गौतम बुद्ध के बचपन की कहानी | Gautam Buddha Story in Hindi

गौतम बुद्ध के बचपन की कहानी | Gautam Buddha Ke Bachpan Ki Kahani

नमस्कार दोस्तों आप सभी का हमारे नॉलेज ग्रो मोटिवेशनल ब्लॉग पर स्वागत है। दोस्तो आज का यह आर्टिकल आप सभी के लिए बहुत ही स्पेशल और लाइफ चेंजिंग साबित होने वाला है, क्योंकि दोस्तो आज के इस आर्टिकल के जरिए मैं आपके साथ गौतम बुद्ध की बचपन की कहानी शेयर करने वाला हु, जो आपको बहुत कुछ सीखा सकती है।

दोस्तो मैने आप सभी के लिए सबसे मूल्यवान और दिल को छू लेने वाली गौतम बुद्ध के बचपन की कहानियों को ढूंढकर इकट्ठी किया हुआ है, ताकि आपके जीवन में सफ़लता हासिल कर सकू। दोस्तो आपको इस आर्टिकल से बहुत कुछ सीखने को मिलने वाला है, इसीलिए इस आर्टिकल को अंत तक जरूर पढ़िए।

गौतम बुद्ध के बचपन की कहानी
गौतम बुद्ध के बचपन की कहानी

गौतम बुद्ध की बचपन की कहानी | Gautam Buddha Ki Bachpan Ki Kahani

दोस्तों आज में आपके साथ जो गौतम बुद्ध की बचपन की कहानी शेयर करने वाला हू, उस कहानी को मैने गौतम बुद्ध के जीवन पर आधारित लिखी हुई लाईफ चेंजिंग बुक गौतम बुद्ध का जीवन परिचय और उनकी शिक्षाएं बुक से ली गई हुई है। अगर आप गौतम बुद्ध की जीवनी को पढ़ना चाहते हैं? तो उसकी लिंक मैने नीचे दी हुई है।

गौतम बुद्ध की बचपन की कहानी – 1

दोस्तो एक दिन सिद्धार्थ और उनके चचेरे भाई देवदत्त और यशोधरा तथा अन्य बच्चे बगीचे में खेल रहे होते हैं। खेलते खेलते अचानक देवदत्त सिद्धार्थ पर छल से जीतने का आरोप लगाता है और यह बात रानी प्रजापति तक पहुंचती है। रानी प्रजापति सिद्धार्थ को छल से जीतने के लिए बहुत डाँटती हैं, जब कि सिद्धार्थ ने छल नहीं किया था।

जब सभी बच्चों से पूछा जाता है कि छल किसने किया था? तो सब बच्चे देवदत्त का नाम लेते हैं और फिर रानी प्रजापति सिद्धार्थ से पूछती हैं, अगर गलती तुम्हारी थी ही नहीं तो तुमने मना क्यों नहीं किया। सिद्धार्थ कहते हैं, गुरुदेव ने कहा है कि सत्य स्वयं प्रकाशित है, इसलिए मैं चुप था।

दोस्तो यह बात सुनकर रानी प्रजापति की आंखों में आंसू आ जाते हैं और वे सिद्धार्थ को अपने सीने से लगा लेती हैं। उसी समय की एक और घटना है, जो आपको जरूर समझनी चाहिए। गुरुकुल में सिद्धार्थ देवदत्त तथा अन्य विद्यार्थियों को धनुर्विद्या सिखाई जाती हैं।

गौतम बुद्ध की बचपन की कहानी – 2

देवदत्त की धनुर्विद्या सीखने में बहुत रुचि होती है। देवदत्त धनुर्विद्या आखेट और युद्ध के लिए सीखता है, परंतु सिद्धार्थ धनुर्विद्या अपने पिता की इच्छा पूरी करने के लिए सीखते हैं। एक दिन सिद्धार्थ और यशोधरा महल के पास ही बगीचे में खेल रहे होते हैं, अचानक उनके पास एक घायल पक्षी आकर गिरता है।

उस पक्षी के शरीर में बाण लगा होता है और उसके शरीर से खून बह रहा होता है। सिद्धार्थ उस पक्षी को देख कर व्याकुल हो जाते हैं और उसके प्राण बचाने के प्रयास में लग जाते हैं। इतने में ही वहाँ देवदत्त आ जाता है और सिद्धार्थ से कहता है, देखा सिद्धार्थ मैंने उड़ते हुए पक्षी को मार गिराया, लाओ इसे मुझे दे दो।

सिद्धार्थ देवदत्त को पक्षी देने से मना कर देते हैं। देवदत्त कहता है सुना नहीं तुमने यह मेरा आखेट है। सिद्धार्थ कहते हैं परंतु इसे मैंने बचाया है, इसीलिए यह पक्षी मेरा है। पर देवदत्त कहता है, तुम अपने जेष्ठा का अपमान कर रहे हो सिद्धार्थ। सिद्धार्थ कहते हैं मैं अपना कर्तव्य निभा रहा हूं जेष्ठा।

फिर देवदत्त कहता है, आखेट क्षत्रिय का गुण है। सिद्धार्थ कहते हैं, रक्षा करना क्षत्रिय का कर्तव्य है जेष्ठा। देवदत्त कहता है यदि तुमने मुझे यह पक्षी नहीं दिया तो मैं महाराज के पास जाऊंगा। फिर सिद्धार्थ कहते हैं, मैं महाराज के आदेश की प्रतीक्षा करूंगा।

देवदत्त न्याय सभा में जाता है और राजा शुद्धोधन से न्याय मांगता है। राजा शुद्धोधन सिद्धार्थ को बुलवाते हैं और सुनवाई शुरू की जाती है। मंत्री देवदत्त से पूछता है क्या याचना है तुम्हारी देवदत्त? देवदत्त कहता है महाराज मैंने पक्षी का आखेट किया तो वह पक्षी मेरा हुआ।

सिद्धार्थ कहते महाराज मैंने इस पक्षी को घायल अवस्था में पाया और इसकी रक्षा की इसलिए अब यह मेरे पास रहेगा। राजा कहते हैं तो अब यह न्याय करना है कि यह पक्षी किसे दिया जाए, जिसने इसे घायल किया है उसे या जिसने इसकी रक्षा की है उसे?

न्याय सभा का एक सदस्य सिद्धार्थ से कहता है, आखेट करना तो क्षत्रिय का धर्म है युवराज। सिद्धार्थ कहते हैं निर्बल की रक्षा करना क्षत्रिय का कर्तव्य है महाराज। देवदत्त सिद्धार्थ से कहता है , मुझे तुम्हारी क्षत्रियता पर संदेह है सिद्धार्थ।

सिद्धार्थ कहते हैं और मुझे तुम्हारी मनुष्यता पर संदेह है। घायल करने से पीड़ा होती है और रक्षा करने से स्नेह बढ़ता है। इस जगत में स्नेह बढ़ना चाहिए या पीड़ा ? सच्चा क्षत्रिय एक रक्षक होता है। दोनों का पक्ष जानने के बाद राजा कुलगुरु से कहते हैं। कुलगुरु कृपाकर अब आप ही न्याय करें।

कुलगुरु अपने आसन से खड़े होते हैं और राजा से कहते हैं, अब मैं भी असमर्थ हूं राजन अब तो यह पक्षी ही बता सकता है कि यह किसके पास रहेगा। कुलगुरु सिद्धार्थ से उस पक्षी को लेकर देवदत्त और सिद्धार्थ को समान दूरी पर खड़ा कर देते हैं और उस पक्षी को कुछ दूरी से जमीन पर छोड़ते हैं।

और कहते हैं कि अब यह पक्षी जिसके भी पास जाएगा, इसका हकदार वही होगा। पक्षी हमारी तरह कोई भाषा तो नहीं समझते परंतु करुणा की भाषा जरूर समझते हैं। वह पक्षी सीधा सिद्धार्थ के पास जाता है और सिद्धार्थ उसे गोद में उठा लेते हैं।

गौतम बुद्ध के बचपन की कहानी – 3

कहानी में आगे बढ़ते हैं राजा शुद्धोधन अपने पूत्र की शिक्षा में उन्नति जानने के लिए सभी गुरुओं को अपने पास बुलवाते हैं और एक एक करकर सभी गुरुओं से सभी विषयों के बारे में पूछते हैं। सभी गुरु सिद्धार्थ को हर विषय में उत्तम बताते हैं, सिवाय एक विषय को छोड़कर और वो विषय होता है, अस्त्र चलाना।

दोस्तों ऐसा नहीं था कि सिद्धार्थ को अस्त्र चलाने नहीं आते थे। बात बस इतनी थी कि अस्त्र चलाने में सिद्धार्थ की कोई रुचि नहीं थी। सिद्धार्थ का मन तो प्रकृति के साथ समय बिताने में लगता था। जब यह बात राजा को पता चलती है कि सिद्धार्थ को अस्त्र चलाना अच्छा नहीं लगता, तो वे बहुत क्रोधित होते हैं।

और सभी गुरुओं को यह आदेश देते हैं कि सिद्धार्थ की रुचि अस्त्र चलाने में जगाई जाए। राजा की आज्ञा पालन करते हुए सभी गुरु इस कार्य में लग जाते हैं। समय बीतता है और सिद्धार्थ की शिक्षा पूर्ण हो जाती है। सिद्धार्थ के साथ साथ देवदत्त तथा अन्य विद्यार्थियों की भी शिक्षा पूर्ण हो जाती है।

दोस्तो अब समय आता है गुरुकुल की अंतिम परीक्षा का, जिसके द्वारा तय होगा कि गुरुकुल का सर्वश्रेष्ठ विद्यार्थी कौन है? प्रतियोगिता का दिन तय किया जाता है और प्रतियोगिता को तीन चरणों में बांटा जाता है। पहला तलवारबाजी, दूसरा दंड प्रतियोगिता और तीसरा तीरंदाजी।

पहले दिन की प्रतियोगिता शुरू होती हैं। दो प्रतिभागी अपनी अपनी तलवार लेकर मैदान में उतरते हैं। लोगों को प्रतिभागी ना दिखे केवल प्रतिभा दिखे इसलिए दोनों प्रतिभागियों के चेहरे पर मुखौटा लगा होता है। एक मुखौटे के पीछे देवदत्त होता है और दूसरे मुखौटे के पीछे कोई अन्य प्रतिभागी होता है।

परंतु देवदत्त यह सोचता है कि सामने वाला प्रतिभागी सिद्धार्थ है, इसलिए वह सामने वाले प्रतिभागी को बुरी तरह से घायल कर देता है। नियम यह था कि जीतने वाला तो अपने चहरे से मुखौटा हटाएगा, परंतु हारने वाला बिना मुखौटा हटाए ही मैदान से बाहर चला जाएगा।

इसलिए देवदत्त अपने चेहरे से मुखौटा हटाता है और फिर दूसरे प्रतिभागी लड़ने के लिए आते हैं। इस बार एक मुखौटे के पीछे सिद्धार्थ होते हैं और दूसरे मुखौटे के पीछे कोई अन्य प्रतिभागी दोनों प्रतिभागी लड़ना शुरू करते हैं। शुरुआत में सिद्धार्थ प्रहार नहीं करते, केवल अपने आप को बचाते हैं।

परंतु जब गुरु प्रहार करने के लिए कहते हैं तो सिद्धार्थ प्रहार करते हैं और देखते ही देखते सामने वाले प्रतिभागी को हरा देते हैं। जैसे ही सामने वाला प्रतिभागी सिद्धार्थ के प्रहार के कारण जमीन पर गिरता है। तो सिद्धार्थ तुरंत अपनी तलवार छोड़ कर उसे उठाने में लग जाते हैं और यह देखते हैं कि कहीं उसे चोट तो नहीं आई।

जब सिद्धार्थ पाते हैं कि सामने वाला प्रतिभागी ठीक है, तब सिद्धार्थ अपने चेहरे से मुखौटा हटाते हैं। सिद्धार्थ को देखकर राजा शुद्धोधन और रानी प्रजापति सभी बहुत प्रसन्न होते हैं सिवाय देवदत्त के। जैसे ही देवदत्त को पता चलता है कि जिसे उसने हराया था वह सिद्धार्थ नहीं कोई और था तो वह क्रोध से भर जाता है।

परंतु सिद्धार्थ को जीत का कोई अभिमान नहीं होता। वे विनम्रता के साथ अपने गुरु और माता – पिता से आशीर्वाद लेते हैं। पहले दिन की प्रतियोगिता सिद्धार्थ की जीत के साथ समाप्त होती है। अगले दिन धनुर्विद्या की प्रतियोगिता शुरू होती है।

पहला प्रतिभागी आता है और एक पक्षी में निशाना लगाने का प्रयास करता है, परंतु निशाना चूक जाता है। दूसरा प्रतिभागी देवदत्त होता है और उसके लिए भी एक पक्षी उड़ाया जाता है परंतु जैसे ही देवदत्त निशाना लगाने के लिए तैयार होता है, सिद्धार्थ उसे रोक देते हैं।

और सिद्धार्थ कहते हैं, क्षमा करें गुरुदेव परंतु परीक्षा के लिए क्या मूक पक्षियों को लक्ष्य बनाना उचित है? वहां उपस्थित सभी गुरुओं में से एक गुरु सिद्धार्थ से कहते हैं, परीक्षा में धनुर्धर की योग्यता को परखा जाता है। क्या तुम्हारे पास कोई और विधि है? सिद्धार्थ कई विधियां बताते हैं, परंतु उनकी किसी भी विधि को स्वीकारा नहीं जाता।

देवदत्त कहता है गुरुदेव आप पक्षी उड़ाईए मैं निशाना लगाने के लिए तैयार हूं। पक्षी उड़ाया जाता है और देवदत्त तीर चलाता है। देवदत्त का तीर सीधा जाकर उड़ते हुए पक्षी में लगता है और पक्षी घायल होकर जमीन पर गिर पड़ता है। यह देखकर सिद्धार्थ को बहुत पीड़ा होती है, परंतु वे अपने गुरु के आदेश के कारण कुछ कर नहीं पाते।

अगली बारी सिद्धार्थ की होती अगली बारी सिद्धार्थ की होती है। सिद्धार्थ धनुषबाण लेकर मैदान के बीचों बीच खड़े हो जाते हैं। जैसे ही पक्षी उड़ाया जाता है , सिद्धार्थ के हाथों से धनुषबाण छूट जाता है और यह देखकर सिद्धार्थ के गुरु उनसे कहते हैं , धनुष बाण उठाओ सिद्धार्थ लक्ष्य तुम्हारे सामने हैं।

फिर सिद्धार्थ कहते हैं क्षमा करें गुरुदेव परंतु मैं परीक्षा नहीं दे सकता। सिद्धार्थ की बात सुन देवदत्त कहता है, तो ठीक है गुरुदेव आप मुझे सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर घोषित कर दीजिए। सिद्धार्थ कहते हैं जी गुरुदेव आप जेष्ठा को सर्वश्रेष्ठ घोषित कर दीजिए, मैं पक्षियों को निशाना नही बना सकता।

गुरु कहते तुम्हें परीक्षा देनी ही होगी सिद्धार्थ यह मेरा आदेश है। सिद्धार्थ कहते हैं गुरुदेव आप मेरी यही परीक्षा लेना चाहते हैं ना कि मैं धनुर्विद्या में निपुण हूं या नहीं, तो लक्ष्य कोई और भी तो हो सकता है। सभी गुरुओं में से एक गुरु कहते हैं, हाँ हो सकता है परंतु लक्ष्य उतना ही कठिन होना चाहिए जितना कि देवदत्त के लिए था।

सिद्धार्थ अपनी माला का एक छोटा सा मोती लेते हैं और उसे आकाश में उछालने के लिए कहते हैं। सिद्धार्थ कहते हैं इस मोती को इतना ऊपर उछाला जाए कि यह एक छोटे से बिंदु के रूप में भी ना दिखे। सिद्धार्थ के कहने पर देवदत्त खुद उस मोती को पूरी ताकत से आकाश में उछालता है।

सिद्धार्थ उस मोती की सीध में बाण चलाते हैं। सबको लगता है कि निशाना चूक गया क्योंकि मोती दिखना तक बंद हो गया था , परंतु कुछ ही क्षण बाद मोती के छोटे – छोटे टुकड़े जमीन पर गिरते हैं।

सभी लोग यह देखकर आश्चर्यचकित होते हैं कि भला कोई इतने छोटे से मोती को निशाना कैसे बना सकता है? परंतु क्योंकि सिद्धार्थ का उद्देश्य सर्वश्रेष्ठ बनना नहीं बल्कि अपनी योग्यता का प्रदर्शन करना था इसलिए वे ऐसा कर पाए। दूसरे दिन की प्रतियोगिता समाप्त होती है और सिद्धार्थ को सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर घोषित कर दिया जाता है।

अगले ही दिन तीसरी और अंतिम प्रतियोगिता होती है, जिसका नाम दंड प्रतियोगिता होता है। इस बार देवदत्त का सामना सिद्धार्थ से होता है। देवदत्त मन ही मन सोचता है कि इस बार मैं सिद्धार्थ को सबक सिखा कर ही रहूंगा। प्रतियोगिता शुरू होती हैं और देवदत्त पहला प्रहार करता है, परंतु सिद्धार्थ केवल देवदत्त के प्रहार को रोकते हैं और उस पर पलटवार नहीं करते।

यह देखकर सिद्धार्थ के गुरु आचार्य कोण्डन्य उनसे कहते हैं, सिद्धार्थ तुम देवदत्त पर प्रहार क्यों नहीं कर रहे हो? सिद्धार्थ कहते हैं गुरुदेव मैं जेष्ठा पर प्रहार कैसे कर सकता हूं? गुरु कहते हैं यह युद्ध नहीं प्रतियोगिता है। यहां प्रतिभागी को अपनी प्रतिभा दिखानी होती है।

सिद्धार्थ कहते हैं परंतु मैं चाहकर भी जेष्ठा पर प्रहार नहीं कर पा रहा हूं। सिद्धार्थ के इन शब्दों को सुन वहां बैठे सभी प्रजाजन और सिद्धार्थ के माता – पिता सभी बहुत निराश हो जाते हैं। और फिर आचार्य कोण्डन्य सिद्धार्थ से कहते हैं, अब तुम्हारे पास दो विकल्प हैं, सिद्धार्थ या तो तुम्हें प्रहार करना है या फिर मुझे भूल जाना है।

सिद्धार्थ अपने गुरु से बहुत प्रेम करते थे जिसके कारण वे देवदत्त पर प्रहार करना शुरू करते हैं और कुछ ही क्षणों में वे देवदत्त को हरा देते हैं। यह देखकर वहाँ उपस्थित सभी लोग सिद्धार्थ के जयकारे लगाने लगते हैं। सिद्धार्थ के माता – पिता भी यह देखकर बहुत प्रसन्न होते हैं ।

तीनों परीक्षाएं होने के बाद यह सुनिश्चित कर दिया जाता है कि गुरुकुल के सर्वश्रेष्ठ विद्यार्थी सिद्धार्थ हैं। राजा शुद्धोधन तथा उनकी पत्नी रानी प्रजापति सिद्धार्थ के विजय होने पर बहुत प्रसन्न होते हैं परंतु देवदत्त मंगला और द्रोणोधन बहुत दुखी होते हैं, क्योंकि उनकी उनके हर प्रयास के बाद भी सिद्धार्थ सर्वश्रेष्ठ साबित होते हैं।

दोस्तों यह थी वो 3 गौतम बुद्ध के बचपन की कहानियां आप सभी को कैसी लगी और इन सभी कहानियों से आपको क्या क्या सीखने को मिला? यह हमे नीचे कॉमेंट करके जरूर बताएं। साथ ही अपने दोस्तो के साथ इसे अवश्य शेयर कीजिए।

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