुम्हें उसके साथ ही विवाह करना होगा।

यशोधरा कहती हैं ठीक है। यशोधरा के पिता राजा दंडपानी यह घोषणा करते हैं, यशोधरा का स्वयंवर के लिए एक परीक्षा निर्धारित की जाएगी और जो उस परीक्षा में विजयी घोषित होगा, उसी के साथ यशोधरा का विवाह करा दिया जाएगा। उसके बाद यशोधरा का स्वयंवर के लिए परीक्षा भी होती है और उसमे सिद्धार्थ की जीत भी होती है।

सिद्धार्थ और यशोधरा का विवाह

सिद्धार्थ के स्वयंवर में विजय होने के बाद राजा शुद्धोधन और राजा दंडपानी विवाह के लिए एक उचित मुहूर्त निकलवाते हैं। सिद्धार्थ और यशोधरा के विवाह की खबर सुन पूरा कपिलवस्तु बहुत खुश होता है। और सिद्धार्थ और यशोधरा के विवाह की तैयारियां शुरू हो जाती हैं।

राजा शुद्धोधन और राजा दंडपानी भारतवर्ष के बड़े – बड़े राजाओं को विवाह में आमंत्रित करते हैं। विवाह के लिए एक उचित मुहूर्त निकलवाया जाता है और सभी विधि विधानों के साथ विवाह संपन्न करा दिया जाता है।

सिद्धार्थ का सत्य से अवगत होना।

दोस्तो जीवन के वे सभी सत्य जो अब तक उनसे छुपाए गए हुए थे, वे सभी सत्यों के बारे में उनको एक ही दिन या एक ही रात में नही पता चला था, बल्कि सिद्धार्थ को धीरे धीरे जीवन के वे सभी सत्य पता लग रहे थे, जो अब तक उनसे छुपाए गए थे।

अब तक उन्होंने पशु पक्षियों की मृत्यु तो देखी थी परंतु अभी तक उन्होंने अपने किसी परिजन की मृत्यु नहीं देखी थी। जिसके कारण उन्हें लगता था कि उनके माता पिता, पत्नी, रेशेदार सभी हमेशा रहने वाले हैं, परंतु उनका यह वहम भी बहुत जल्दी टूटने वाला था।

अपने मन की पीड़ा को शांत करने के लिए सिद्धार्थ अपने सार्थी चन्ना के साथ यूं ही कहीं घूमने के लिए निकल पड़ते हैं। उस मार्ग में सिद्धार्थ को एक अजीब सा दृश्य नजर आता है। ऐसा दृश्य सिद्धार्थ ने आज से पहले कभी नहीं देखा था।

सिद्धार्थ देखते हैं कि चार लोगों ने अपने कंधों पर कुछ उठाया हुआ है और बहुत सारे लोग उनके पीछे चल रहे हैं और सभी के चेहरों पर एक उदासी है। सिद्धार्थ ने आज से पहले कभी भी इतने सारे उदास लोग एक साथ नहीं देखे थे।

सिद्धार्थ अपने सारथी चन्ना से पूछते हैं, चन्ना ये लोग कौन हैं ? और कहां जा रहे हैं ? और उन चार लोगों ने अपने कंधों पर क्या उठाया हुआ है? चन्ना थोड़ा सा हिचकिचाते हुए कहता है युवराज ये लोग अपने किसी परिजन के मृत शरीर को शमशान ले जा रहे हैं।

फिर सिद्धार्थ पूछते हैं मृत शरीर का क्या अर्थ है चन्ना ? चन्ना कहता है मृत शरीर का अर्थ है जिसमें प्राण ना हो, जिसकी मृत्यु हो गई हो। फिर सिद्धार्थ कहते हैं ऐसे कैसे किसी की मृत्यु हो सकती है ? ऐसे कैसे प्राण शरीर को छोड़ सकते हैं ?

चन्ना कहता है युवराज यही जीवन का सत्य है। सिद्धार्थ रोते हुए कहते हैं यह जीवन कितना पीड़ादायक है चन्ना। मैंने आज तक मृत्यु के बारे में सुना था , परंतु आज देख भी लिया। रथ वापस घुमा लो, चन्ना , अब मुझे और कुछ नहीं देखना। अपने मन की गहरी पीड़ा के कारण सिद्धार्थ कपिलवस्तु वापस लौट आते हैं।

उसके कुछ ही दिनों के बाद सिद्धार्थ जब किसी महोत्सव के लिए जा रहे थे, तभी रास्ते में उन्हें एक गेरवी वस्त्र धारण किया हुआ एक व्यक्ति दिखता है। उन्होने आज तक कभी भी ऐसे व्यक्ति को देखा नही था, इसीलिए वो चन्ना से पूछता है, की चन्ना ये गेरवी वस्त्र धारण किया हुआ व्यक्ति कौन है और उसने ऐसे क्यों वस्त्र पहने हुए हैं?

फिर चन्ना सिद्धार्थ से कहता है की युवराज वह एक संन्यासी है, और इसने अपना सब कुछ छोड़ दिया है। क्योंकि इस जिंदगी में दुःख है, तकलीफ है , क्लेश है, इसीलिए उसने अपने दुखों का अंत करने के लिए संन्यास लिया हुआ है। अब समय करीब आ रहा था उस सीमा को पार करने का जो सिद्धार्थ और संन्यास के बीच में थी।

इसी बीच सिद्धार्थ को किसी के द्वारा यह भी पता चलता है कि रानी प्रजापति सिद्धार्थ की जननी नहीं हैं, और उनकी असली मां महामाया की मृत्यु तो उन्हें जन्म देने के सात दिन पश्चात ही हो गई थी। सिद्धार्थ इस सत्य को सुनकर पूरी तरह से टूट जाते हैं, क्योंकि उन्होंने पहली बार किसी अपने को खोने का दर्द महसूस किया था।

उसी बीच सिद्धार्थ को नई नगरी भी देखने का अवसर मिल जाता है। अब से पहले सिद्धार्थ ने केवल नई नगरी का नाम सुना था, परंतु कभी उसे देखा नहीं था। जैसे ही सिद्धार्थ नई नगरी पहुंचते हैं, तो उन्हें समझ नहीं आता कि वे कहां आ गए हैं। क्योंकि उन्होंने आज से पहले कभी भी ऐसे मनुष्य नहीं देखे थे।

उन्हें सबसे पहले एक वृद्ध व्यक्ति दिखता है। सिद्धार्थ पूछते हैं, क्या यह व्यक्ति भी अपने पुराने जन्मों के कर्मफल भोग रहा है ? चन्ना कहता है नहीं युवराज यह वृद्धावस्था है, जो अमीर और गरीब सभी के जीवन में आती है। वृद्धावस्था धनी और निर्धन में भेद नहीं करती।

फिर सिद्धार्थ पूछते हैं की तो क्या सब इस अवस्था से गुजरते हैं ? मैं भी और तुम भी? चन्ना कहता है, हां युवराज जन्म लेने वाला प्रत्येक मनुष्य जीवन के अंतिम चरण में इस अवस्था से गुजरता ही है। उन सभी लोगों को देख सिद्धार्थ के मन में यही प्रश्न उठते हैं कि

“क्या उन्हें और उनके पत्नी और बच्चे को भी एक दिन वृद्ध होना पड़ेगा?”

फिर सिद्धार्थ सोचते हैं कि जब वे वृद्ध हो जाएंगे या रोगी हो जाएंगे, तो अपने उस दुख को कैसे संभालेंगे ? क्या कोई ऐसा उपाय भी है जो उनके सभी दुखों को दूर कर सके? सिद्धार्थ के मन में बार – बार लगातार यही प्रश्न घूमता रहता है कि,

“क्या कोई मार्ग है, जिस पर चलकर इन सभी दुखों का अंत किया जा सके?”

सिद्धार्थ का गृहत्याग

यहां पर एक बात समझने वाली है कि जब लगातार कोई प्रश्न हमारे भीतर उठता है तो हमें उसका उत्तर अवश्य मिलता है। सिद्धार्थ को भी उत्तर मिलता है , उन्हें एक सन्यासी याद आते हैं, जिन्होंने सिद्धार्थ से मन जीतने की बात कही थी।

फिर सिद्धार्थ को समझ आता है कि उनका मन ही उनके वश में नहीं है जिसके कारण वे दुख से पीड़ित हैं। वे अपनी भावनाओं और इच्छाओं पर काबू नहीं कर पा रहे थे। उन्हें किसी भी हालत में अपने मन को जीतना होगा और मन को जीतना तभी संभव है, जब वे संन्यास ग्रहण कर लें।

सिद्धार्थ को यह बात साफ साफ नज़र आ जाती है कि उन्हें उनके दुखों से मुक्ति संन्यासी बनकर ही मिल सकती है। क्योंकि जिन लोगों के होने से आज उन्हें खुशी मिल रही है , कल उन्हीं लोगों के ना होने से उन्हें दुख भी मिलेगा।

सिद्धार्थ को सुख के पीछे छिपा हुआ दुख स्पष्ट रूप से दिख जाता है। ज्यादातर लोग सोचते हैं कि उनके पास दो विकल्प थे , परंतु अगर आप ध्यान से समझने का प्रयास करें तो आपको समझ आएगा कि उनके पास केवल एक ही विकल्प था।

क्योंकि वे ग्रहस्त जीवन के बारे में पूरी तरह से स्पष्ट थे और जहां स्पष्टता होती है , वहां दो विकल्प नहीं होते। और उसी रात सिद्धार्थ ने वानप्रस्थ होने का निश्चय करते हैं। सिद्धार्थ के मन में अपनी पत्नी और बच्चे को उनका अधिकार ना दे पाने की पीड़ा तो होती है, परंतु उसके साथ ही उनके मन में मनुष्य के दुखों का कारण जानने की आशा भी होती है।

गौतम बुद्ध की संघर्ष कथा

वानप्रस्थ होने के बाद सिद्धार्थ को जमीन पर नंगे पैर चलने आदत नहीं थी, परंतु अब उन्हें कंकड़ पत्थरों पर चलना पड़ रहा था , कांटों पर चलना पड़ रहा था। सिद्धार्थ चाहते तो उस पीड़ा को देखकर वापस लौट सकते थे , परंतु सिद्धार्थ ऐसा नहीं किया, क्योंकि उस पीड़ा से कहीं अधिक गहरी पीड़ा सिद्धार्थ के मन में थी।

दोस्तो उसके बाद सिद्धार्थ बहुत से गुरुओ से मिले और उनसे शिक्षा हासिल की और बहुत ही बड़े बड़े तप किए, लेकिन 6 साल इतनी कठोर तपस्या करने के बाद भी उन्हें उनका लक्ष्य नहीं मिला था। 6 साल कठोर तपस्या के वजह से उनका शरीर हड्डियो का मात्र ढांचा रह गया था।

दोस्तो ऐसे ही सिद्धार्थ ऐसे ही बहुत से गुरुओ से आत्मज्ञान प्राप्त करने के लिए मिलते है और उनसे से ज्ञान प्राप्त करते हैं। पर अभी भी सिद्धार्थ को जिस आत्मज्ञान की तलाश थी वह उसे अब तक नहीं प्राप्त हुआ था।

अब सिद्धार्थ के मन में ये विचार भी आने लगे थे कि कहीं उनकी खोज गलत तो नहीं है ? फिर सिद्धार्थ खुद को समझाते हैं कि यह मन का खेल है , मन ही हमारे भीतर नकारात्मकता और सकारात्मकता पैदा करता है इसलिए मुझे दोनों से ही ऊपर उठना है।

सिद्धार्थ को ज्ञान की प्राप्ति होना

दोस्तो उसके अगले ही दिन जब सिद्धार्थ पानी पीने के लिए पास वाली नदी के पास जाते हैं, तो उन्हे चक्कर आती है, और वो बेहोश हो जाते है। क्योंकि कठोर तप करने के वजह से उनको अपना शरीर भी संभाला नही जा रहा था।

तभी वहा पर सुजाता नाम की एक लड़की आती है, और सिद्धार्थ को बेहोशी की हालात में देखकर उन्हें बचा लेती है। यानी सुजाता सिद्धार्थ के ऊपर पानी छिड़कती है और उन्हें होश में ले आती है। सिद्धार्थ जब होश में आते हैं, तब सुजाता सिद्धार्थ से पूछती हैं की,

“जब आप यहां आए थे तो कितने ओजस्वी थे, आप क्या खोज रहे हैं, जिसके कारण आपकी ये दुर्दशा हो गई है।”

सिद्धार्थ कहते हैं, मैं मुक्ति का मार्ग खोज रहा हूं , इसीलिए मैंने अन्न जल सब त्याग दिया है। वह स्त्री कहती है भला अन्न जल त्याग करके भी कोई खोज कैसे पूरी हो सकती है ? जब शरीर ही ना बचेगा तो मुक्ति मिलेगी किसे ? उस स्त्री की बात सुन मानों सिद्धार्थ की बंद आंखें खुल जाती हैं।

उन्हें यह बात समझ आ जाती है कि अब तक वे अपने शरीर को कष्ट देकर गलत कर रहे थे , क्योंकि अगर परम सत्य मिलेगा तो शरीर के साथ मिलेगा , शरीर के बिना नही। सिद्धार्थ उसी क्षण जल ग्रहण करते हैं और सुजाता के द्वारा लाई गई खीर भी खाते हैं।

खीर खाने के बाद सिद्धार्थ सुजाता से कहते हैं , तुम्हारी कही बात में बड़ा सत्य था। सुजाता मैं कठोर तप के चरम बिंदु तक गया , परंतु वहां मुझे कुछ भी नहीं मिला। मेरी इस भ्रांति को झुठलाने वाली तुम मेरी प्रथम गुरु हो।

समय बीतता है और सिद्धार्थ उस मंजिल के करीब पहुंच रहे होते हैं, जिसका इंतजार सिद्धार्थ को वर्षों से था। एक दिन सिद्धार्थ ध्यान करने के लिए कोई उचित स्थान खोज रहे होते हैं। खोजते खोजते उन्हें बहुत ही विशाल पीपल का वृक्ष नजर आता है।

उस वृक्ष को देखकर सिद्धार्थ तय करते हैं कि अब वे उस वृक्ष के नीचे बैठकर ही ध्यान करेंगे। सिद्धार्थ उस वृक्ष के नीचे बैठकर ध्यान करना शुरू कर देते हैं, और उस पेड के निचे ही  ध्यान करते वक्त उन्हें आत्म ज्ञान की प्राप्ति हो जाती है।

दोस्तो सिद्धार्थ ने जो वास्तव में जो अनुभव किया था उसे शब्दों में कहना असंभव है। बस इतना ही कहा जा सकता है कि अब सिद्धार्थ बुद्ध हो चुके थे। अगले दिन जब सुबह होती है , तो केवल सिद्धार्थ के लिए एक नई सुबह नहीं होती, बल्कि पूरे जगत के लिए एक नई सुबह होती है।

बिना मौसम के ही पेड़ों पर फूल खिलते हैं और पक्षी गीत गाते हैं। जिस वृक्ष के नीचे सिद्धार्थ बैठे थे, वह वृक्ष उनके ऊपर फूलों की वर्षा करता है। उस वृक्ष के चारों तरफ कमल के पुष्प खिल जाते हैं। बुद्ध अपनी आंखें खोलते हैं और अपने आसन से खड़े होते हैं।

और अपने चारों ओर देखते हैं तो सब कुछ बदल गया था , ना कोई प्रश्न था , ना कोई उत्तर था। बस हर जगह परमानंद था , एक गहन शांति थी। बुद्ध उस वृक्ष को प्रणाम करते हैं , जिसके नीचे बैठकर उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई थी।

असली ज्ञानी वही होता है , जिसे ज्ञान होने का भी अहंकार ना हो। जब सुजाता व उसके साथी सिद्धार्थ को भोजन देने के लिए आते हैं, तो वे यह देख कर चौंकते हैं कि ये वो सन्यासी नहीं हैं, जिसे वे भोजन देते आ रहे थे। वे देखते हैं कि सिद्धार्थ के चेहरे पर एक अलग सी चमक आ गई है।

उनके शरीर से एक अजीब सा प्रकाश निकल रहा है। और वे पूरी तरह से रूपांतरित हो गए हैं। सुजाता व उसके साथी नहीं जानते थे कि सिद्धार्थ अब सिद्धार्थ नहीं हैं, बल्कि बुद्ध बन गए हैं। वे डरते डरते बुद्ध के पास जाते हैं और उनसे पूछते हैं, की क्या आप हमारे ही जोगी है ना?

बुद्ध कहते हैं , हाँ मैं वही हूं , बस सोया हुआ था , परंतु अब जाग गया हूँ। सुजाता कहती है परंतु आपको हो क्या गया है? जो आपकी आभा इतनी प्रकाशमान हो गई है। बुद्ध कहते हैं जिस खोज में मैं 6 वर्षों से था, वह खोज अब पूरी हो चुकी है।

बोधि वृक्ष का इतिहास

यहां पर एक बात आपको जाननी चाहिए कि बुद्ध को बुद्ध नाम और जिस वृक्ष के नीचे बुद्ध ने आत्मज्ञान पाया था , उसे बोधि वृक्ष का नाम उरुविला के लोगों ने ही दिया था। बुद्ध का अर्थ होता है जो पूर्ण रूप से जाग चुका है।

गौतम बुद्ध का प्रथम उपदेश

दोस्तो सिद्धार्थ बुद्ध होने के बाद अपने प्रथम उपदेश में कहते हैं, की अज्ञान ही दुख, भ्रम और चिंता को जन्म देता है। लोभ , क्रोध , भय, ईर्ष्या इसी अज्ञान की संताने हैं। माया का खेल विपरीत का है, यानी अच्छे या बुरे का है, परंतु जो ज्ञानी है वह इस माया में नहीं फँसता।

क्योंकि वह किसी भी चीज की अति में नहीं पड़ता और ना तो वह अपने आपको तप के नाम पर अत्यधिक पीड़ा देता है और ना ही हर समय वासना में डूबा रहता है। बल्कि वह मध्य मार्ग चुनता है। जब हम माया के खेल को समझ जाते हैं, तब हमारे सभी दुख और सभी चिंताएं समाप्त हो जाती हैं।

तब हमारे भीतर प्रेम और स्वीकृति का भाव पैदा होता है, जिसके बाद हम किसी से भी घृणा नहीं करते। यहां तक कि ऐसे व्यक्ति से भी नहीं , जो हम से घृणा करता है।

गौतम बुद्ध के चार आर्य सत्य

एक जब तक सृष्टि रहेगी दुख मनुष्य के साथ छाया बनकर चलेगा।

दो दुख का कारण है, किसी वस्तु को स्वयं से पकड़कर रखना। जीवन के इस सत्य को न देखना कि जीवन में हर चीज क्षणभंगुर है।

तीन मुक्ति के लिए विवेक का जगाना आवश्यक है। स्वयं को केंद्रित करना सीखो, जो आए चाहे दुख की सूचना या आनन्द की परछांई। इन दोनों के बीच स्वयं को स्थिर रखो।

चार इस मार्ग पर दुख के बंधन टूटेंगे और परम सत्य की उपलब्धि होगी ।

बौद्ध धर्म के अष्टांगिक मार्ग क्या है?

दोस्तो बुद्ध के पहले पांचों शिष्यों में से एक शिष्य पूछता है की इस मार्ग का नाम क्या होगा ? बुद्ध कहते हैं इस मार्ग का नाम होगा अष्टांगिक मार्ग। और इसके माध्यम से सम्यक दृष्टि , सम्यक विचार , सम्यक वाणी , सम्यक कर्म , सम्यक जीवन व्यापन , सम्यक प्रयास , सम्यक चेतना और सम्यक समाधि संभव होती है।

बुद्ध कहते हैं मैं बुद्ध हूं और मैं स्वयं धर्म हूं। जो मार्ग मैंने खोजा है, वह समस्त मानव जाति के निर्माण का मार्ग बनेगा और यह गौतम बुद्ध का पहला उपदेश था, जो उन्होंने सारनाथ में दिया था।

गौतम बुद्ध का अंतिम उपदेश

बुद्ध कहते हैं आज मैं देख पा रहा हूं कि कैसे एक – एक बूंद मिलकर सागर बनता है। परमसत्य की इस संपदा को जन जन तक पहुंचाने के लिए मैं अकेला निकला था परंतु आज मेरे साथ अनेकों लोग जुड़ गए हैं।

ये तीन सत्य हैं, जिन्हें आपको जन – जन तक पहुंचाना है।

  1. उदार हृदय
  2. दयालु वचन
  3. सेवा में अर्जित जीवन और करुणा

यह तीन ही मंत्र है जो मानवता का नव निर्माण करेंगे। हर प्राणी से करुणा रखना धनी हो या निर्धन सबके जीवन में पीड़ा होती है। किसी के जीवन में कम तो किसी के जीवन में अधिक होता है।

मेरे प्रिय भिक्षुओं मैंने आज तक जो भी आप सब को सिखाया है। आप सबको उसका ध्यानपूर्वक अध्ययन करना, उसे अनुभव करना और सतत अभ्यास करना, स्वयं जांचना और परखना उसके बाद ही मानवता में बाँटना है।

किसी भी बात पर कभी भी सहजता से विश्वास मत करना, चाहे वह मेरे ही कहे हुए वचन ही क्यों ना हो। जब तक वह तुम्हारे विवेक और तुम्हारी व्यावहारिक बुद्धि से मेल ना खाएं।

फिर बुद्ध कहते है की मुझे उस भाग्य पर विश्वास नहीं है, जो मनुष्य के अच्छे या बुरे कृतियों से अछूता है। बल्कि मुझे उस भाग्य पर विश्वास है ,जो मनुष्य तब तक नहीं बना सकता जब तक कि वह स्वयं कर्म ना करे।

जिसकी निद्रा उड़ गई हो उसके लिए रात्रि बहुत लंबी है, जो थक गया है उसके लिए मंजिल बहुत दूर है, जिसने अंधे होकर जीवन जिया और जिसने धर्म का मार्ग नहीं समझा उसके जीवन में अनंत दुख है।

बुद्ध ने अपने अंतिम उपदेश को देने के बाद अपने सभी भिक्षुओं से कहते हैं , मेरे प्रिय भिक्षुओं यदि धर्म के मेरे मार्ग में कोई भी संदेह या कोई भी जटिलता है , तो यही सही समय है पूछने का और इस अवसर को ना गवाएं, जो भी प्रश्न आप में से किसी के मन में है, तो इसी समय मुझसे पूछ लो।

बाद में आपको ऐसा ना लगे कि मैं बुद्ध के समक्ष था , परंतु उनसे पूछ ना सका। बुद्ध तीन बार अपने वचन को दोहराते हैं परंतु कोई भी भिक्षु कोई प्रश्न नहीं पूछता। फिर बुद्ध अपने अंतिम शब्द कहते हैं कि मेरे प्रिय भिक्षुओं यह मेरी अंतिम दीक्षा है।

गौतम बुद्ध की मृत्य कब हुईं?

दोस्तों गौतम बुद्ध ने इसा पूर्व 483 में 80 वर्ष की आयु में उन्होंने अपने भिक्षुओ से कहा की में अब महापरिनिर्वाण लेने वाला हु, दोस्तों महापरिनिर्वाण यानि की अपने शरीर को त्यागना. फिर उसके बाद भारत के कुशीनगर गाव में उन्होंने महापरिनिर्वाण लिया.

बुद्ध को समझने के लिए क्या बुद्ध होना आवश्यक है !

अगर आप बुद्ध को पूरी तरह से समझना चाहते हैं तो आपको बुद्ध होना पड़ेगा और बुद्ध होने की यात्रा ध्यान से शुरू होती है। और ध्यान भी बुद्ध जैसा ही है, जिसे ना तो कहा जा सकता है और ना ही समझा जा सकता है, केवल अनुभव किया जा सकता है।

बुद्ध की हर शिक्षा का ज़ोर लोगों को ध्यान की तरफ आकर्षित करने पर है, उन्हें जागरुक करने पर है, परंतु दुर्भाग्य की बात यह है कि लोग बुद्ध को समझना तो चाहते हैं, लेकिन उन्हें अनुभव नहीं करना चाहते।

दोस्तो गौतम बुद्ध की जीवनी को लिखने के पीछे मेरा उद्देश्य यह है कि आप बुद्ध को केवल समझें ही ना बल्कि अनुभव भी करें । एक बहुत गहरी बात आपको बताता हूं, उसे आप ध्यान से समझने का प्रयास करिएगा।

आवश्यक यह नहीं है कि आप वह सुनें जो बुद्ध ने कहा है, बल्कि आवश्यक यह है कि आप वह न सुन लें जो बुद्ध ने नहीं कहा है। क्योंकि शब्दों में तो मिलावट हो सकती है और उन्हें अपनी मर्जी से बदला भी जा सकता है। लेकिन अनुभव में मिलावट करने का कोई तरीका नहीं है।

देखिए सवाल यह नहीं है कि जिस तरह से गौतम बुद्ध की जीवनी को प्रस्तुत किया गया है, क्या ये सारी घटनाएं बिल्कुल इसी तरह से घटी थीं या नहीं? बल्की सवाल यह है कि क्या हमने गौतम बुद्ध की जीवनी से कुछ ऐसा सीखा जो हमारे जीवन को पूरी तरह से रूपांतरित कर सकता है?

बुद्ध ने कहा है ध्यान करो क्यूंकि मैंने ध्यान से ही अपने दुखों से मुक्ति पाई है और बस बात खत्म हो गई। अब और कुछ सुनने की क्या आवश्यकता है? लेकिन लोग ध्यान नहीं करना चाहते और वे बुद्ध को और ज्यादा गहराई में समझना चाहते हैं।

यह कैसी बेवकूफी भरी बात है कि आप प्यास बुझाने के लिए पानी पीना नहीं चाहते बल्कि उसके बारे में जानकारी इकट्ठा करना चाहते हैं। जानकारी इकट्ठा करने से मन की प्यास नहीं बुझेगी बल्कि खुद के भीतर बुद्ध को अनुभव करने से मन की प्यास बुझेगी।

जैसे जैसे आप खुद को जानने लगेंगे, वैसे – वैसे आप बुद्ध को जानने लगेंगे और हां यह बात हमेशा याद रखना कि बुद्ध कहीं बाहर नहीं बल्कि आपके भीतर ही हैं।

अगर मैं बुद्ध की सभी शिक्षाओं का निचोड़ कर दूँ और आपको उन्हें एक लाइन में बताऊं तो, वह बस इतना है कि ध्यान करो क्योंकि वही आपके जीवन को बदल सकता है।

दोस्तों अगर आपको हमारे द्वारा लिखा हुआ “गौतम बुद्ध का जीवन परिचय और उनकी शिक्षाएं” आर्टिकल पसंद आया होंगा और आपके लिए भी उपयोगी साबित हुआ होगा? तो अपने दोस्तो और रिश्तेदारों के साथ गौतम बुद्ध की जीवनी को अवश्य शेयर कीजिए। और उसके साथ ही आपको गौतम बुद्ध की जीवनी कैसी लगी? यह नीचे कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके जरूर बताएं।

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गौतम बुद्ध के विचार – Gautam Buddha Quotes in Hindi

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