जरुर पढ़िए इस जीवन बदल देने वाली किताब की समरी

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नमस्कार मेरे प्यारे भाईयो और बहनों आप सभी का नॉलेज ग्रो मोटिवेशनल ब्लॉग पर स्वागत है। दोस्तो क्या आप ऐसी किताब की खोज में है, जो आपकी जिंदगी बदल देंगी, तो आप सही जगह पर आए हुए हैं।

दोस्तों यह Book Summary आपके लिए बहुत ही स्पेशल और जीवन को बदल देने वाली साबित होने वाली है। दोस्तो इसीलिए इस Life Changing Book Summary in Hindi आर्टिकल को आखिर तक जरूर पढ़िए।

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जीवन को बदल देने वाली किताब की समरी – Life Changing Book Summary in Hindi

दोस्तो आप मुझ पर विश्वास कीजिए, अगर आप इस Self Help Book Summary को आखिर तक पढ़ते हैं? तो आपका जीवन बदलना तय है, क्योंकि इस किताब में कुछ ऐसा लिखा हुआ है, जिसे पढ़कर और उसे अपने जीवन में अमल करके किसी भी इंसान का जीवन बदल सकता है।

इस बूक समरी को लिखने का कारण :

दोस्तों जब मैने इस जीवन बदल देने वाली किताब को पढ़ा, तो उसे पढ़कर मुझे बहुत बड़ी सीख मिली और मेरा जीवन एकदम से बदल गया। और जो कुछ भी मैने उस किताब से सीखा है, उसे में आज आपके साथ शेयर करने जा रहा हूं, ताकि आपका भी जीवन बदल जाए।

दोस्तो क्या आप अपना जीवन बदलने के लिए तैयार है? तो बिना समय को गवाएं चलिए शुरू करते हैं, Life Changing Book Summary in Hindi आर्टिकल को शुरू करते हैं।

Self Help Book Summary in Hindi

दोस्तो हमारे जीवन में कई घटनाएं घटती रहती हैं , कई अच्छी होती हैं तो कई बुरी। साधारणत : मानव इन घटनाओं को परमात्मा की इच्छा समझता है। जब उसके साथ कुछ अच्छा होता है, तो वह परमात्मा को धन्यवाद करता है, वही पर यदि उसके साथ कुछ बुरा हो जाए, तो वह सारा दोष परमात्मा पर डाल देता है।

दोस्तो इस संदर्भ में परमात्मा ने हमें यह शिक्षा दी है कि मनुष्य के जीवन में होने वाली घटनाओं का जिम्मेदार परमात्मा नहीं बल्कि स्वयं मनुष्य ही है। जैसे कर्म मनुष्य करता है, उसे वैसा ही फल मिलता है। परमात्मा किसी भी व्यक्ति के जीवन में हस्तक्षेप नहीं करते हैं।

Self Help Book Summary in Hindi

परमात्मा तो सुख के सागर हैं, भला वो किसी को दुःख क्यों देंगे। इस अति आवश्यक विषय को एक सुंदर कथा के माध्यम से इस किताब में दर्शाया गया है जिसमें कर्म सिद्धांत के गुह्य रहस्यों के साथ – साथ परमात्मा द्वारा प्राप्त अन्य शिक्षाओं को भी उजागर किया गया है।

इनमें प्रमुख हैं आत्मा का ज्ञान , परमात्मा का सत्य परिचय , राजयोग , कालचक्र इत्यादि। आशा है कि इस किताब को पढ़कर आपके जीवन में एक सकारात्मक परिवर्तन और विचारधारा में अनोखा बदलाव आयेगा। साथ ही आप यह भी जान जाएंगे कि “कैसे मनुष्य अपने कर्मों की कलम से अपना भाग्य लिखता है।”

Spiritual Book Summary in Hindi – बिरजू की कहानी

भारतवर्ष की औद्योगिक राजधानी मुम्बई शहर , जहां एक तबका उँची इमारतों में रहता है, तो दूसरा तबका झोंपड़पट्टियों में रहता है ऐसे ही एक झोंपड़पट्टी इलाके में एक छोटी सी झोंपड़ी में 7 वर्ष का बिरजू अपनी मां के साथ रहता था। उसके पिता की मृत्य बहुत पहले ही हो चुकी थी।

उसका सारा पालन पोषण उसकी मां ही करती थी। बिरजू की माँ समीप की ही एक निर्माणाधीन इमारत में मजदूरी कर पैसा कमाती थी। रोज़ की ही तरह आज भी बिरजू अपनी माँ के साथ उस निमार्णाधीन इमारत की ओर जा रहा था. इस बात से बेखबर कि आज उसके जीवन में एक बेहद दुखदायी घटना घटने वाली है।

बिरजू की माँ का मृत्यु

सड़क पार करते समय बिरजू को सड़क के दूसरी ओर एक गुब्बारे वाला दिखा , खुशी में वह अपनी माँ का हाथ छोड़ , ट्रैफिक से भरी सड़क पर दौड़ पड़ा। उसकी माँ भी बौखला कर उसे बचाने के लिए उसके पीछे भागने लगी। तभी एक ज़ोर की चीख के साथ सारा माहौल शांत हो गया।

यह चीख बिरजू की नहीं पर उसकी माँ की थी। बिरजू ने जब पीछे देखा तो उसकी माँ का मृत शरीर लहूलूहान हो सड़क पर पड़ा हुआ था। बिरजू रोते हुए अपनी माँ की ओर भागा। आज बिरजू बिलकुल अकेला हो गया था। इस अल्पायु में वह अनाथ हो गया था। उसकी एक शरारत के कारण उसकी माँ आज उसके साथ नहीं थी।

बिरजू की माँ का मृत्यु
image Credit: brahmakumaris.com – Book Summary in Hindi

अब इस दुनिया में उसका कोई न था। जहां बिरजू कभी बहुत शरारती हुआ करता था, वहीं अपने माता पिता के देहांत के बाद वह बेहद ही उदास रहने लगा । जीवन उसके लिए अभिशाप बन गया था। और अब उसे स्वयं ही अपना पेट भरना था।

बेसहारा बिरजू कई दिनों तक अपनी झोंपड़ी में उदास बैठा रहा , इतने दिनों तक उसने कुछ खाया नहीं। पर ऐसा कब तक चलता , अखिर अपना पेट भरने के लिए वह एक चाय की दुकान पर काम करने लगा। उस दुकान का मालिक बहुत ही गरम मिजाज़ का था , छोटी – छोटी बातों पर वह बिरजू को डांटता था और मारता था।

बिरजू और उसका मालिक
image credit: brahmakumaris.com – Book Summary in Hindi

एक दिन गलती से बिरजू के हाथों एक चाय का गिलास टूट गया। फिर उसके मालिक ने उसकी बेरहमी से पिटाई की। नन्हा बिरजू क्या करता , केवल अपनी गलती की माफी ही मांग सकता था। ऐसे ही उसका सारा बचपन गुलामी में ही बीता।

एक रात बिरजू जब अपने घर लौटा तो उसने देखा कि उसके पड़ोसी ने उसकी झोंपड़ी पर कब्जा कर लिया है। बिरजू रोते हुए उस व्यक्ति से दया की भीख मांगने लगा। पर उस व्यक्ति ने तो अपना मन बना लिया था। उसने बिरजू को बहुत पीटा और डरा धमका कर वहां से भगा दिया।

Self Help Book Summary in Hindi

अब बिरजू बेघर हो गया था और फुटपाथ पर ही रहने लगा। बिरजू को सभी मनहूस समझते थे, क्योंकि उसके पैदा होने के कुछ दिन बाद ही उसके पिता की मृत्यु हो गई थी और छोटेपन में ही उसकी माता गुज़र गई थी। कोई भी उससे दोस्ती करना पसंद नहीं करता था।

बिरजू के जीवन में हर दिन कोई नई मुसीबत आ जाती थी। ऐसी दुख भरी ज़िन्दगी के कारण वह बहुत चिड़चिड़ा हो गया था। हरेक दिन बिरजु अपने बुरे भाग्य का रोना रोता रहता और भगवान को कोसता रहता था। उसे तो यही लगता था कि उसके साथ जो कुछ भी हो रहा है, उसका जिम्मेदार भगवान ही है। और ऐसे ही बिरजू अपना जीवन काटता रहा।

धीरे – धीरे समय बीतता गया और नन्हा बिरजू अब जवान हो चला था। वक्त की ठोकरे खाते खाते उसे मुसीबतों की आदत सी हो चली थी। फिर भी उसने जैसे – तैसे करके अपने रहने के लिए एक झोंपड़ी बनाई। साथ ही कमाई के लिए अपना एक चाय का ठेला लगाया।

चिड़चिड़ा स्वभाव होने के कारण उसकी दुकान पर बहुत कम लोग आते थे। जिस कारण उसकी कमाई भी बहुत कम होती थी। इसका दोष भी बिरजू अपने बुरे भाग्य को ही देता था। बिरजू का विवाह रमा नाम की युवती से हो गया। रमा एक बहुत ही गुस्सैल और चिड़चिड़े स्वभाव की महिला थी और वह छोटी – छोटी बातों पर क्रोधित हो जाती थी।

बिरजू का विवाह
image credit: brahmakumaris.com (Book Summary in Hindi)

हर दिन वह बिरजू को उसकी गरीबी के लिए कोसती रहती थी। बिरजू अपनी पत्नी के दुर्व्यवहार से सदा उदास रहता था। शायद ही कोई ऐसा दिन होगा जब दोनों में झगड़ा न हुआ हो। धीरे – धीरे बिरजू को शराब पीने की आदत लग गई। जितना वो कमाता था वह सब शराब पीने में उड़ा देता था, इस कारण उसकी पत्नी उस पर और गुस्सा होती थी।

शराब ने उसका जीवन और ही बिगाड़ दिया था। हर रोज़ वह देर रात को घर आता और अपनी पत्नी से झगड़ा करता। इतना ही नहीं वह शराब के नशे में कई बार अपनी बस्ती वालों से भी झगड़ लेता था, जिस कारण उसे कई बार जेल भी जाना पड़ा था। फिर भी उसने शराब पीना छोड़ा नहीं।

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बचपन से लेकर अब तक उसका जीवन बहुत दुःख में बीता था। शायद ही कोई ऐसा दिन था जब वह मुस्कुराया था। सारी बस्ती वाले उसे अब भी मनहूस ही समझते थे। एक दिन की बात है कुछ बुरे व्यक्ति बिरजू के ठेले पर चाय पीने आए। उन्होंने बिरजू से खीछ कर कहा कि वो उसे चाय पिलाए।

बिरजु ने उन्हें चाय पिलाई और चाय पीने के बाद जब बिरजू ने उनसे चाय का मूल्य मांगा, तब वे व्यक्ति बहुत गुस्सा हो गए और बिरजू के साथ मनमानी करने लगे। बिरजू भी जोश में आकर अपना होश खो बैठा और उन सब के साथ उल्टा सुल्टा बोलने लगा। इस पर वे लोग और ही बिगड़ गए।

बिरजू को गुंडे मारना
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उनमें से एक ने बिरजू का ठेला पलट दिया और सारा सामान सड़क पर फेंक दिया। जब बिरजू उनसे लड़ने लगा तब उन सबने मिलकर उसकी जम के पिटाई कर दी। थोड़ी देर बाद जब बिरजू अधमरा हो गया, तब उन्होंने उसे पीटना बंद किया। इसके बाद वे सब उसे धमकी देकर वहां से चले गए।

सारे बाज़ार के लोग यह तमाशा देखते रहे पर किसी ने भी बिरजू की मदद नहीं की। थोड़ी देर के बाद बिरजू को होश आया। उसने अपना सारा सामान एक किनारे रख , अपने घर की ओर चलना शुरू किया। शाम होते – होते वह अपने घर पहुँच गया और कराहते हुए उसने अपनी पत्नी को बुलाया।

बिरजू की पत्नी ने उसे सांत्वना देने के बजाए डांटना शुरू कर दिया। सारी बस्ती के लोग उन दोनों के झगड़े को देख मज़ा ले रहे थे। अब बिरजू और ही उदास हो गया। जिस एक व्यक्ति से उसे सांत्वना की आशा थी, उसने भी उसे ठुकरा दिया और बिरजू को अब अपना जीवन बहुत दुखदायी लगने लगा था।

वह क्रोधित होकर आसमान की ओर देखने लगा और भगवान को अपने साथ हुए अन्याय का दोषी ठहराने लगा और उसने भगवान को बहुत भला बुरा कहा। उसने भगवान को कोसते हुए कहा कि हे भगवान , सारा जीवन उसने किसी का कुछ भी बुरा नहीं किया परन्तु हमेशा उसके साथ ही बुरा हुआ है।

बिरजू के सपने में परमात्मा का आना

भगवान उसके साथ ही बुरा क्यों कर रहा है। इसके बाद उदास मन से वह झोंपड़ी के एक कोने में जा कर रोते – रोते सो गया। देर रात जब चारों ओर सन्नाटा था तभी बिरजू को एक अलौकिक आवाज़ सुनाई दी , वह नींद से जाग गया। जब उसने सामने देखा तो उसे चारों ओर प्रकाश ही प्रकाश दिखाई दिया।

बिरजू का आसमान की और देखना
image credit: brahmakumaris.com

वास्तव में वह एक अलग ही लोक में पहुंच गया था। चारों ओर दिव्य प्रकाश और अलौकिक शान्ति थी। बिरजू को कुछ भी समझ में ही नहीं आ रहा था कि वह यहां पर कैसे पहुंच गया। वह मन ही मन अपने आप से बातें करने लगा कि भला वो कहां आ गया है , कहीं वो मर तो नहीं गया।

Self Help Book Summary in Hindi

वह अपने शरीर को छूकर देखने लगा। सब कुछ ठीक – ठाक था। तभी बिरजू को फिर से वही अलौकिक आवाज़ सुनाई दी। बिरजू ने चारों ओर घूमकर देखा पर उसे उस लोक में उसके सिवाए कोई भी दूसरा व्यक्ति नज़र नहीं आया। वह अंदर से बहुत ही डर गया था। डरते हुए उसने चिल्ला कर पूछा कौन है ? – तब उसके सामने एक दिव्य ज्योति प्रकट हुई ।

 

उस दिव्य ज्योति से अलौकिक प्रकाश सभी दिशाओं में फैल रहा था। बिरजु कुछ देर के लिए उस अलौकिक अनुभूति में ही खो गया। वह दिव्य ज्योति और कोई नहीं परंतु स्वयं परमात्मा ही थे। परमात्मा बिरजू के साथ वार्तालाप करने लगे। परमात्मा : मेरे मीठे बच्चे मैं तुम्हारा पिता हूँ।

बिरजू : तुम मेरे पिता कैसे हो सकते हो ? मेरे पिता तो कई वर्ष पूर्व ही मर चुके हैं। मुझे बेवकूफ मत बनाओ। सच – सच बताओ तुम कौन हो। परमात्मा : मैं तुम्हारा पिता ही हूँ मेरे बच्चे। जो मर चुके हैं वो तुम्हारे शरीर के पिता थे। मैं तो तुम्हारी आत्मा का पिता हूँ। मैं सारे जग का पिता हूँ और सभी मुझे परमपिता परमात्मा कहते हैं।

बिरजू का भगवन से बाते करना
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बिरजू : ( गुस्से में ) अच्छा तो आप ही भगवान हो। मैं आपसे बहुत नाराज़ हूँ। आपने मुझे सारा जीवन दु:ख ही दु:ख दिया है, बचपन से लेकर अब तक हमेशा मेरे साथ बुरा ही किया है। भला मैंने किसी का क्या बिगाड़ा है, जो आप मुझे इतना दु:ख दे रहे हो ? मुझ पर अब थोड़ा रहम करो।

परमात्मा : ( मुस्कुराते हुए ) मैं तो तुम्हारा पिता हूँ। भला मैं तुम्हें दुःख क्यों दूंगा ? मैं तो सुख का सागर हूँ। दुखहर्त्ता सुखकर्ता हूँ। मैं तो सब के दु:ख हर कर सारे विश्व को सुख ही देता हूँ। मैं किसी को भी कभी दु ख नहीं देता मेरे बच्चे।

बिरजू : ( उदास मन से ) आप ही तो सारे विश्व को चलाने वाले हो , आप ही सभी को सुख – दुख देते हो, यदि आप मुझे दुःख नहीं दे रहे, तो किस कारण मुझे इतने दुःखों का सामना करना पड़ रहा है?

Self Help Book Summary in Hindi

परमात्मा : ( प्रेम से ) मेरे बच्चे , सुख और दुख यह तो कर्मों का फल है। इसमें मैं कुछ नहीं करता। जो जैसा कर्म करता है , उसे वैसा ही फल मिलता है।

बिरजू : परन्तु मैंने तो सारा जीवन किसी को भी इतना दुःख नहीं दिया , न ही कोई बड़े पाप कर्म ही किया है। फिर मुझे दुःख क्यों मिल रहा है ? बचपन से लेकर अब तक मुझे दुःख के सिवाए और कुछ भी नहीं मिला।

परमात्मा : बच्चे तुम केवल अपने इस वर्तमान जन्म को ही देख रहे हो परन्तु जो तुम्हारे पूर्व जन्मों के कर्म थे , यह उनका फल है।

बिरजू : पूर्व जन्म ! यह क्या होता है ? क्या मेरे इस जन्म के पहले भी दूसरा कोई जन्म था ?

अपने पूर्व जन्म के राज जानना
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परमात्मा : पूर्व जन्मों के राज़ को जानने से पहले तुम्हें यह जानना बहुत ही ज़रूरी है कि वास्तव में तुम कौन हो ?

बिरजू : मुझे मालूम है कि मैं कौन हूँ। मैं बिरजू हुँ , मैं मुम्बई शहर में चाय बेचता हूँ और मैं इस दुनिया का सबसे बदकिस्मत इंसान हूँ।

परमात्मा : यही सबसे बड़ी गलती तुम कर रहे हो, जो अपने को शरीर समझते हो। वास्तव में इस दुनिया में जितने भी मनुष्य हैं , वे सभी शरीर नहीं हैं परन्तु शरीर में विराजमान अविनाशी ज्योति आत्मा हैं।

बिरजू : आत्मा !

परमात्मा : हां आत्मा। तुम एक आत्मा हो।

बिरजू : यह आत्मा क्या होती है ?

परमात्मा : आत्मा एक चैतन्य दिव्य उर्जा है जो इस पूरे शरीर को चलाती है। आत्मा ही शरीर के द्वारा अच्छे और बुरे कर्म करती है और आकार में आत्मा एक सूक्ष्म बिंदू है.

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आत्मा अविनाशी है उसकी कभी मृत्यु नहीं होती , मरता तो केवल शरीर है जब शरीर पुराना हो जाता है या किसी चोट के कारण खराब हो जाता है तब आत्मा उस शरीर को छोड़ दूसरा शरीर धारण करती है।

आत्मा द्वारा पुराने शरीर को छोड़ने की प्रक्रिया को मृत्यु कहते हैं और नए शिशु शरीर को धारण करने को जन्म कहते हैं। एक के बाद एक आत्मा कई जन्म लेती है इसे ही पुनर्जन्म कहते हैं। इस जन्म के पूर्व भी तुम्हारे कई जन्म हो चुके हैं ।

बिरजू : अच्छा तो क्या आप मुझे बता सकते हैं कि अपने पूर्व जन्म में मैं क्या था और मेरे किन कर्मों के कारण आज मुझे इतने दुःख भोगने पड़ रहे हैं।

बिरजू को उसके पूर्व जन्म का साक्षात्कार कराना

परमात्मा : हाँ हाँ क्यों नहीं। उन पूर्व जन्मों के कर्मों का साक्षात्कार कराने के लिए ही तो मैं तुम्हारे समक्ष आया हूँ। परमात्मा बिरजू को उसके पूर्व जन्म का साक्षात्कार कराते हैं। वे उसे भूतकाल में एक नगर में ले जाते हैं।

बिरजू को एक नगर में ले जाना
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बिरजू के सामने एक बड़ा सा महल था। उसने अपने जीवनकाल में कभी इतना भव्य महल नहीं देखा था, कुछ समय के लिए वह यहां वहां देखने लगा। फिर उत्सुकतावश उसने परमात्मा से पूछा।

बिरजू : प्रभु ये आप मुझे कहाँ ले आए हैं ?

परमात्मा : मैं तुम्हें तुम्हारे पूर्व जन्म का साक्षात्कार करा रहा हूँ। इस समय हम उस नगर में हैं, जहां तूमने अपना पिछला जन्म बिताया था। परमात्मा बिरजू को उस महल के भीतर लेकर जाते हैं। महल में चारों ओर काफी पहरा था।

बिरजु जिस किसी व्यक्ति को देखता वह यह सोचने लगता कि शायद सामने वाला व्यक्ति वह खुद है वह अपने पूर्व जन्म के व्यक्ति को देखने के लिए बहुत उत्सुक था। तभी महल के भीतर से कइयों की दुःख भरी चीखें सुनाई देने लगी। बिरजू उन चीखों को सुन कर काफी सहम गया और परमात्मा से पूछ बैठा।

बिरजु : ये चिल्लाने की आवाज कहां से आ रही हैं ?

परमात्मा : ये दर्दभरी आवाज़े इस महल के बंदीगृह से आ रही हैं ।

परमात्मा बिरजू को बंदीगृह की ओर ले जाते हैं। बंदीगृह में कैदियों को बुरी तरह से पीटा जा रहा था। सारे वातावरण में उनकी चीखें गूंज रही थी और सभी बंदी सैनिकों से क्षमा की भीख मांग रहे थे।

बिरजू लोगो को बंदी गृह में पिटते हुए देखना
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बिरजू : इन्हें किस अपराध के कारण पीटा जा रहा है ?

परमात्मा : इन्होंने अपने क्रूर राजा राजवीर सिंह के प्रति विरोध का प्रदर्शन किया , इस पर इनके राजा ने इन्हें बंदी बना लिया और राजा के खिलाफ़ जाने की सजा दे दी है।

बिरजू : ये तो इन निर्दोषों पर सरासर अत्याचार है। आप ये अत्याचार रोकते क्यों नहीं ?

परमात्मा : यह मेरा काम नहीं ये सब कर्मों की गुह्य गति है। जो जैसा कर्म करते हैं, उन्हें वैसा फल मिलता है और जो इन पर अत्याचार कर रहा है, उसे भी उसका फल अवश्य मिलेगा।

बिरजू : इसका अर्थ है कि इन सब कैदियों ने भी कभी कुछ ऐसे कर्म किये होंगे, जिनका फल आज उन्हें मिल रहा है। परमात्मा सही समझा। मनुष्य को अपने कर्मों की सज़ा इस धरती पर ही मिल जाती है। या तो इस जन्म में या फिर उसके अगले जन्मों में।

बिरजू : प्रभु , आप मुझे यहां अपने पूर्व जन्म का साक्षात्कार कराने लाये थे। आखिर इन सब में से मैं कौन हूँ ?

परमात्मा : ( हँसते हुए ) अपने पूर्व जन्म को देखने के लिए काफी उत्सुक हो। पर उससे पहले क्या तुम उस राजा को नहीं देखना चाहोगे, जो इन निर्दोषों पर अत्याचार कर रहा है।

बिरजू : ठीक है, जैसी आपकी मर्जी।

परमात्मा बिरजू को फिर एक दूसरे कक्ष में ले जाते हैं, जहाँ पर राजा राजवीर सिंह शराब के नशे में अपने कुछ मंत्रियों के साथ बैठा था और एक महत्वपूर्ण विषय पर बात कर रहा था। बिरजू : ये आप मुझे कहाँ लेकर आये हैं और ये लोग कौन हैं ?

परात्मा बिरजू को एक कक्ष्य में ले जाना
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परमात्मा : यह उस राजा का कक्ष है। वहाँ बैठा है वह राजा और साथ में बैठे हैं उसके कुछ खास मंत्री। तभी राजा का दास , राजा के लिए शराब लेकर आता है। राजा नशे में था उसने बिन बात के उस दास को डाँटना शुरू कर दिया, वह दास बस उसकी डाँट सुनता रहा और फिर वहाँ से चला गया।

बिरजू : अरे यह कितना क्रूर राजा है , बिना वजह उसने उस बेचारे सेवक को डाँट दिया। परमात्मा : शराब के नशे में यह राजा अपना विवेक खो चुका है। शराब एक ऐसी चीज़ है, जो अनजाने में भी किसी से विकर्म करा देती है। तुम भी तो शराब के नशे में कई गलत काम कर देते हो।

इसलिए मेरी तुमसे ये विनती है कि शराब से अपने को दूर ही रखो। शराब से फायदा तो कुछ नहीं पर नुकसान बहुत है। बिरजू : ठीक है , आपकी इस शिक्षा को मैं सारे जीवन ध्यान में रखूँगा। परन्तु यह तो बताइये आप ने मुझे यह दृश्य क्यों दिखाया ?

परमात्मा : वो दास जो अभी अभी यहाँ से गया क्या तुमने उसे पहचाना ? बिरजू : नहीं , मैंने उसे पहले कभी नहीं देखा। परमात्मा : वो वही चाय की दुकान का मालिक है, जिसके यहां तुम कभी काम किया करते थे।

बिरजू : क्या यह वही चाय की दुकान का मालिक है, जो हर पल मुझे डाँटता रहता था और बेवजह मेरी पिटाई करता था। इस पापी के साथ तो ऐसा ही होना चाहिए । परमात्मा : ( समझाते हुए ) इतने उत्तेजित न हो , किस के साथ क्या होना चाहिए और क्या नहीं , इसका फैसला तुम विधि के विधान पर छोड़ दो।

जो जैसा करेगा उसे उस कर्म का फल तो अवश्य ही मिलेगा। पर उसके पीछे तुम अपनी मनः स्थिति को क्यों बिगाड़ते हो। बिरजू : ठीक है। फिर परमात्मा और बिरजू , राजवीर सिंह और उसके मंत्रियों के बीच चल रही वार्तालाप को सुनने लगते हैं।

राजा और मंत्री की वार्तालाप को सुनना
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वे सभी नगर में हुए जनआंदोलन के विषय में बात कर रहे थे। मंत्री : महाराज , राज्य के सभी लोगों को आपके खिलाफ भड़काने का कार्य जिन युवाओं ने किया था , उन्हें हमने अपनी गिरफ्त में ले लिया है। अब आप ही बताएँ कि उनके साथ क्या किया जाए।

राजा : अच्छा किया जो उन नीच लोगों को पकड़ लिया। इन सबको हमारे खिलाफ जाने की कड़ी से कड़ी सजा मिलनी चाहिए, जिससे आइंदा कोई हमारे खिलाफ जाने की हिम्मत भी न करें। मंत्री : सही कहा महाराजा हमें इन लोगों को मृत्युदंड दे देना चाहिए।

राजा : ठीक है, तो इन सबको कल के दिन सारे नगरवासियों के सामने फांसी लगा दी जाए और साथ ही सारे नगरवासियों को यह चेतावनी भी दे दी जाए, कि अगर किसी और ने भी हमारे खिलाफ जाने की हिम्मत की तो उसका हश्र भी ऐसा ही होगा ।

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बिरजू : अरे रे ! ये राजा कितना क्रूर और नृशंस है। इसने बिना सोचे समझे उन लोगों को मृत्युदंड दे दिया। ऐसे पता नहीं इसने कितनों को मृत्युदंड दिया होगा। परमात्मा पर क्या तुम जानते हो जिन लोगों को यह दंड दे रहा है , वे कौन लोग हैं ? बिरजू नहीं , मैं उन्हें नहीं जानता। परमात्मा : ये वही लोग है जिन्होंने कल तुम्हें बुरी तरह से पीटा था और तुम्हारा ठेला पलट दिया था।

बिरजुः क्या ! ये वही लोग है। इन्हें तो इससे भी कड़ी सजा मिलनी चाहिये। परमात्मा : शांत हो जाओ बिरजू , अभी अभी तो मैंने तुम्हें यह शिक्षा दी कि जो जैसा कर्म करेगा उसे उसका फल स्वत : मिल जाता है। उसकी चिंता करना तुम्हारा काम नहीं ।

बिरजू पर इन्होंने मेरे साथ बहुत बुरा किया है। मैं उनका अत्याचार कैसे भूल सकता हूँ। परमात्माः इन सब का रहस्य तुम्हें थोड़ी देर में समझ आ जायेगा। इसलिए अभी तुम शांत रहो। इसके बाद परमात्मा बिरजू को उस महल के बंदीगृह के ऐसे कक्ष में ले जाते हैं जहां पर एक कैदी को रखा गया था।

बिरजू अपने पूर्व जन्म के बड़े भाई को देखना
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उस कैदी की दशा बहुत दयनीय थी और उसका शरीर बहुत ही कमज़ोर और निर्बल हो चुका था। उस कैदी को बेड़ियों में बांधा गया था। उसके चहरे पर एक मायूसी – सी थी जिससे ऐसा प्रतीत हो रहा था कि वो अपने जीवन से बहुत तंग हो चुका था।

बिरजू हे प्रभु , यह व्यक्ति कौन है ? इसकी दशा तो बहुत ही दयनीय है। परमात्मा : यह व्यक्ति राजा राजवीर सिंह का बड़ा भाई है। बिरजू : यह राजा का भाई होते हुए भी बंदीगृह में क्या कर रहा है।

परमात्मा : वास्तव में बड़ा राजकुमार होने के नाते राज सिंहासन पर इसका अधिकार था और यह उसके काबिल भी था। पर राजवीर सिंह ने एक षडयंत्र रच कर अपने बड़े भाई को देशद्रोही बता कर बंदी बना दिया और इसके बाद वह खुद राजा बन गया।

बिरजू : यह तो इस व्यक्ति के साथ बहुत ही बुरा हुआ। यह राजा तो सचमुच बड़ा ही निर्दयी और क्रूर है। इसने तो अपने भाई को भी नहीं छोड़ा। परमात्मा : अब क्या तुम यह बता सकते हो कि यह व्यक्ति वर्तमान समय किस रूप में है ?

बिरजू : नहीं मैं इसको भी नहीं जानता हूँ। कौन है ये व्यक्ति ? परमात्मा : यह तुम्हारी पत्नी रमा का पूर्व जन्म है। बिरजू : अच्छा तो यह रमा की आत्मा है। इसके साथ तो सचमुच बहुत ही बुरा हुआ और शायद इसलिए वह बहुत चिड़चिड़ी और गुस्सैल है और बेवजह मुझसे झगड़ती रहती है।

पर रमा तो एक स्त्री है फिर वह अपने पूर्व जन्म में पुरुष कैसे ?

परमात्मा : मेरे बच्चे , आत्मा का कोई लिंग नहीं होता। आत्मा कभी स्त्री का जन्म लेती है, तो कभी पुरुष का भी जन्म लेती है। तुमने भी कई बार पुरुष जन्म लिया है, तो कई बार स्त्री जन्म भी लिया है ।

बिरजू को अपने पूर्व जन्म का साक्षात्कार होना.

परमात्मा : ठीक है अब तुम मुझे यह बताओ कि अभी तक हमने जिन भी लोगों को देखा है उनमें से तुम कौन हो?

बिरजू : जिस प्रकार आप मुझे भिन्न – भिन्न व्यक्तियों से मिला रहे हैं , उन सब को देखकर तो ऐसा ही लगता है कि मैं ही राजा राजवीर सिंह हूँ।

बिरजू को अपने पूर्व जन्म का साक्षात्कार होना.
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परमात्मा : सही समझा । अपने पूर्व जन्म में तुम ही राजवीर सिंह थे।

बिरजू : क्या मैं सचमुच इतना क्रूर और अत्याचारी था। मैंने तो काफी बुरे कर्म किये हैं।

परमात्मा : अभी तक तो तुमने अपने पूर्व जन्म के केवल कुछ ही दृश्य देखे हैं। तुमने इस जन्म में सत्ता पाकर इतने अत्याचार किये हैं जिनकी गिनती बहुत बड़ी है।

बलपूर्वक तुमने कइयों को बंदी बनाया। कइयों की ज़मीन जायदाद अपने कब्जे में ले ली, और गरीबों से उनकी क्षमता से अधिक कर वसूल किया। अब तुम्हें समझ आया कि किस कारण से तुम्हें इस जन्म में इतने दुःख मिल रहें हैं। जिस तरह से अपने पूर्व जन्म में तुमने सारे समाज को दु ख दिया है , ऐसे ही इस जन्म में सारा समाज तुम्हें दु:ख दे रहा है।

बिरजू : आपने सही कहा ये वर्तमान जीवन तो मेरे पूर्व जन्मों के बुरे कर्मों का ही फल है। सच में मैंने राजा बन कर काफी बुरे कर्म किये हैं,  मैंने दूसरों पर बहुत अत्याचार किए हैं।

बिरजू को अपने पूर्व जन्मों के कर्मों को देख आत्मग्लानि महसूस होना

अपने इन पूर्व जन्मों के कर्मों को देख मुझे बहुत ही आत्मग्लानि महसूस हो रही है, और मुझे अपने इस जन्म से घृणा होने लगी है । परमात्मा : जो बीत गया अब उसके बारे में सोचने से कोई लाभ नहीं है, बेहतर होगा कि तुम अपने भविष्य को सुधारने के लिए वर्तमान जीवन को अच्छा बनाओ और श्रेष्ठ कर्म करो।

परमात्मा : मेरे मीठे बच्चे , अब तो तुम इस बात को स्वीकारते हो कि इस जन्म में तुम्हारे साथ जो भी बुरा हो रहा है, उसके जिम्मेदार तुम स्वयं ही हो। मैंने तुम्हारे साथ कभी कुछ बुरा नहीं किया और न ही मैंने तुम्हें कभी दुःख ही दिया है। इतना सुनते ही बिरजू की आँखों में आंसू आ गए।

बिरजू को अपने कर्मो पर पश्चाताप होना
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अब उसे अपने से हुई गलती का एहसास हो चुका था और वह परमात्मा के समक्ष झुक गया और उनसे माफी मांगने लगा। बिरजू : मुझे क्षमा कर दीजिए भगवन जो मैंने आप पर इतना बड़ा आरोप लगाया मुझे अपने कर्मों का ज्ञान नहीं था।

मैंने सारा जीवन आपको ही अपने भाग्य के लिए जिम्मेदार ठहराया। मुझसे बहुत बड़ा पाप हो गया है। कृपा करके मुझे इस महापाप के लिए क्षमा करें। मैं आपको यह वचन देता हूँ कि आगे से मैं कभी भी अपने दुर्भाग्य का दोष आप पर या किसी और पर नहीं डालूंगा।

spiritual book summary in hindi

परमात्मा : मेरे बच्चे , मैने तो तुम्हें कभी दोषी नहीं माना। फिर भी मैं तुम्हें क्षमा करता हूँ । बिरजू : हे प्रभु आप सच में बड़े ही रहमदिल हैं। आप दया के सागर हैं और मैं आपका बहुत – बहुत आभारी हूँ, जो आपने मुझे इतना श्रेष्ठ मार्ग बताया , नहीं तो न जाने मैं अपने जीवन में और कितने ही बुरे काम कर बैठता।

परमात्मा : भले ही तुम्हें अब कर्मों का ज्ञान हो गया है फिर भी तुम्हें अपने पूर्व जन्म के कर्मों का फल तो भोगना ही होगा । बिरजू : आपके साथ इस मिलन के बाद तो मेरा जीवन धन्य धन्य हो गया है। आपने अब मुझमें इतनी शक्ति भर दी है, जो मैं अब अपने जीवन की हरेक चुनौती का सामना करने के लिए तैयार हूँ।

बिरजू को अपने दुखों का कारन पता चल जाना

बिरजू : हे प्रभु , मुझे यह तो पता चल गया कि किन कारणों से मुझे इतना दुखदाई जीवन मिला, पर क्या आप मुझे यह बता सकते हैं, कि किन कारणों की वजह से मुझे एक राजा का जन्म मिला था ?

परमात्मा : जैसे तुम्हारे बुरे कर्मों के फलस्वरूप तुम्हें इतना दुःखी जीवन मिला , उसी प्रकार तुमने अपने इस जन्म के पूर्व जन्मों में काफी पुण्य कर्म किये थे उसी के फलस्वरूप तुम्हें एक राजा का जीवन मिला।

पिछले जन्म में एक महादानी पुरुष का होना पता चलना
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इसके पूर्व जन्म में तुम एक महादानी पुरुष थे और तुमने अपने उस जीवन में अनेकों की सहायता की थी फलस्वरूप उन सभी से तुम्हें बहुत दुआएँ मिली। उन श्रेष्ठ कर्मों के कारण ही तुम्हें एक सुखदाई जीवन मिला।

बिरजू : मेरे मन में यह सवाल उठ रहा है कि यदि मैं इतना अच्छा मानव था तो इसके अगले जन्म में इतना बुरा व्यक्ति कैसे बन गया।

परमात्मा : वास्तव में इस जन्म में बाल्यावस्था से ही तुम्हें गलत मित्रों का संग मिला। जैसा संग होता है वैसा रंग लगता है। फलस्वरूप बचपन से ही तुम्हारा आचार – व्यवहार बिगड़ने लगा। तुम्हें सब पर रोब जमाने की आदत पड़ गई जिससे तुम इतने अभिमानी , क्रोधी और क्रूर बन गए।

बिरजू : क्या कोई ऐसा उपाय नहीं जिससे आत्मा अपने हर जन्म में सुखी रहे । परमात्माः सुख के बाद दुःख और दुःख के बाद सुख मिलना तो निश्चित है। इस विश्व में कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं है, जो सदा सुखी हो और न ही कोई ऐसा व्यक्ति ही है, जो सदा दु : खी हो ।

“सुख और दु : ख जीवन के दो पहलू हैं और इन्हें हर मनुष्य को भोगना ही पड़ता है.”

बिरजू : परंतु कोई तो ऐसा उपाय ज़रूर होगा जिससे आत्मा सदा सुखी रहे। परमात्मा : उपाय है , कर्मों की गुह्य गति का ज्ञान।

यदि मनुष्य को हर जन्म में कर्मों का ज्ञान रहे और वह सदैव अच्छे कर्म करता रहे, तो वह सदा सुखी रह सकता है। पर अगर उसे कर्म और विकर्म क्या होते हैं , यह नहीं मालूम तो वह अपने जीवन में अच्छे कर्मों के साथ – साथ विकर्म भी कर बैठता है, जिसका उसे फल भोगना ही पड़ता है।

अछे कर्म और बुरे कर्म
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बिरजू : हे ईश्वर क्या आप मुझे यह बताएंगे कि किन कर्मों को हम अच्छे कर्म कह सकते हैं, और कौन से कर्म विकर्म गिने जाते हैं ? परमात्मा: यह तुमने बहुत अच्छा प्रश्न किया। वास्तव में जिस कर्म से स्वयं को और दूसरों को सुख मिले उन कर्मों को सतकर्म कहा जाता है।

दूसरी ओर कोई भी ऐसा कर्म जिससे किसी को जाने या अनजाने में भी दुःख पहुंचे उसे विकर्म कहते हैं। जैसे यदि कोई किसी को मारता पीटता है या किसी भी प्रकार से दुःख देता है तो वह विकर्म कहलाता है, वही कोई व्यक्ति किसी की मदद करता है , सब का भला करता है तो वह पुण्य कहलाता है।

यहां तक की मन से भी किसी के प्रति बुरे संकल्प करना या मुख से किसी के लिए कुछ बुरा कहना भी विकर्म ही होता है। बिरजू : और किन आधार से कोई व्यक्ति सदा अच्छे कर्म कर सकता है। परमात्मा : सही ज्ञान ही व्यक्ति को सही मार्ग प्रदर्शित करता है।

ज्ञान से ही व्यक्ति के जीवन में आदर्श आते हैं और ये श्रेष्ठ आदर्श ही उसे सतकर्म करने की प्रेरणा देते। वास्तव में ज्ञान से ही कोई भी व्यक्ति अपना जीवन ऊंच बना सकता है। बिरजू : क्या ऐसा नहीं हो सकता कि हमने यदि एक जन्म में कुछ अच्छे कर्म किए हैं, तो उसका फल हमें हर जन्म में मिले ?

परमात्मा : ( मुस्कुराते हुए ) लगता है आज तुम मुझसे कर्मों के सारे राज़ जान कर ही रहोगे । अभी जो तुमने मुझ से प्रश्न पूछा है उसका जवाब जानने से पहले मैं तुम्हें एक छोटी – सी कहानी सुनाता हूँ।

कर्मों का राज

एक बार की बात है , एक राजा था , उसके दो राजकुमार थे । राजा के राज्य में एक संन्यासी आए। राजा ने उस संन्यासी की दिल से सेवा की। राजा की सेवा से खुश हो कर उस संन्यासी ने उसे दो चमत्कारी फल दिए और उसे बताया कि इन फलों को खाने वाले की उम्र बढ़ जाती है।

कर्मों का राज
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राजा को लगा कि यह फल उसे अपने राजकुमारों को दे देना चाहिए । राजा ने अपने दोनों राजकुमारों को एक – एक चमत्कारी फल दे दिया और उनको उस फल की विशेषता बताई। दोनों राजकुमारों ने आदर पूर्वक अपने – अपने फल ले लिए।

पहले राजकुमार ने बहुत जल्द ही उस फल को खा लिया। वहीं दूसरे राजकुमार ने भी फल को खाया पर उसने उसका बीज अपने पास रख दिया। फिर उसने उस बीज को धरती में बो दिया। थोड़े ही दिन में उस बीज से अंकुर फूटा और कुछ ही वर्षों में उस बीज ने एक वृक्ष का रूप ले लिया।

अब दूसरे राजकुमार के पास कई फल हो गए और इसी के साथ उसकी उम्र कई ज्यादा हो गई। परमात्मा : इस कहानी से तुम्हें क्या समझ आया ? बिरजू : मेरे ख्याल में तो दूसरा राजकुमार बहुत ही बुद्धिमान था। उसने एक फल को अनेक फलों में परिवर्तित कर दिया।

यदि पहला राजकुमार भी ऐसा ही करता , तो उसके पास भी अनेक फल होते। परंतु इस कथा से मेरे प्रश्न का क्या लेना – देना है? परमात्मा : ( मुस्कुराते हुए ) देखो , वह चमत्कारी फल हमारे अच्छे कर्मों का फल है।

दोनों राजकुमारों को अपने पूर्व जन्मों के कर्मों के फलस्वरूप एक समान फल मिला , परन्तु एक ने उसे खा – पीकर समाप्त कर दिया और दूसरे ने उस फल को खाया तो सही पर साथ ही उसे फिर से रोपित भी कर दिया और आगे के लिए भी कई फल तैयार कर दिए।

कर्मो का रहस्य
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कहने का तात्पर्य यह है कि 👇👇👇

“यदि किसी व्यक्ति ने अपने पिछले किसी जन्म में बहुत अच्छे कार्य किए हैं , तो उसके फलस्वरूप उसे सुखी जीवन मिलेगा और यदि इस जन्म में भी वह अच्छे कर्म करता है, तो अगले जन्म में भी उसे सुख मिलना निश्चित है, पर अगर वह इस जन्म में बुरे कर्म करता है, तो उसे अगले जन्म में दुःखी जीवन मिलना भी निश्चित है”

जैसा कि तुम्हारे साथ हुआ। बिरजू : इसका अर्थ यही है कि यदि किसी व्यक्ति को सुखी और धनवान जीवन मिला है, तो उसे इस जन्म में केवल अपने लिए ही नहीं जीना चाहिए, परंतु उसे इस जन्म में भी श्रेष्ठ कर्म करके अपना भविष्य जीवन भी श्रेष्ठ बना देना चाहिए।

परमात्मा सही समझा पर वास्तव में ज्यादातर मनुष्य पहले राजकुमार की तरह कर्म के फल को खा पी कर खत्म कर देते हैं। बिरजू : हे प्रभु , क्या ऐसा कोई उपाय नहीं जिससे हम इन कर्मों के बंधन से सदा के लिए छूट जाएँ ? क्या हम एक के बाद एक ऐसे ही जन्म लेते रहेंगे।

परमात्मा : कर्मों के बंधन से सदा के लिए कोई भी छूट नहीं सकता। जो भी आत्मा इस धरा पर आती है, वह कर्मों के बंधन में बंध ही जाती है। जन्म के बाद मृत्यु निश्चित है और मृत्यु के बाद जन्म भी निश्चित है। यह एक अनादि और अविनाशी चक्र है, जो निरंतर चलता ही रहता है। इस अविनाशी चक्र के कारण ही आज सारा संसार स्थिर और संतुलित है।

Spiritual Book Summary in Hindi
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बिरजू : हम सब आत्माएं इस धरा पर कहां से आती हैं ? क्या आत्माएं इस धरा की मूल रहवासी नहीं हैं। परमात्मा : सभी आत्माओं का वास्तविक घर यह धरती नहीं परन्तु धरती से बहुत दूर चाँद तारागण से पार परमधाम है , जिसे ब्रह्मलोक भी कहते हैं। वही तुम्हारा और मेरा वास्तविक धाम है।

वह एक लाल प्रकाश की दुनिया है और उस लोक में सभी आत्माएँ अपने बीज रूप में , बिंदु रूप में परम आत्मा के साथ रहती है। फिर परमात्मा बिरजू को परमधाम का दृश्य दिखाते है। चारों ओर लाल प्रकाश ही लाल प्रकाश था उस लाल प्रकाश के मध्य में सितारों की तरह अनेकों आत्माएं चमक रही थीं।

वे सभी आत्माएं एक उलटे वृक्ष के आकार में थी और उन आत्माओं के वृक्ष के सबसे ऊपर ज्योतिर्बिन्दु परमात्मा चमक रहे थे। कुछ समय के लिए बिरजू का सूक्ष्म शरीर भी अदृश्य हो गया और केवल उसकी आत्मा ही रह गई। वह भी स्वयं को आत्मा अनुभव कर रहा था।

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ऐसा अलौकिक अनुभव उसने कभी नहीं किया था। कुछ समय के लिए वह सभी कर्मों के बंधनों से परे हो गया। फिर वापिस बिरजू अपने शारीरिक रूप में आ गया ? बिरजू : कितना दिव्य और अलौकिक अनुभव था।

हे प्रभु , इस लोक में आत्माएं क्या करती है? परमात्मा : इस लोक में सभी आत्माएँ शांत रहती हैं , यहां आत्माएं कर्मों से मुक्त रहती हैं। इस लोक में सभी आत्माएं अपने अनादि रूप में होती हैं।

आत्मा परमधाम में तब तक इंतजार करती है, जब तक परिस्थितियां उसके विश्व नाटक मंच में प्रवेश करने के अनुकूल न हो। समय आने पर आत्मा परमधाम छोड़ धरती पर जन्म लेती है। बिरजू : आपने इस विश्व को नाटक मंच क्यों कहां ?

परमात्मा : क्योंकि यह विश्व , एक नाटक मंच की तरह है यह सभी आत्माओं का सामूहिक खेल ही तो है। जैसे किसी नाटक में कलाकार अपने अनुरूप वस्त्र पहनकर अपने निर्धारित समय पर आकर अपना अभिनय करता है , वैसे ही इस विश्व रंगमंच पर आत्माएं एक कलाकार की भांति अपना पार्ट बजाती है।

बिरजू : यदि यह सब एक नाटक है , तो इस नाटक की शुरूआत कब होती है और इसका अंत कब होगा ? परमात्मा : इस नाटक का न तो कोई आदि है और न ही इसका कोई अंत ही है। यह एक अविनाशी कालचक्र है जो निरंतर चलता ही रहता है।

अविनाशी कालचक्र के बारे में

अविनाशी कालचक्र के बारे में
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इस कालचक्र में चार युग है सतयुग , त्रेतायुग , द्वापरयुग और कलियुग। इन चारों युगों को मिला कर एक कल्प बनता है। एक कल्प के बाद दूसरा कल्प , दूसरे कल्प के बाद तीसरा कल्प आता है और ऐसा निरंतर चलता ही रहता है। हरेक युग की अवधि 1250 वर्ष की होती है, जिस कारण एक कल्प की अवधि 5000 वर्ष की होती है।

बिरजू : आपके कहने का अर्थ है कि कलियुग के बाद फिर से सतयुग आता है। परमात्मा सही कहा। कलियुग के बाद फिर से सतयुग आता है और यह चक्र निरंतर चलता रहता है। इस कालचक्र की सबसे सुंदर बात यह है कि इस सृष्टि रूपी नाटक की हर 5000 वर्ष में हूबहू पुनरावृत्ति होती रहती है।

बिरजू : इसका मतलब क्या हुआ ?

परमात्मा : इसका अर्थ यह है कि जो तुम्हारे साथ आज हुआ है, वह तुम्हारे साथ 5000 वर्ष पूर्व भी हुआ था और 5000 वर्ष के बाद भी ऐसा ही होगा। हर कल्प में हरेक आत्मा एक समान पार्ट निभाती है और यही शाश्वत सत्य है और यही इस संसार का अविनाशी नियम है।

बिरजू : ये तो बड़ा ही अद्भुत रहस्य है जो आपने मुझे बताया है। हे प्रभु , जिन चार युगों की बात आपने मुझे बताई उन चारों युगों में क्या – क्या होता है । परमात्मा : कल्प को समय के अनुरूप चार युगों में विभाजित किया गया है।

सतयुग के बारे में

सबसे पहले सतयुग होता है जब सारी सृष्टि अपने सतोप्रधान रूप में होती है। चारों ओर सम्पूर्ण सुख और शांति होती है। प्रकृति भी अपने सतोप्रधान रूप में होती है। यहां पर सभी मनुष्य सर्वगुण सम्पन्न , 16 कला सम्पूर्ण और सम्पूर्ण पवित्र होते हैं इस कारण उन्हें देवी – देवता कहा जाता है।

सतयुग के बारे में जानकारी
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यहां तक कि इस युग में पशु पक्षी भी अहिंसक होते हैं। इस युग में श्री लक्ष्मी और श्री नारायण का राज्य होता है। यहां एक राज्य , एक भाषा और एक ही धर्म होता है। इन सब विशेषताओं के कारण ही इस युग को स्वर्णिम युग भी कहा जाता है। इसके बाद परमात्मा ने बिरजू को सतयुगी सृष्टि का साक्षात्कार कराया।

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चारों ओर हरियाली ही हरियाली थी। कहीं पर झरने बह रहे थे तो कहीं पर सुंदर बगीचे थे हर दिशा में स्वर्ण के महल थे बगीचों में देवी – देवताएं बेहद सुंदर पोशाक पहन रासलीला कर रहे थे और पूरे वातावरण में कई पुष्पों की सुगंध फैली हुई थी।

पक्षियों की चहचहाहट किसी मधुर संगीत की भांति लग रही थी। आकाश में कई पुष्पक विमान उड़ रहे थे और एक नदी के किनारे शेर और गाय एक साथ पानी पी रहे थे। इतनी सुंदर सृष्टि देख बिरजू अपनी सुधबुध भूल गया और उन स्वर्णिम नज़ारों में ही खो गया।

उसे इस दुनिया से जाने का मन नहीं कर रहा था परंतु परमात्मा ने उसे फिर से बुला लिया। बिरजू : कितनी मनमोहक दुनिया है , यहा सब कितने सुखी हैं। इसके पश्चात क्या होता है ? परमात्मा : परिवर्तन तो सृष्टि का नियम है। समय के साथ – साथ भी परिवर्तन होता जाता है।

त्रेतायुग के बारे में

त्रेतायुग के बारे में जानकारी
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सतयुग के बाद आता है त्रेतायुग इस युग में भी चारों ओर सुख और शांति रहती है, पर सतयुग की तुलना में यहां सभी मनुष्य 14 कला सम्पूर्ण ही होते है, इस युग में श्री राम और श्री सीता का राज्य होता है। इस युग को रजत युग भी कहते है। कुल मिला कर सतयुग और त्रेतायुग को ही स्वर्ग कहा जाता है, क्योंकि यहाँ हर कोई सुखी रहता है।

द्वापरयुग के बारे में

परमात्मा त्रेतायुग के बाद आता है, द्वापरयुग। इस युग से ही सृष्टि में दुःख और अशांति बढ़ने लगती है। द्वापर में प्रकृति रजोप्रधान हो जाती है। मनुष्यात्माएं 8 कला सम्पूर्ण होती है, चूंकि इस युग में दुःखों का आरम्भ होता है, तो साथ ही आरम्भ होती है, परमात्मा की भक्ति।

द्वापरयुग के बारे में
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सर्वप्रथम भारत में मुझ निराकार शिव की ही शिवलिंग के रूप में पूजा होती रही, पर समय के साथ साथ अव्यभिचारी भक्ति , व्यभिचारी भक्ति में बदल गई और मनुष्य अनेकों देवी देवताओं की भी भक्ति करने लगे। इसी के साथ अनेक धर्मों की भी स्थापना द्वापर युग में ही हुई।

सारा विश्व अनेक राज्यों में बंट गया मनुष्यों ने भूमि के लिए , धर्म के लिए अनेकों युद्ध किए अब सृष्टि वैसी न थी जैसी सतयुग के आरम्भ में थी। पवित्र मनुष्य अब अपवित्र हो गए । काम , क्रोध , लोभ , मोह और अहंकार ये पांचों विकार , अब सभी मनुष्यों को विकारी बना चुके थे।

कलियुग के बारे में

ऐसे ही समय बीतता गया और द्वापरयुग के बाद आरम्भ हुआ, कलियुग में आत्माएं तमोप्रधान और कलाहीन हो जाती है। चारों ओर दुःख ही दुःख फैल जाता है । बिरजू : लोग कहते हैं कि वर्तमान समय कलियुग ही चल रहा है ? परमात्मा : हां , वर्तमान समय कलियुग ही चल रहा है।

यहां तक कि यह कलियुग के अंत का समय है। इस समय तक सभी आत्माएं परमधाम से इस धरा पर आ चुकी होती हैं और यह समय है जब मुझे भी स्वयं इस धरा पर अवतरित होना पड़ता है। जैसा कि मैंने तुम्हें पहले भी बताया था कि कलियुग के बाद फिर से सतयुग आता है और एक नए कल्प की शुरुआत होती है।

संगमयुग के बारे में

कलियुग और सतयुग के बीच के समय को संगमयुग कहा जाता है। वो मंगलकारी पल अब आ चुका है, जब पुराना कल्प खत्म होकर नया कल्प आरम्भ होगा। कलियुग के बाद फिर से नई सतयुगी दुनिया की स्थापना होगी। उस नई दुनिया की स्थापना के लिए ही मैं इस धरा पर आया हूँ।

बिरजू : इसका अर्थ है कि वर्तमान समय आप सृष्टि पर अवतरित हो चुके हैं। परमात्मा : हां , ये सत्य है कि मैं वर्तमान समय इस धरती पर अवतरित हो चुका हूँ । बिरजू : हे प्रभु , आप किस रूप में अवतरित हुए हैं ? आपने किस रूप में जन्म लिया है ?

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परमात्मा : मैं तो अजन्मा हूँ , मैं कभी भी किसी माता के गर्भ से जन्म नहीं लेता। परन्तु चूंकि मैं निराकार हूँ, इसलिए मुझे अपने दिव्य कर्तव्यों को पूर्ण करने के लिए एक अनुभवी मानवीय तन का आधार लेना पड़ता है, अर्थात मैं एक शरीर का आधार ले सतयुगी सृष्टि की स्थापना करता हूँ।

बिरजू : वो भाग्यशाली मनुष्य कौन है जिनके तन के माध्यम से आप अपना दिव्य कर्तव्य कर रहे हैं ? परमात्मा : वह भाग्यशाली व्यक्ति है प्रजापिता ब्रह्मा। ये वही आत्मा है जिसने सतयुग में श्री नारायण के रूप में पार्ट बजाया। सर्व मनुष्यात्माओं में यह ही सर्वोत्तम है , इसलिए मैंने इनके तन का आधार लिया है।

इस समय सारी सृष्टि तमोप्रधान हो चुकी है और हर मनुष्यात्मा पतित हो गई है। मैं आया हूँ सभी पतित आत्माओं को फिर से पावन बना अपने घर परमधाम ले जाने।

बिरजू : क्या अभी सृष्टि का अंत आ गया है ?

सतयुगी सृष्टि की स्थापना

परमात्मा : यह सृष्टि का अंत नहीं , बल्कि पुरानी कलियुगी दुनिया का अंत है। पर साथ ही नई सतयुगी पवित्र दुनिया का आरम्भ भी है। उस दुनिया की एक सुंदर झलक तो तुम देख ही चुके हो। बस देखते जाओ बहुत ही जल्दी वह दुनिया आने वाली है मेरे प्यारे बच्चे।

सतयुगी सृष्टि की स्थापना
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बिरजू : उस सतयुगी दुनिया में कौन – कौन जाएगा ? परमात्मा : उस सतयुगी दुनिया में वहीं श्रेष्ठ आत्माएं जाएंगी, जो इस संगमयुग के समय में मुझे इस साधारण रूप में भी पहचान लेंगी और मेरी श्रीमत पर चल अपने जीवन को फिर से दिव्य और पावन बनाएंगी।

बिरजू : क्या मैं भी उस दुनिया में जा पाऊंगा ? परमात्मा : क्यों नहीं , तुम ही क्या विश्व की हर आत्मा उस दुनिया में जा सकती है। यदि तुम भी मेरी बताई गई श्रीमत पर चलोगे तो तुम भी सतयुग में जा सकोगे। बिरजू : हे प्रभु , आपकी क्या श्रीमत है जिससे मैं उस दुनिया का मालिक बन जाऊँगा।

राजयोग के बारे में और राजयोग की विधि

परमात्मा : मेरी मुख्य श्रीमत है राजयोग ।

बिरजू : राजयोग !, यह राजयोग क्या है ?

परमात्मा : राजयोग , सभी योगों का राजा है यह कोई कठिन शारीरिक क्रिया या हठयोग नहीं परंतु अत्यंत ही सरल ध्यानसाधना है । अपने मन को मेरी याद में एकाग्र करना ही राजयोग है।

स्वयं को आत्मा रूप में स्थित कर मुझे मेरे सत्य स्वरूप , ज्योति रूप में याद करना यही राजयोग की विधि है। इस विधि से आत्मा के मन की तार मुझ से झुड़ जाती है, जिससे मुझ से अपार शक्तियां राजयोगी के अंदर समाने लगती है।

राजयोग के फायदे

राजयोग के निरंतर अभ्यास से आत्मा पावन बनती जाती है और साथ ही उसके पिछले सभी पापकर्मों का भी नाश होता जाता है। बिरजू : क्या राजयोग से मेरे द्वारा किये गए पाप कर्मों का भी नाश हो जायेगा ? परमात्मा : हाँ , राजयोग से तुम्हारे सिर पर जो कई जन्मों के पापों का बोझा है, वह सब खत्म हो जाएगा और तुम फिर से पुण्य आत्मा बन जाओगे।

बिरजू : ये तो बड़े ही हर्ष की बात है। अखिरकार मैं अपने किए गए पापकर्मों का पश्चाताप कर पाऊंगा। मेरा मन कब से यह ही सोच के घबरा रहा था कि अखिर मैं अपने विकर्मों का पश्चाताप कैसे करूँगा। हे परमेश्वर , मैं आपका बहुत आभारी हूँ जो आपने मुझे ये दिव्य ज्ञानमार्ग प्रदर्शित किया।

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परमात्मा : मैं तो तुम्हारा पिता हूँ , यह तो मेरा कर्तव्य था।

बिरजू : हे प्रभु , क्या मैं इस जन्म में आपसे साकार रूप में भी मिल पाऊंगा ? परमात्मा : मुझे सच्चे दिल से ढूँढ़ने का प्रयास करना। मैं तुम्हें अवश्य ही मिल जाऊंगा और बहुत जल्द तुम्हारी मुलाकात कुछ ऐसी आत्माओं से होगी, जो तुम्हें मुझसे मिलने का सही रास्ता बताएंगी।

बिरजू : वो कौन आत्माएं है , उन्हें मैं कैसे पहचानूंगा ?

परमात्मा : बस तुम सच्चे दिल से मेरी प्राप्ति की इच्छा रखो , तुम्हें मेरी प्राप्ति अवश्य होगी। वे आत्माएं एक दिन तुम्हारे पास आयेंगी मेरा संदेश ले कर अब यह तुम्हारे ऊपर है कि तुम उन्हें पहचान पाओगे या नहीं, अभी मैं तुमसे विदाई लेता हूँ।

बिरजू की नींद खुल जाना

आशा है तुम्हें कर्मों का ज्ञान समझ में आ गया होगा अब मैं चलता हूँ। सदा सुखी रहना। इतना कहते ही परमात्मा अदृश्य हो जाते हैं। बिरजू उन्हें रोकने का प्रयास करता है, पर वह उन्हें रोक नहीं पाता। तभी बिरजू की नींद खुल जाती है और वह अपने को फिर से अपनी झोंपड़ी में पाता है।

बिरजू की नींद खुल जाना
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सवेरा हो चुका था और सूरज की किरणें खिड़की से हो कर बिरजू पर पड़ रही थीं। उसे यह समझ में आ गया था कि उसने जो कुछ भी अनुभव किया वह सब एक स्वप्न था। बिरजु के मुख पर अब एक मुस्कान थी वह मन ही मन अपने आप से बातें कर रहा था।

बिरजू : क्या यह सब एक सपना था ? पर जो कुछ भी हो बड़ा ही अलौकिक अनुभव था। हो न हो वह स्वयं परमात्मा ही थे जो मुझे इतना श्रेष्ठ ज्ञान देकर चले गए। मैं कितना भाग्यशाली हूँ । वह सतयुगी दुनिया के दृश्य … वह आत्मिक अनुभव … वह सब कितना अद्भुत था।

बिरजू अपना अलौकिक अनुभव को अपनी पत्नी रमा को बता देना

बिरजू अपने अलौकिक अनुभवों का स्मरण कर ही रहा था, कि तभी उसकी पत्नी रमा वहाँ आती है और उससे गुस्से में डांटते हुए कहती है.

रमा : क्या हो गया ? इतने खुश क्यों हो ? क्या कल की पिटाई भूल गए ? कल से घर में अनाज का एक दाना नहीं है और तुम यहाँ बैठे मुस्कुरा रहे हो , तुम्हें तो किसी बात की परवाह ही नहीं है।

बिरजू अपना अलौकिक अनुभव को अपनी पत्नी रमा को बताना
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पर बिरजू अब भी मुस्कुरा ही रहा था, क्योंकि अब उसे इतना दिव्य अनुभव जो हुआ था। खुशी – खुशी में उसने अपना अनुभव रमा को भी सुनाना शुरू कर दिया ।

बिरजू : अरे यह सब बेकार की बातें छोड़ो , पता है आज मेरे स्वप्न में कौन आए थे.

रमा : तुम तो ऐसे पूछ रहे हो, जैसे स्वयं भगवान तुम्हारे सपने में आए हो।

बिरजू :अरे तुमने तो सही अंदाजा लगाया। आज मेरे सपने में स्वयं भगवान ही आये थे और परमात्मा ने मुझे बड़ा ही अलौकिक और अनूठा अनुभव कराया। उन्होंने मुझे कर्मों के गुह्य रहस्यों का ज्ञान दिया और उन्होंने मुझे आने वाले नई दुनिया का साक्षात्कार कराया। और भी बहुत सारे दिव्य अनुभव कराए।

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तुम्हें यह पता है कि इस समय वे इस धरती पर अवतरित हो चुके हैं। उन्होंने मुझसे कहा कि यदि मैं सच्चे दिल से उन्हें प्राप्त करने की इच्छा रखूंगा, तो वे मुझे अवश्य मिल जाएंगे । बिरजू खुशी – खुशी में रमा को सब बातें बता रहा था , पर उसकी गुस्सैल और चिड़चिड़ी पत्नी को उसकी एक बात समझ नहीं आ रही थी।

उसे तो उल्टे यह लग रहा था कि बिरजू पागल हो गया है। रमा : क्या ऊटपटांग बातें कर रहे हो मेरी समझ में तो कुछ भी नहीं आ रहा। लगता है कल उन गुंडों ने तुम्हारे सिर पर मारा होगा इसलिए तुम पागलों के जैसी बातें कर रहे हो। बिरजू नहीं नहीं मैं पागल नहीं हूँ , मुझे सच में ये दिव्य अनुभव हुए हैं।

रमा : अब यह बहस छोड़ो और उठो जाओ कुछ कमाई कर के लाओ और मेरा दिमाग मत खराब करो। बिरजू को अब अपनी पत्नी की कोई भी बात बुरी नहीं लग रही थी। उसे अब कर्मों का ज्ञान जो मिल गया था। उसे तो अब रमा के ऊपर बहुत दया आ रही थी । बिरजू ने पिछले जन्म में उसके साथ जो किया था उसके आगे तो यह सब कुछ भी नहीं था।

उस बात को ध्यान में रखते हुए वह प्रेम से अपनी पत्नी से क्षमा मांगता है। बिरजू : अगर तुम्हें मेरी किसी भी बात पर यकीन नहीं होता तो कोई बात नहीं । पर इतना समझ लो अब मेरा जीवन पूरी तरह से बदल गया है। मैंने पिछले जन्म में और इस जन्म में तुम्हारे साथ बहुत बुरा किया है, इसलिए मैं तुमसे उन सब बातों के लिए क्षमा मांगता हूँ ।

रमा को कुछ भी समझ नहीं आ रहा था कि भला बिरजू उससे क्षमा क्यों मांग रहा था। कुछ समय के लिए वो शांत हो गई और यहीं बात सोचते सोचते वह अपने काम में लग गई। बिरजू आज बहुत खुश था। कल के दिन उसके साथ जो कुछ भी बुरा हुआ था उन सब बातों को वह भूल चुका था ।

यहां तक की उसे जितनी चोटें आई थीं उसे उनका दर्द भी नहीं हो रहा था। – अब उसके मन में केवल एक ही बात थी परमात्मा की प्राप्ति। वह इसी धुन में घर से बाहर चला जाता है उसके चेहरे पर खुशी थी , उसकी चाल में अब उमंग और उत्साह था। जब वह बस्ती से गुजर रहा था तब सारे बस्ती वाले उसे देख कर आश्चर्यचकित हो रहे थे क्योंकि उन्होनें कभी भी उसे इतना खुश नहीं देखा था।

बिरजू का खुश हो होकर गल्ली से गुजर जाना
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सभी के मन में यहीं प्रश्न उठ रहा था कि कल तो बिरजू की बुरी तरह से पिटाई हुई थी और आज यह दु :खी होने के बजाए इतना खुश क्यों हो रहा है ? जो जहां था वहीं पर रूक कर बिरजू की ओर देखने लगा । थोड़ी देर के लिए सारा माहौल शांत सा हो गया ।

(self help book summary in hindi)

बिरजू को अब किसी भी बात की परवाह नहीं थी। वह तो अपनी मस्ती में मस्त होकर चला जा रहा था। वह अपनी दुकान फिर से चालू करता है। आज वह सबसे मुस्कुरा कर मिल रहा था , साथ ही उसके मन में यही चल रहा था कि कब वह परमात्मा से फिर मिलेगा।

वो हर किसी को इसी नज़र से देख रहा था कि परमात्मा का संदेश उसे कौन देगा। दोपहर के समय उसकी दुकान पर फिर से वही गुंडे आ गए, जिन्होंने पिछले दिन बिरजू को बहुत पीटा थाl एक पल के लिए बिरजू उन्हें देखकर थोड़ा क्रोधित हुआ पर तुरंत उसे अपने पिछले जन्म की बात याद आई कि किस तरह उसने उन लोगों के साथ बुरा किया था l

बिरजू का सबसे क्षमा मांगना
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पलभर में उसकी मनोस्थिति बदल जाती है। वह मुस्कुराने लगता है और उन लोगों के बिना कहे ही उन्हें प्यार से बैठने के लिए कहता है। उन लोगों को तो यही लग रहा था कि बिरजू उनसे बहुत डर गया है। वे सब नज़दीक में रखी एक बेंच पर बैठ जाते हैं। इसके बाद बिरजू बड़े ही प्यार से उनको चाय पिलाता है। तत्पश्चात वो उन सभी से क्षमा याचना करने लगता है।

बिरजू का सबसे क्षमा मांगना

बिरजू: मैं आप सब से क्षमा मांगता हूँ। मैंने आप लोगों के साथ बहुत ही बुरा किया है , कृपया उसके लिए मुझे माफ कर दो। बिरजू बनावटी रीति से नहीं कह रहा था , वह दिल से उनसे माफी मांग रहा था। बिरजू की ऐसी बातें सुन कर वे लोग आश्चर्य में एक – दूसरे को देखने लगे। वे सभी सोच में पड़ गए कि बुरा तो उन्होंने बिरजू के साथ किया था , उल्टा वह उनसे ही माँफी माँग रहा है।

वे लोग कुछ पल के लिए चुप हो गए। इतने में उनमें से एक ने बिरजू से पूछ ही लिया कि भला वो उनसे माँफी क्यों मांग रहा है। इस पर बिरजू बोला।

बिरजू : मैं इस जन्म के लिए नहीं बल्कि पिछले जन्म की कुछ गलतियों की माफी माँग रहा हूँ । कृपा कर के मुझे माफ कर दो ।

उन गुंडों को बिरजू की कोई भी बात समझ में नहीं आई , उन्हें भी यही लगा कि बिरजू पागल हो गया है, वे लोग थोड़ी देर आपस में कुछ बात करके चुपचाप वहां से चले गए। अब संध्या का समय हो चला था। सारा समय बिरजू इसी ख्याल में खोया हुआ था कि बहुत ही जल्द वो परमात्मा के साकार रूप को अवश्य देखेगा।

परमात्मा का संदेश

धीरे – धीरे अंधेरा होने लगा था । प्रतिदिन बिरजू इस समय तक अपनी दुकान बंद कर देता था, पर आज उसने दुकान बंद नहीं की , उसे यही उम्मीद थी कि कोई न कोई प्रभु का संदेश ले कर उसके पास ज़रूर आएगा। काफी समय प्रतीक्षा करने के बाद भी जब कोई न आया तो वह अपनी दुकान बंद करने लगा।

परमात्मा का संदेश
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तभी बिरजू को कुछ दूरी पर एक श्वेत वस्त्रधारी कुमार कुछ पर्चे बाँटते हुए दिखा बिरजू को जिज्ञासा हुई , वह तुरंत उस व्यक्ति के पास गया और उससे पूछने लगा।

बिरजू: अरे भाई यह तुम किस चीज़ के पर्चे बांट रहे हो ?

कुमार : ( मुस्कुराते हुए ) मेरे भाई इसमें परमात्मा का संदेश है।

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मैं यह खुशखबरी यहां उपस्थित सभी लोगों को देने आया हूँ कि परमात्मा इस धरा पर आ चुके हैं। ये लीजिए आप भी यह पर्चा लीजिए । बिरजू समझ गया था कि जिसकी वह सारे दिनभर से प्रतीक्षा कर रहा था , वह उसके सामने ही है। वह मन ही मन बहुत खुश हो रहा था।

बिरजू ने उस व्यक्ति से एक पर्चा ले लिया और इतना कहकर वह कुमार भी वहां से चला गया। बिरजू काफी देर तक उस व्यक्ति को जाते हुए देखता रहा । खुशी – खुशी में वह यह भी भूल गया था कि उसे तो पढ़ना आता ही नहीं। अब वह उस पर्चे को कैसे पढ़ेगा।

अब तक वह कुमार भी उसकी आँखों से ओझल हो चुका था और वह काफी देर तक भीड़ में उस कुमार को ढूंढ़ता रहा पर वह उस व्यक्ति को ढूंढ नहीं पाया। फिर बिरजू को अपने एक परिचित व्यक्ति की याद आई, जिसे पढ़ना आता था। वह तुरंत पर्चा लेकर उस व्यक्ति के पास जाता है और उससे पर्चा पढ़कर सुनाने को कहता है।

भगवन का संदेश
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परिचित व्यक्ति : अरे बिरजू , आज बड़े ही खुश दिख रहे हो , क्या बात है ? बिरजू आज तो मेरी खुशी का ठिकाना नहीं है, देखो एक व्यक्ति मुझे यह पर्चा देकर गया और कह गया है कि यह परमात्मा का संदेश है। क्या तुम इसे मुझे पढ़कर सुनाओगे ?

परिचित व्यक्ति : लाओ जरा पढ़कर तो देखे आखिर क्या लिखा है इसमें । बिरजू वह पर्चा उस व्यक्ति को दे देता है और उत्सुक्ता से सुनने लगता है । परिचित व्यक्ति: ( पर्चा पढ़ते हुए ) जागो जागो , भारत में भगवान आया है ।

प्रिय आत्मन् , परमपिता परमात्मा शिव जो हम सभी आत्माओं के पिता हैं , हम सभी आत्माओं को दुखों से छुड़ाने , पापों से मुक्त करने के लिए परमधाम से इस धरती पर आ चुके हैं। परमात्मा आये हैं हम सभी आत्माओं को राजयोग सिखा कर फिर से पावन बनाने।

परिचित व्यक्ति इतना पढ़ते ही हंसने लगता है।

परिचित व्यक्ति : क्या बकवास है इस पर्चे में तो सब झूठ लिखा है मैं जानता हूँ इनको , ये लोग केवल फालतू बात करते रहते हैं । यह सब बस इनकी चाल है लोगों को मूर्ख बनाने की। तुम कहां इनकी बातों में आते हो । कहते हैं ये लोग जादू टोना भी करते हैं तुम इनसे दूर ही रहना।

बिरजू : क्या तुमने इनके यहां जाकर कभी देखा है ? परिचित व्यक्ति नहीं जाकर तो कभी देखा नहीं बस लोग जो कहते हैं वही तुम्हें सुना रहा हूँ । बिरजू : बिना देखे भला तुम कैसे कह सकते हो कि यह सब झूठ है । पता है , मुझे आज रात स्वप्न में बड़ा ही अलौकिक अनुभव हुआ है।

उसमें स्वयं परमात्मा ने मुझे बताया था कि वह इस समय धरती पर अवतरित हो चुके है। मैं तो वहाँ ज़रूर जाऊँगा । तुम भी मेरे साथ चलो क्या पता सही में हमें भगवान की प्राप्ति हो जाए।

परिचित व्यक्ति: नहीं नहीं मुझे तो तुम इन सब से दूर ही रखो। मुझे तो डर लगता है, कहीं मेरा जीवन खराब न हो जाए।

बिरजू :अच्छा ठीक है अगर तुम्हें नहीं आना तो मत आओ, पर ये तो बताओ कि इस पर्चे में किसी स्थान का पता लिखा है क्या?

भगवान की प्राप्ति के लिए बिरजू का ब्रह्माकुमारी सेवाकेन्द्र पर चले जाना

परिचित व्यक्ति : हाँ यहां नीचे एक पता तो लिखा है। वह बिरजू को पता पढ़कर सुना देता है । इसके बाद बिरजु अकेला उस स्थान की और चला जाता है और वह लोगों से पता पुछते – पुछते एक ब्रह्माकुमारी सेवाकेन्द्र पर पहुँच जाता है। वह खुशी खुशी उस सेवाकेन्द्र के अंदर चला जाता है वहाँ पर ब्रह्माकुमारी बहनें बड़े आदर के साथ उसे एक योग कक्ष में ले जाती हैं।

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उस योग कक्ष में एक ब्रह्माकुमारी बहन योग अवस्था में बैठी हुई थी साथ ही कई अन्य भाई बहने भी शांतचित्त हो योग का अभ्यास कर रहें थे। उस कक्ष में गहन शांति थी हरेक के चेहरे पर रुहानियत थी। बिरजू भी शांती से उन सभी के साथ बैठ गया। उसने अपने जीवन इतनी गहन शांति का कभी भी अनुभव नहीं किया था।

ब्रह्माकुमारी बहन बिरजू को ईश्वरीय ज्ञान सुनाना

योगाभ्यास के बाद एक ब्रह्माकुमारी बहन बिरजु को एक दूसरे कक्ष में ले कर जाती है जहाँ पर एक ब्रह्माकुमारी बहन ईश्वरीय ज्ञान सुना रही थी। सभी बहनों का इतना निस्वार्थ भाव देखकर बिरजू को बड़ा ही अच्छा लग रहा था। फिर वह बहन बिरजु को ज्ञान सुनाना आरम्भ करती हैं।

ब्रह्माकुमारी बहन बिरजू को ईश्वरीय ज्ञान सुनाना
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सर्वप्रथम उसने परमात्मा का परिचय क्या है वह बताया और इसके बाद आत्मा का परिचय दिया। वो बहन वही ज्ञान सुना रही थी जो परमात्मा ने बिरजू को दिया था। बिरजू को अब यह पूर्णत : विश्वास हो गया था कि यही सत्य ज्ञान है और ये परमात्मा का ज्ञान ही है।

सेवाकेन्द्र पर बिरजू को राजयोग भी सिखाया गया। अब वह निरंतर ब्रह्माकुमारी सेवाकेन्द्र पर जाने लगा। ईश्वरीय ज्ञान उसे बड़ा ही अच्छा लगने लगा था। राजयोग के अभ्यास से उसका जीवन बहुत ही खुशनुमा बन गया था। उसका जीवन अब पूरी तरह से बदल गया था।

बिरजू के जीवन में परिवर्तन होना

जो बिरजू बहुत उदास और चिड़चिड़ा था वह अब रमणीक स्वभाव को हो गया था । जो बिरजु कभी शराब के नशे में लड़ता झगड़ता था वो अब व्यसनमुक्त जीवन व्यतीत कर रहा था। परमात्मा की श्रीमत पर चल वह अपने भाग्य को उंच बनाने लगा था। कर्मों के ज्ञान ने उसे जीने की नई दिशा दिखा दी थी।

बिरजू के जीवन में परिवर्तन होना
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उसके जीवन में आए इतने बड़े परिवर्तन को देख उसकी पत्नि और दूसरे कई लोग भी अपना जीवन बदलने लगे। वे सभी भी सेवाकेन्द्र पर आकर ईश्वरीय ज्ञान लेने लगे थे। उन सभी के जीवन में कई साकारात्मक परिवर्तन आने लगे थे। इसके बाद वह दिन भी आया जब बिरजू को परमात्मा के साथ साकार मिलन मनाने का अवसर प्राप्त हुआ।

वह दिन उसके लिए बहुत ही हर्ष का दिन था। उस दिन उसने स्वयं भगवान के सम्मुख बैठ ईश्वरीय ज्ञान का श्रवण किया। परमात्मा से मिलन के बाद उसे यह पूरी तरह से निश्चय हो गया था कि भगवान इस धरा पर आ कर नई दुनिया कि स्थापना कर रहें है।

इसके बाद बिरजु भी तन – मन – धन से पूरी तरह से परमात्मा के दिव्य कार्य में सहभागी बन गया। कर्मों का ज्ञान केवल बिरजू के लिए ही नहीं है , बल्कि विश्व की हरेक आत्मा के लिए है। कर्म ही वो कलम है, जिसके द्वारा हरेक मनुष्य अपना भाग्य लिखता है।

और जहां तक परमात्मा से मिलन की बात है तो आप भी परमात्मा से मिल सकते है। आप भी अपने नज़दीकी ब्रह्माकुमारी सेवाकेन्द्र पर जा सकते है और ईश्वरीय ज्ञान को अपने जीवन में धारण कर सकते है, और आप भी अपना जीवन दिव्य और अलौकिक बना सकते है।

Conclusion of Life Changing Book Summary in Hindi

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